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अन्नदाता की आय सुरक्षित करने की सार्थक पहल

Meaningful Iinitiative To Secure Income Tax

समय पर किसान द्वारा उपजाई फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाने के कारण अन्नदाता के सामने कई तरह के संकट मुंहबाए खड़े हो जाते हैं। ऐसे में वह न तो बैंकों से लिया कर्ज समय पर चुका पाते हैं और न ही अगली फसल के लिए वाजिब तैयारी कर पाते हैं। बच्चों की पढ़ाई और शादी भी प्रभावित होते हैं। यदि अन्नदाता के परिवार में कोई सदस्य गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो उसका इलाज कराना भी मुश्किल होता है। इन वजहों से उबर नहीं पाने के कारण किसान आत्मघाती कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए ही राजग सरकार ने पिछले दिनों न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की है, जिससे किसान की आमदनी दोगुनी हो जाए और अब इसी कड़ी में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति को मंजूरी दी है। इसके तहत अगले दो वित्तीय वर्षों के लिए 15 हजार 53 करोड़ रुपए मंजूर किए है। अब यदि बाजार में फसल का मूल्य एमएसपी से कम होगा तो राज्य सरकारें इन योजनाओं में से किसी एक का चुनाव कर किसानों को धनराशि का भुगतान कर सकती है।

राजग सरकार ने चार साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद अब किसानों की गंभीरता से सुध लेना शुरू कर दी है। अन्नदाता आय सरंक्षण नीति के तहत राज्य सरकारों को तीन प्रकार के विकल्प दिए गए हैं। एक, नीति के तहत राज्यों को केंद्र के साथ मिलकर फसलों की खरीद करनी होगी, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत होगी। दूसरी भावांतर भुगतान योजना और तीसरी प्रायोगिक तौर पर निजी क्षेत्रों को भी एमएसपी पर खरीद में छूट दी गई है। इसके लिए इन्हें अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। निसंदेह इन नीतियों से बाजार की सरंचना किसान के हित में मजबूत होगी। इसके साथ ही यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो किसान की आमदनी दूनी होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। ऐसे ही उपायों से खेती की लागत कम करने और आय में वृद्धि के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है। इन वस्तुओं के निमार्ता किसानों को नकली खाद, बीज और कीटनाशक देकर भी बर्बाद करने में लगे हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया भी था। अब इसे पूरा करना इसलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि अक्टूबर-नवंबर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और इसके ठीक चार माह बाद मई 2019 में आम चुनाव होने हैं। हालांकि कुछ खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले से ही लागत मूल्य का डेढ़ गुना है। लेकिन धान, रागी और मूंग आदि का समर्थन मूल्य लागत की डेढ़ गुनी कीमत से कम है। इन फसलों के उत्पादक किसानों को इस मूल्य वृद्धि से सबसे अधिक लाभ होगा। एमएसपी में न्यूनतम 3.7 प्रतिशत और अधिकतम 52.5 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी की गई है। इससे सरकारी खजाने पर 33000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार बढ़ेगा। इस नए मूल्य निधारण से धान की खरीद पर ही 15000 करोड़ रुपए के अतिरिक्त बोझ की उम्मीद है। किसानों की आमदनी में यह बढ़ोतरी व्यापक रूप से देशहित में है। दरअसल किसान की आमदनी बढ़ने से चौतरफा लाभ होता है। फसलों के प्रसंस्करण से लेकर कृषि उपकरण और खाद-बीज के कारखानों की गतिशीलता किसान की आय पर ही निर्भर है। मंडियों में आढ़त, अनाज के भरा-भर्ती और यातायात से जुड़े व्यापरियों को भी जीवनदान किसान की उपज से ही मिलता है।

किसान, गरीब और वंचित तबकों की हैसियत बढ़ाने की दृष्टि से आवास और उज्ज्वला योजनाओं के बाद प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति सरकार की चौथी बड़ी पहल है। हालांकि इसके पहले पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के गन्ना किसानों को बड़ी राहत देते हुए 8,500 करोड़ का पैकेज दिया है। फसल बीमा योजना और भूमि स्वास्थ्य कार्ड भी इसी कड़ी के हिस्सा रहे हैं। ये उपाय किए जाना इसलिए जरूरी थे, क्योंकि अतिवृष्टि और अनावृष्टि जैसे प्राकृतिक प्रकोपों के बावजूद देश में कृषि उत्पादन चरम पर है। सरकार द्वारा पेश आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 में करीब 275 मिलियन टन खाद्यान्न और करीब 300 मिलियन टन फलों व सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। बावजूद किसान सड़कों पर उपज फेंकते हुए आंदोलित थे और आत्महत्या भी कर रहे थे, लिहाजा किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए किसान चिंतनीय पहलू होना चाहिए था। गोया, इसकी पृष्ठभूमि 2018-19 के आम बजट में ही रख दी गई थी। हालांकि कृषि, किसान और गरीब को सर्वोच्च प्राथमिकता देना सरकार की कृपा नहीं बल्कि दायित्व है, क्योंकि देश की आबादी की आजीविका और कृषि आधारित उद्योग अंतत: किसान द्वारा खून-पसीने से उगाई फसल से ही गतिमान रहते हैं। यदि ग्रामीण भारत पर फोकस नहीं किया गया होता तो जिस आर्थिक विकास दर को 8 प्रतिशत तक लाया जा सका है, वह संभव ही नहीं थी। इस समय पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया था, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होते लग रहा है। ऐसे ही उपायों से किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। अब इस दिशा में भी सुधार होने की उम्मीद है।

केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ए-2 फॉर्मूला अपनाती रही है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मुल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली और बढ़ जाएगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने भी वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। समर्थन मूल्य में की गई इन वृद्धियों से ऐसा लग रहा है कि भविष्य में कृषि भूमि का किराया भी इस मूल्य में जोड़ दिया जाएगा। इन वृद्धियों से कृषि क्षेत्र की विकास दर में भी वृद्धि होने की उम्मीद है। यदि देश की सकल घरेलू उत्पाद दर को दहाई अंक में ले जाना है तो कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत होनी चाहिए। साफ है, कालांतर में इस दिशा में भी अनुकूल परिणाम निकलेंगे। प्रमोद भार्गव

 

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