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सम्पादकीय

सद्भावना पूर्वक हो हल

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विगत दिनों इनेलो की ओर से सतलुज-यमुना लिंक नहर के निर्माण की मांग करते हुए हरियाणा व पंजाब की सीमाओं पर यातायात रोकने का आह्वान किया गया, लेकिन पंजाब, हरियाणा राज्यों की सरकारों ने इनेलो के इस बंद को विफल कर दिया।

हरियाणा सरकार ने इनेलो के प्रभाव को प्रभावहीन करने के लिए वैकल्पिक रास्ते यातायात को उपलब्ध करवा दिए और पंजाब का हरियाणा सीमा में निर्बाध यातायात चला। इसी तरह हरियाणा से भी यातायात पंजाब में आसानी से दाखिल हुआ।

इनेलो को मुख्य मार्गों पर यातायात रोकने के लिए कोई वाहन ही नहीं मिला। फिर इनैलो की इस राजनीतिक नौटंकी से आम हरियाणा निवासी भी भली भांति परिचित थे, सो किसी ने इस अंदोलन में भाग लेने की जहमत नहीं उठाई।

उधर, हरियाणा में दूसरे विपक्षी दल कांग्रेस ने अभी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर टकटकी लगा रखी है। सुप्रीम कोर्ट की भी नसीहत है कि राजनेता बन्द आदि से आम जन को परेशान नहीं करें, बल्कि मिल बैठकर इस मुद्दे का हल निकालें।

एसवाईएल का मुद्दा काफी जटिल हो गया है। इस मुद्दे में हरियाणा वासियों के साथ यदि सबसे बड़ा धोखा किया है तो वह कांग्रेस व इनेलो ने ही किया है। पिछले 40 वर्ष से एसवाईएल नहर विवादों में चल रही है,

लेकिन जब जब भी इनेलो या कांग्रेस की सरकार हरियाणा में बनी राजनीतिक तौर पर दोनों ही दलों ने चुप्पी साध ली, जबकि इनके बड़े भाईयों अकाली दल व पंजाब कांग्रेस नेताओं ने पंजाब के लिए पानी रोककर रखने का कोई भी मौका नहीं चूका।

अब भी यदि हरियाणा के विपक्षी दल एवं सरकार चाहती है कि हरियाणा को उसके हिस्से का पानी मिले, तो ये केन्द्र पर दवाब बनाकर पंजाब से पानी नहीं तो उसके हिस्से का केन्द्र से जारी होने वाला फंड हरियाणा को दिलवाएं कि या तो पंजाब हरियाणा के हिस्से का पानी दे या फिर उसकी आर्थिक हानि की भरपाई करे।

चूंकि पंजाब लंबे समय से हरियाणा के पानी को रोककर अपना कृषि व शहरीकरण क्षेत्रों में विकास कर रहा है। केन्द्र सरकार को पंजाब-हरियाणा ही नहीं, देश भर में राज्यों में छिड़े प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे के विवादों को एक केन्द्रीय नीति से निपटाना चाहिए।

जल की यदि बात करें, तब इस पर राज्यों की बजाय केन्द्र का अधिकार हो। हरियाणा वासियों एवं राज्य सरकार को पानी की कमी को दूर करने के लिए अन्य विकल्प भी प्रयोग करने चाहिए।

वनारोपण एवं वाटर रिचार्जिंग से राजस्थान के कई डार्क जोन अब जल सुलभ क्षेत्र में बदल चुके हैं। यह हरियाणा में भी संभव हो सकता है। बशर्ते राजनीति छोड़कर वास्तव में कुछ किया जाए। पंजाब पानी बहुल क्षेत्र है, उसे भी चाहिए कि वह अपनी नदियों, नहरों, कुओं की संभाल करे।

भूमिगत जल को बचाए, ताकि बाकी पड़ोसी राज्यों को भी पानी मिल सके। सबके सहयोग से सबका विकास संभव है। राजनीति तो महज बांटती है और संसाधनो को बर्बाद ही करती है, जिसे कि नहीं होने दिया जाए।

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