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पुन: प्रासंगिक हो उठा है नाटो

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उत्तर अटलांटिक संधि संगठन को नाटों के नाम से ही पुकारा जाता है। इसका निर्माण 4 अप्रैल 1949 को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में किया गया था। प्रारम्भ में इसकी सदस्यता बारह देशों ने ली थी लेकिन अब इसके लगभग बीस सदस्य राष्ट्र हैं। नाटो में सम्मिलित सदस्य देश यूरोप के विभिन्न क्षेत्रों से हैं। भूभाग, जनसंख्या, प्राकृतिक सम्पदा, औद्योगिक सम्पदा, ऐतिहासिक अनुभवों तथा राजनीतिक परम्पराओं की दृष्टि से इनमें भिन्नता है। नाटों के निर्माण के पीछे तीन प्रमुख कारण विद्यमान थे, ये थे आर्थिक पुर्ननिर्माण की आवश्यकता, सोवियत संघ द्वारा साम्यवादी प्रसार की रोकथाम तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यशैली पर अविश्वास।

गौरतलब है कि जिस वजह से नाटों का निर्माण किया गया था वस्तुत: महत्वपूर्ण कारण सोवियत संघ द्वारा साम्यवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार को रोकना था। हालांकि नाटो के संस्थापक सदस्य आमतौर पर पश्चिमी यूरोप थे। लेकिन 1990-1991 में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात जो टुकड़े हुये वे छोटे-छोटे राष्ट्र उसके सदस्य बन बैठे। शीत युद्घ 45 वर्षों तक चला जिसके घातक परिणाम हुये। अमेरिका की सरपरस्ती में नाटों ने कई जगहों पर अपनी मारक तथा विध्वंसक क्षमता से प्रहार किया तथा सदस्य देशों मुख्यत: फ्रांस तथा ब्रिटेन ने अपनी रक्षात्मक क्षमता का प्रदर्शन किया।

1990 से 2000 तक यह प्रश्न तथा विचार लगातार कौंधता रहा कि क्या नाटो का काम पूरा हो चुका है? क्या नाटो अब प्रांसगिक नहीं रह गया है। क्या सोवियत संघ के टुकड़े होने से नाटोे का अभीष्ट पूरा हो चुका है? आज इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है नहीं। नाटों का काम अभी शेष है। विश्व में जब-जब कम्युनिष्ट या फासीवादी ताकतों ने सर उठाया तब-तब नाटों ने उनका मान-मर्दन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। नाटों एक सैन्य संगठन है और कोई भी कार्यवाही वह विश्व में कहीं भी फौरी तौर पर कर सकता है। चूंकि यह शक्तिशाली संगठन है इसलिए कोई भी त्वरित कार्यवाही करने के लिये इसे संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमोदन लेने की जरूरत नहीं पड़ती। 1956 का स्वेज संकट या 1991 का खाड़ी युद्ध इराक के मोसुल में बगदादी के कहर को तोड़ने की कवायद या अफगानिस्तान मेंं तालिबान का खात्मा हर जगह नाटों ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है।

आज दुनिया एक बार फिर विस्फोटक स्थिति से गुजर रही है। आज एक बार फिर उपद्रवी ताकतों ने सिर उठाना शुरु कर दिया है तथा कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रसार एक बार पुन: लोकतांंत्रिक दुनिया के लिये चिन्ता का सबब बना हुआ है। हम अगर एशिया की बात करें तो इस समय दो ऐसे देश हैं जो न सिर्फ एशिया बल्कि पूरे विश्व को अपने सिद्घान्तों तथा गतिविधियों से हलकान किये हुये हैं। ये दोनों देश उत्तरी कोरिया तथा चीन हैं। उत्तरी कोरिया में सैनिक तानाशाही है तो चीन साम्यवादी ताकतों का सिरमौर है। किम जोंग उन जो उत्तरी कोरिया का तानाशाह है अमेरिका समेत सभी लोकतांत्रिक देशों को अपनी नापाक हरकतों से तबाह करने पर जुटा हुआ है। उसके मिसाईल, घातक हथियार तथा परमाणु परीक्षण पूरे विश्व के लिये युद्घ की चेतावनी दे रहे हैं। दूसरी तरफ चीन नित्य नये हथियार विकसित कर रहा है।

हाल ही में उसने दक्षिण चीन सागर में अपना पहला स्वदेशी विमान वाहक पोत उतारा है जो दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा उन्नत है। ताइवान, तिब्बत तथा भारत के कुछ प्रदेश उसकी आंख का कांटा बने हुये हैं और इसी वजह से उसके ताकतवर राष्टÑपति शी जिनपिग साम्राज्यवादी भावना से ग्रसित हो दुनिया में शक्ति संतुलन को बर्बाद करने की जोर आजमाइश करने में जुटे हैं। सन् 2005 तक अमेरिका अकेले ही विश्व में दादागिरी करता रहा और उसको रोकने- टोकने वाला कोई नहीं था। लेकिन विगत एक दशक से चीन तथा रूस ने दुनिया में शक्ति प्रदर्शन कर अमेरिका के शहशांह बनने के मंसूबे पर पानी फेर दिया है।

नाटो सिर्फ एक सैन्य संगठन भर नहीं है

इसी तर्ज पर मध्य एशिया के कुछ देश मसलन ईराक, सीरिया, लेबनान भी अपनी अराजक तथा युद्धोन्मादी शासन व्यवस्था के कारण क्षेत्र में अशान्ति फैलाये हुये हैंं। इन सबको रोकने तथा इनकी जड़ों को काटने का जिम्मा संयुक्त राष्टÑ संघ ले पाने मेंं सर्वथा असमर्थ रहा है। इनकी रोकथाम करनी है तो नाटों को ही आगे आना पड़ेगा।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी ऐसे इलाके है, जहां भी जनता और राजनीतिक व्यवस्था उसी सड़ी गली मध्ययुगीन कबायली सोच से ग्रसित है। ये ताकते समय-समय पर सर उठाती रही हैं। इन ताकतों को खुला और छुट्टा छोड़ देने का मतलब है दुनिया की तबाही। ये देश चाहे चीन हो या उत्तरी कोरिया, इराक हो या पाकिस्तान, तुर्की हो या अफगानिस्तान सभी डंडे की ही भाषा समझते हैं। इनकी चालों, इनके कूटनीतिक पैतरों तथा इनके नापाक इरादों को रोकने की कूव्वत सिर्फ नाटो नामक संगठन में है। नाटो विशेषकर सोवियत खेमे तथा गुटनिरक्षेप देशों की आलोचना का शिकार रहा है जहां एक ओर साम्यवादी देश उसे अपने खिलाफ समझते हैं, वहीं गुट निरपेक्ष देश किसी भी सैनिक गुटबाजी में बनकर अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता को खोना नहीं चाहते थे इसके बावजूद नाटो आज भी कायम है। क्योंकि सदस्य राष्टÑ अभी भी अपनी सुरक्षा और विश्वास के लिये इसे उपयोगी मानते हैं।

सनद रहे कि द्वितीय विश्व युद्घ के बाद कूटनीति और राजनय के मायने बदल गये जो देश एक दूसरे के जानी दुश्मन थे। वे एक हो गये। विश्व कभी द्विधुव्रीय हो गया तो कभी एक धु्रवीय। ऐसे में विश्व में कानून व्यवस्था तथा शान्ति कायम करने के लिये दुनिया को ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो आतंक फैले राज्यों की नाक में नकेल डाल सके। नाटो सिर्फ एक सैन्य संगठन भर नहीं है। इसके सदस्य आपस में सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। लेकिन इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य कम्युनिष्ट ताकतों को पराजित करना ही है। इस दृष्टि से देखा जाय तो आज यह चीन तथा कोरिया जैसे देशो के नाक में दम करने वाला अकेला कद्दावर संगठन बना हुआ है। हालांकि कम्युनिज्म या कन्टेनमेन्ट आफ कम्युनिज्म जैसा शब्द अब शायद अपना अक्षरश: मतलब खो चुके हैं, लेकिन फिर भी विचारधाराओें में अन्तर के कारण विश्व हमेशा से गुटों में बंटा रहा है।

भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो नाटों पर अधिकांश देश उसके हितैषी तथा मित्र हैं। खास तौर से पिछले पांच साल से नाटों के अगुआ अमेरिका से भारत के रक्षात्मक सम्बन्ध विकसित हुये। दूसरे तरफ एक और तथ्य जो तेजी से उभर कर सामने आता है वह तथ्य रूस की स्थिति। यह देश न तो पूरी तरह साम्यवादी ही रह गया है और न ही लोकतांत्रिक इसलिए उसके सम्बन्ध नाटों से कभी खराब हो जाते हैं, तो कभी अच्छे हो जाते हैं। अर्थात नाटो वक्ती तौर पर एक ऐसा सफल संगठन है जिसने अपने आदर्शों के साथ कभी समझौता नहीं किया है और दुनिया के सियासी फलक पर अभी भी पूरी शिद्दत के साथ खड़ा है।

अमित श्रीवास्तव

 

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