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गाय संरक्षण की सार्थक पहल

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केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति द्वारा गायों और उनकी संतानों (गोवंश) के संरक्षण के लिए विशिष्ट पहचान संख्या देने का सुझाव एक स्वागतयोग्य कदम है। उल्लेखनीय है कि अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ ने अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर बड़े पैमाने पर पशुओं की तस्करी होती है और इस पर रोक लगायी जाए।

सरकार ने इसे संज्ञान में लेते हुए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जिसने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में गायों को आधार जैसी पहचान देने के अलावा पशुओं को मूल स्थान से लाने और ले जाने पर रोक लगाने की सिफारिश की गयी है। अगर सरकार विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मानते हुए गायों को आधार जैसी पहचान उपलब्ध कराती है

तो नि:संदेह गायों और गोवंश का संरक्षण होगा और पशुओं की तस्करी भी रुकेगी। भारत में पशुओं को धन और शक्ति की संज्ञा दी गयी है। मशीनी युग के बावजूद भी विभिन्न कृषि कार्यों में इनकी उपयोगिता बरकरार है। हल चलाने से लेकर सिंचाई करने, पटेला चलाने, बोझा ढोने, गन्ना पेरने, अनाज से भूसे को अलग करने, कृषि उपज को मंडी ले जाने आदि अनेक कृषि कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है।

इसके अलावा भूमिहीन, लघु व सीमांत किसान बड़े पैमाने पर पशुपालन करते हैं जिससे उन्हें अच्छी आय होती है। जहां तक गायों का सवाल है तो भारतीय देशी गायों में अधिक तापमान बर्दाश्त करने की अद्भुत क्षमता होती है। अधिक प्रतिरोधक क्षमता एवं पौष्टिक तत्वों की कम जरुरत और रख-रखाव में आसान होने के कारण दुनिया के प्रमुख राष्ट्र इसका आयात कर रहे हैं।

इन देशों में अमेरिका, आस्टेÑलिया तथा ब्राजील शामिल हैं। ये देश इन गायों का उपयोग अनुसंधान तथा उन्नत नस्ल विकसित करने के लिए कर रहे हैं। अभी गत माह पहले जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान में गिर की गायों के यूरिन में सोना की उपलब्धता का खुलासा हुआ। विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने दावा किया कि 400 गिर गायों के यूरिन की जांच में प्रति लीटर यूरिन में 3 से 10 मिलीग्राम सोने की मात्रा पायी गयी है।

उल्लेखनीय है कि गायों के यूरिन में यह कीमती धातु आयन यानी गोल्ड सॉल्ट के रुप में पायी गयी जो घुलनशील होती है। दावा यह भी किया गया कि सोना के अलावा इन गायों के यूरिन में पांच हजार से अधिक ऐसे कंपाउंड भी मिले हैं जिनमें से 388 में कई बीमारियां दूर करने के चिकित्सकीय गुण हैं। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि भारत गायों और गोवंश के संरक्षण की दिशा में आगे बढ़े।

एक आंकड़े के मुताबिक अगर गौवंश की हत्या पर रोक नहीं लगा तो जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्घि के कारण 2020 तक देश में 32 लाख टन दूध का उत्पादन कम हो जाएगा। यह दूध अभी के मूल्य से लगभग 5000 करोड़ रुपए से अधिक का होगा। गौरतलब है कि देश में कुल 19.9 करोड़ गोपशु हैं जो विश्व के कुल गोपशु का 14 फीसदी हैं। आंकड़ों पर विश्वास करें तो वर्ष 2007 की गणना के अनुसार देश में लगभग 9 करोड़ देशी नस्ल की गायें थी।

अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार ने पिछले दिनों देशी गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन की शुरुआत की। इस योजना के तहत बड़े शहरों के आसपास लगभग एक हजार गायों को एक साथ रखा जा सकेगा। इनमें 60 फीसद देशी दुधारु गायों और 40 फीसदी बिना दुध देने वाली गायें होंगी। इन गायों को पालन-पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जाएगा तथा समय-समय पर इनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी।

गोकुल ग्राम प्रबंधन की गोपालन को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इसके अलावा सरकार ने जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर समेकित रुप से देशी नस्ल के पशुओं के विकास के लिए कामधेनु प्रजनन केंद्र की स्थापना की योजना बनायी है जो सराहनीय कदम है। निश्चित रुप से इस योजना से मवेशियों का संरक्षण होगा और उनकी तादाद बढ़ेगी। अच्छी बात यह है कि राज्य सरकारें भी इस दिशा में पर्याप्त कदम उठा रही हैं।

– रीता सिंह

 

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