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पत्थरबाजों से सख्ती से निपटने की जरुरत

Needs Strictly

अरविंद जयतिलक Needs Strictly

शायद ही दुनिया में ऐसा कोई मुल्क होगा, जहां की सेना आतंकवादियों से लोहा ले रही हो, तब वहां के नौजवान सेना पर पत्थर बरसा रहे हों।

शायद ही कभी देखने-सुनने को मिला हो, जब किसी देश के सियासतदान आतंकियों के मददगारों के खिलाफ मुखर होने के बजाए, उन्हें बचाने की ढीठता दिखाते हों। लेकिन कश्मीर में ऐसा ही नजर आ रहा है।

सेना पर पत्थरबाजी

चाडूरा (बड़गाम) में हिजबुल मुजाहिदीन के खतरनाक आतंकी तौसीफ अहमद और सेना के बीच मुठभेड़ के दौरान जिस तरह उमड़ी उपद्रवियों की भीड़ ने आतंकियों को बचाने के लिए सेना पर पत्थरबाजी की, वह तो महज बानगी भर है। अब तो कश्मीर में इस तरह का देश-विरोधी कृत्य आए दिन देखने को मिल रहा है।

बहरहाल सेना के जवान बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने बहादुरी दिखाते हुए आतंकी तौसीफ को मार गिराया और पत्थरबाज देशद्रोहियों को भी सबक सिखाया। अगर देश-विरोधी कारस्तानी की वजह से तीन पत्थरबाज अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं, तो इसके लिए सेना नहीं, वह स्वयं जिम्मेदार हैं।

Needs Strictly सेना संयम का परिचय नहीं दे रही

Needs Strictly ऐसे में कश्मीर के सियासतदानों का यह रुदन-पीटन ठीक नहीं कि सेना संयम का परिचय नहीं दे रही है और नौजवानों को निशाना बना रही है। इन पैराकारों को समझना होगा कि पाकिस्तान के इशारे पर सेना पर पत्थर बरसाने वाले कोई राष्ट्रभक्त नहीं, जिनके साथ सम्मान से पेश आया जाए।

यह देशद्रोही हैं और इनके साथ कड़ाई से निपटना आवश्यक है। बेहतर होगा कि ये सियासतदान ऐसे पत्थरबाजों को राह से भटके हुए नौजवान बताने के बजाए उन्हें देश-विरोधी कृत्य करने से रोकें। क्योंकि यह देश-दुनिया के सामने उजागर हो चुका है कि पाकिस्तान इन पत्थरबाजों को सेना पर पथराव के लिए प्रतिदिन एक नौजवान को पांच सौ से लेकर एक हजार रुपए देता है।

उसका मकसद कश्मीर में अराजकता फैलाकर माहौल खराब करना और साबित करना है कि कश्मीर में लोकतंत्र नहीं है। लेकिन कश्मीर में सेना की सतर्कता और सक्रियता की वजह से उसके मंसूबे पूरे नहीं हो रहे हैं।

दूसरी ओर सेना के जवान आतंकियों के साथ-साथ उनके मददगारों से भी कड़ाई से निपट रहे हैं। उचित होगा कि सरकार भी सेना के जवानों को आतंकियों और उनके मददगारों से निपटने के लिए खुली छूट दे। इसलिए कि पत्थरबाजी से सेना के जवान बुरी तरह घायल हो रहे हैं।

Needs Strictly उनके मनोबल पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उन्हें एक साथ दो मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है। आश्चर्य होता है कि इसके बावजूद भी कुछ लोग यह तर्क गढ़ रहे हैं कि सेना के जवान उपद्रवियों की भीड़ पर नरमी दिखाएं। यह तर्क बेमानी है।

यह कहां तक न्यायसंगत है कि आतंकियों के मददगार सेना के जवानों पर पत्थरबाजी करें और सेना नरमी दिखाए। ध्यान देना होगा कि पिछले दिनों पत्थरबाजों की बढ़ती हिमाकत को देखते हुए ही सेनाध्यक्ष विपिन रावत को दो टूक कहना पड़ा था कि अगर कोई सेना को निशाना बनाएगा, तो सेना के पास भी हथियार हैं और वह उसका इस्तेमाल करेगी।

Needs Strictly सियासतदान पैलेट गन पर ही सवाल उठा रहे

गौर करें तो अपने ऊपर हमले के बाद भी सेना घातक हथियारों के बजाए सिर्फ पैलेट गन का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि देश के कुछ सियासतदान पैलेट गन पर ही सवाल उठा रहे हैं।

एक याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत को भी सरकार को ताकीद करना पड़ा है कि वह कश्मीर में पैलेट गन के विकल्प पर विचार करे ताकि किसी पक्ष को नुक्सान न हो। उल्लेखनीय है कि अदालत ने यह सुझाव एक याचिका पर दी जिसमें पैलेट गन पर रोक लगाने की मांग की गयी थी।

अच्छा हुआ कि सर्वोच्च अदालत ने पैलेट गन के विकल्प का सुझाव भर दिया न कि उसके इस्तेमाल पर रोक की बात कही। अगर इस पर रोक लगती तो नि:संदेह सैनिकों को ही नुकसान पहुंचता।

फिलहाल उपद्रवियों से निपटने के लिए पैलेट गन का कोई प्रभावी विकल्प नहीं है। यहां ध्यान देना होगा कि हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद सेना पर हमले बढ़े हैं।

अब तक सीआरपीएफ के ही 300 से अधिक जवान घायल हो चुके हैं। याद होगा अभी गत माह पहले ही उपद्रवी भीड़ ने जीप सहित पुलिसकर्मियों को नदी में फेंक दिया। शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो जब सैनिकों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें न होती हो।

फिर सेना उपद्रवियों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पैलेटगन का इस्तेमाल करती है तो इसमें अनुचित क्या है? किसी को बताना चाहिए कि जब उपद्रवियों की भीड़ सेना के जवानों पर फेंकेगी तो क्या वे उनका मुकाबला डंडों से करेंगे?

वैसे भी सेना के जवान कमर के नीचे ही फायर करते हैं, ताकि दूसरे पक्ष को ज्यादा नुकसान न पहुंचे। लेकिन अगर आतंकियों के मदद्गार सेना के जवानों की जान लेने की कोशिश करेंगे तो स्वाभाविक है कि सेना भी पैलेट गन का इस्तेमाल करेगी ही।

वैसे भी पैलेट गन नॉन लीथल हथियार होता है और इससे जान जाने की संभावना कम होती है। इसके एक बार फायर होने से सैकड़ों छर्रे निकलते हैं जो रबर व प्लास्टिक के होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस हथियार का इस्तेमाल कोई पहली बार हो रहा है। इसका इस्तेमाल 2010 से हो रहा है।

भीड़ से निपटने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल दुनिया के कई देशों में होता है। चूंकि कश्मीर में आतंकियों के मदद्गार बैठे हैं ऐसे में उनसे निपटने के लिए अगर सेना पैलेट गन का इस्तेमाल कर रही है तो यह उचित है।

पैलेट गन का विरोध करने वाले लोगों को समझना होगा कि आतंकियों के मदद्गार राह से भटके हुए कोई नौजवान नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की शह पर भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने वाले ऐसे देशद्रोही हैं जिनके साथ आतंकियों जैसा ही बर्ताव होना चाहिए।

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