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नए प्रयोग और अनुसंधान आवश्यक

experiment

धुर्जति मुखर्जी

experiment हाल ही में केन्द्र सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय सहित 11 केन्द्रीय गैर-निष्पादनकारी विश्वविद्यालयों के मूल्यांकन का निर्णय निश्चित तौर पर स्वागत योग्य है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों से पता चला है कि इन विश्वविद्यालयों के ठीक से कार्य न करने के कारणों का मूल्यांकन करने हेतु इनकी शैक्षिक और अनुसंधान लेखा परीक्षा करायी जाएगी।

experiment तो शिक्षा से रह जाएंगे वंचित

यह लेखा परीक्षा अन्य विश्वविद्यालयों की भी करायी जानी चाहिए। इससे विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक स्तर में सुधार होगा। जैसा कि सभी जानते हें कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक ओर अनुसंधान कार्यों की गुणवत्ता देश में शिक्षा की गुणवत्ता का पैमाना होता है और यदि देश में शैक्षणिक स्तर में सुधार नहीं आता है तो देश के लोग अच्छी शिक्षा के लाभों से वंचित रहते हैं।

जनता के संपर्क में हों सरकारी संगठन

यह निर्णय लिया गया है कि यह मूल्यांकन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कराया जाएगा किंतु यदि इस कार्य को किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा जाता तो अच्छा होता। तृतीय पक्षकार द्वारा स्वतंत्र मूल्यांकन सुनिश्चित करना आवश्यक है और इस बात का उल्लेख दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में भी है जिसे बाद में सरकार ने स्वीकार कर लिया था।

इस आयोग ने कहा था सभी सरकारी संगठनों का जनता से संपर्क होना चाहिए और उनका वार्षिक सामाजिक, पर्यावरणीय या शैक्षिक मूल्यांकन होना चाहिए ताकि उन संगठनों की कमियों का पता लगे और उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाए।

किंतु सरकार ने आयोग की सिफारिश का कार्यान्वयन नहीं किया किंतु शिक्षा के क्षेत्र में यह पहल एक अच्छा कदम है। विशेषज्ञों और नीति निर्माता बार-बार इस बात का उल्लेख करते हैं कि देश में शिक्षा का स्तर उभरती विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के अनुकूल नही है और इसमें सुधार होना चाहिए।

इसलिए इस क्षेत्र में स्वतंत्र मूल्यांकन से शैक्षणिक कार्यकुशलता में सुधार होगा साथ ही विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त स्वस्थ वातावरण, पर्याप्त निधियां आदि भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अध्यापकों की नियुक्ति पूर्णत: योग्यता और समर्पण के आधार पर होनी चाहिए।

experiment बच्चों को राजनीति में धकेलने की शिक्षा

विश्वविद्यालयों और कालेजों के समक्ष समस्याओं के बारे में सभी परिचित हैं। इन संस्थाओं में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज करने के लिए राजनीतिक दल छात्रों को अपनी राजनीतिक सोच अपनाने के लिए बाध्य करते हैं जिसके कारण टकराव होता है।
दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद और अन्य स्थानों पर विश्वविद्यालय परिसरों में हिंसा की अनेक घटनाएं हुई हैं क्योंकि राजनीतिक दलों द्वारा छात्रों को कहा जाता है कि वे अध्ययन के बजाय राजनीति में भाग लें। दिल्ली विश्वविद्यालय में हाल में हुई हिंसा के पीछे केन्द्र सरकार और पश्चिम बंगाल में शैक्षणिक संस्थाओं में हिंसा के लिए वहां की सत्तारूढ़ पार्टी जिम्मेदार है। इसके अलावा विश्वविद्यालयों के पास पर्याप्त निधियां नहीं हैं।

जिसके चलते वे आवश्यक संख्या में अध्यापकों की नियुक्ति नहीं कर पाते। महानगरों और बड़े शहरों के शैक्षणिक संस्थानों पर ध्यान दिया जाता है जबकि जिला और उपमंडल स्तर के संस्थानों की उपेक्षा की जाती है। शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए यह अच्छा नहीं है।

परिषद् से शक्तियां वापिस लेनी पड़ी

एक अन्य समस्या लाभ अर्जित करने वाले प्राइवेट संस्थानों की संख्या बढ़ रही है और वे विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रम चला रहे हैं। निजी मेडिकल कालेजों द्वारा ऊंची फीस ली जाती है जिसके चलते सरकार को भारतीय चिकित्सा परिषद से शक्तियां वापस लेनी पड़ी। इसी तरह डीम्ड विश्वविद्यालयों में भी इंजीनियंरिंग पाठ्यक्रमों के लिए ली जाने वाली फीस आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
इन प्राइवेट सस्थानों के छात्र जब शिक्षा प्राप्त करके रोजगार के बाजार में आते हैं तो नियोक्ता उनके कार्य से संतुष्ट नहीं होते हैं। प्राइवेट संस्थानों ने शिक्षा को एक व्यापार की वस्तु बना दिया है और इस पर रोक लगाने की आवश्यकता है। प्राइवेट संस्थानों से निकल रहे हजारों छात्र रोजगार की तलाश में बाजार मे आते हैं किंतु अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं जिसके चलते शिक्षा ऋण का भुगतान नहीं हो पा रहा है और छात्र आत्महत्या की ओर बढ़ रहे हैं और यह वास्तव में बड़ा विनाशक होगा।

experiment गंभीरता से विचार की जरूरत

शिक्षा के व्यवसायीकरण के बारे में राष्टÑपति प्रणव मुखर्जी ने कोलकाता में एक बैठक में कहा उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार किया जाना चाहिए और इस बात पर दु:ख व्यक्त किया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में नए प्रयोगों और अनुसंधानों पर बल नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने अमर्त्य सेन, हरगोविन्द खुराना, वेंकटरमन रामाकृष्णन का उदाहरण देते हुए कहा कि नीति निर्माता भारतीय वैज्ञानिको को तब मान्यता देते हैं जब उन्हें अंतर्राष्टÑीय मान्यता मिल जाती है या नोबेल पुरस्कार मिल जाता है और इस बात पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

संसाधनों की कमी न रहे

सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को अधिक संसाधन आवंटित किया जाना चाहिए। हालांकि बजट में इस वर्ष के लिए आईआईएम और आईआईटी के लिए आवंटन बढ़ाया गया है किंतु उच्च शिक्षा के लिए बजट में वृद्धि नाममात्र की है और इसके लिए और अधिक संसाधनों की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा वित्त एजेंसी की स्थापना के लिए 250 करोड़ रूपए का अतिरिक्त आवंटन किया गया है।

यह एक अच्छा कदम है। उच्च शिक्षण संस्थानों में नए प्रयोगों और अनुसंधान को बढ़ावा देना एक बड़ी चुनौती है तथा इसमें सरकार और शिक्षा प्रशासकों का सहयोग भी आवश्यक है। बदलाव लाना एक कठिन कार्य है किंतु यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो सुधार किया जा सकता है और इस दिशा में सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग मेें सुधार लाने में रूचि दिखायी है।

experiment सिद्धांतों का पालन हो

कार्डिनल जॉन हेनरी न्यूमैन की पुस्तक द आइडिया आॅफ यूनिवर्सिटी में कही गयी इस बात पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है – विश्वविद्यालय एक ऐसा स्थान है जहां पर बुद्धिजीवी सोच विचार कर सकते हैं, अपने कार्यकलापों को आगे बढ़ा सकते हैं और सच्चाई का निर्णय कर सकते हैं। यह एक ऐसा स्थान है जहां पर जांच को आगे बढ़ाया जाता है, खोज का सत्यापन किया जाता है, मस्तिष्क और ज्ञान के टकराव से गलतियों को दूर किया जाता है। देश में उच्च शिक्षा में बदलाव के लिए इस सिद्धान्त का पालन किया जाना चाहिए।

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