लेख

साइबर हमले के पीछे उत्तर कोरिया तो नहीं?

North Korea, Behind, Cyber Attack, Crime, Global cyber

ग्लोबल साइबर हमले के पीछे कौन है? जो ताजा तथ्य मिले हैं उससे लगता है कि हमले के पीछे उत्तर कोरिया का हाथ हो सकता है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

आपने शायद ही लेजरस ग्रुप का नाम सुना हो, 2014 में सोनी पिक्चर्स की हैकिंग और 2016 में बांग्लादेशी बैंकों की हैंकिग, दोनों मामलों का संबंध इसी ग्रुप से था। ऐसा माना जाता है कि लेजरस ग्रुप उत्तर कोरिया के लिए चीन से काम करता है और ताजा साइबर हमले का मामला भी उसी से जुड़ा है।

गूगल के सिक्योरिटी रिसर्चर नील मेहता की एक खोज के बाद सुरक्षा विशेषज्ञ अब रैनसमवियर के ताजा हमले को लेजरस ग्रुप से जोड़कर देख रहे हैं। नील ने हैकिंग के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर ‘वॉनाक्राइ’ के कोड और अतीत में लेजरस ग्रुप के बनाए कुछ टूल्स में समानता देखी है। यह एक बड़ा सबूत है। लेकिन गौर करने वाले कुछ और सुराग भी हैं।

सिक्योरिटी विशेषज्ञ प्रोफेसर ऐलन वुडवर्ड ने एक ईमेल के जरिए बताया कि असली ‘वॉनाक्राइ’ के कोड का टाइम चीन के टाइम जोन के हिसाब से है। फिरौती के लिए मांगी जाने वाली रकम के लिए लिखी भाषा का अंग्रेजी में अनुवाद मशीनी लगता है, लेकिन चीन में फिरौती मांगने के लिए चीनी भाषा ही लिखी गई।

प्रोफेसर वुडवर्ड का कहना है, ‘जैसा कि आप देख सकते हैं कि यह सब परिस्थितिजन्य है। हालांकि यह आगे की जांच के लिए उपयोगी है।’ जांच अभी जारी है। रूस की सिक्योरिटी फर्म कैस्परस्काई का कहना है- ‘नील मेहता की खोज वॉनाक्राइ की उत्पत्ति का एक अहम सुराग है।’ लेकिन किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले वॉनाक्राइ के पिछले संस्करणों के बारे में बहुत सी जानकारी जुटाने की जरूरत है।

साइबर हमले के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना बहुत मुश्किल होता है। अक्सर इस मामले में पुष्टि के बजाय आम सहमति पर भरोसा किया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर कोरिया ने सोनी पिक्चर्स हैकिंग मामले में अपनी भूमिका को कभी स्वीकार नहीं किया। जबकि सिक्योरिटी रिसर्चरों और अमरीकी सरकार को उत्तर कोरिया के इसमें शामिल होने का पूरा भरोसा है।

हालांकि दोनों मे से कोई भी बात इसमें फॉल्स फ्लैग (यानी गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश) हो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। हो सकता है कुशल हैकरों ने उसे ऐसी तकनीक से बनाया हो, जिससे ऐसा लगे कि इसे उत्तर कोरिया में बनाया गया है। वॉनाक्राइ के मामले में मुमकिन है कि हैकरों ने लेजÞरस ग्रुप के पिछले हमले के कोड को कॉपी कर लिया हो।

हालांकि कैस्परस्काई का कहना है वॉनाक्राइ में फॉल्स फ्लैग संभव है, लेकिन मुश्किल है, क्योंकि शेयर किया गया कोड अगले संस्करण से हटा दिया गया है। उत्तर कोरिया से वॉनाक्राइ की उत्पत्ति की मजÞबूत थ्योरी होने के बावजूद कुछ जानकारियां हैं, जो विवादास्पद रूप से इसके उत्तर कोरिया से काम करने पर सवाल उठाती हैं।

पहला, चीन उन देशों में से एक है जिस पर इस रैनसमवेयर का सबसे बुरा हमला हुआ है और ये दुर्घटनावश नहीं हुआ है। हैकरों ने सुनिश्चित किया था कि फिरौती का चीनी भाषा में लिखा संस्करण बनाया जाए। ऐसा नहीं लगता है कि उत्तर कोरिया अपने सबसे मजÞबूत सहयोगी का विरोध करेगा। रूस भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

दूसरा, उत्तर कोरिया का साइबर हमले का निशाना तय होता है, वह अक्सर राजनीतिक उद्देश्य को ध्यान में रखता है। सोनी पिक्चर्स वाले मामले में हैकर इंटरव्यू फिल्म की रिलीजÞ को रोकना चाहते थे, जो उत्तर कोरिया के शासक किम-जोंग-उन पर बनी थी। इसके विपरीत वॉनाक्राइ बड़े पैमाने पर फैला।

अगर इस हमले का मकसद पैसा लूटना था तो इसमें ये बुरी तरह असफल रहा। अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बिटकॉइन अकाउंट के विवरण के मुताबिक फिरौती में अब तक सिर्फ करीब 60 हजार डॉलर दिए गए हैं, दो लाख से ज्यादा मशीनों पर रैनसमवेयर ने हमला किया था, उसके हिसाब से ये बहुत कम रकम है। लेकिन हो सकता है कि किसी राजनीतिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए फिरौती मांग कर ध्यान भटकाने की कोशिश की गई हो।

डेल ली

Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।

लोकप्रिय न्यूज़

To Top