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सरकारी स्कूलों में घट रही बच्चों की संख्या विशाल गंभीर

देहरादून।  राज्य सरकार द्वारा प्रतिवर्ष छह हजार करोड़ से अधिक खर्च किये जाने के बाद भी प्रदेश में न तो सरकारी शिक्षा का स्तर सुधर रहा है और ना ही शत निरक्षरता से ही मुक्ति मिल पा रही है। मध्याहन भोजन और मुफ्त कॉपी-किताब जैसे केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों के बावजूद न तो सारे बच्चे स्कूल लाये जा पा रहे हैं और जो बच्चे आ भी रहे हैं उनमें से बड़ी संख्या में स्कूल छोड़ रहे हैं।
विद्यालयी शिक्षा महानिदेशालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शत प्रतिशत दाखिला तो नहीं हो पा रहा। मगर जो बच्चे दाखिला ले रहे हैं उनमें से 3.42 प्रतिशत प्राइमरी स्तर पर ही स्कूल छोड़ रहे हैं। माध्यमिक याने कि इंटर कालेज तक पहुंचते-पहुंचते 13.54 प्रतिशत बच्चे ड्राप आउट कर रहे हैं। मतलब यह कि जो बच्चे स्कूल में दाखिला ले भी रहे हैं उनमें से 13.54 प्रतिशत बच्चे इंटरमीडिएट पास
भी नहीं कर पा रहे हैं। स्नातक कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते छात्र संख्या और अधिक घटती जा रही है।
प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में बच्चों का सकल नामांकन 99.88 प्रतिशत तथा शुद्व नामांकन 80.90 प्रतिशत ही है। उत्तराखण्ड में वर्तमान में सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा संचालित मान्यता प्राप्त प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 20,590 है। इनमें 15,692 प्राइमरी स्कूल हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक पढ़ने वाले बालक-बालिकाओं की संख्या 11,22,847 है। लेकिन यह संख्या कक्षा आठ तक पहुंचे-पहुंचते मात्रा 5,84,672 रह गयी। जब आठवीं कक्षा में पांच लाख से अधिक बच्चे हैं तो नवीं या दसवीं में इतने नहीं तो इससे थोड़े से कम तो होने ही चाहिये। लेकिन वर्तमान में प्रदेश के मान्यता प्राप्त माध्यमिक स्कूलों में कक्षा 10 में केवल 2,00,769 बालक एवं बालिकाएं पढ़ रही हैं। बारहवीं तक यह संख्या घट कर 1,62,100 ही रह गयी है।

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