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पुराने दोस्त को मनाने की पहल

स्ता रीय द्रुग लुछे नोविख द्वुखह्ण-यानी दो नये दोस्तों से एक पुराना दोस्त बेहतर। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यही कहते हुए बातचीत शुरू की और पिछले कुछ समय से उखड़े उखड़े से नजर आ रहे रूस को मनाने की पहल की। सात दशक पुराने भारत-रूस के अप्रतिम संबंधों को आज इस वाक्य से एक नयी उर्जा और ताजगी मिली। ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत-रूस के शीर्ष नेताओं की यह मुलाकात कई मायनों में खास थी। राष्ट्रपति पुतिन से प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात में उरी में आतंकी हमले और उसके बाद भारत की ओर से की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर भी चर्चा हुई और रक्षा के क्षेत्र में 16 बड़े करार भी हुए। रूस के साथ ऐसे करार नये नहीं हैं। नया है रूठे रूस को मनाने की यह पहल।
देखिये, इतिहास कैसे करवट लेता है। याद करिये-16 दिसंबर 1971 की तारीख को। जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश से अलग कर दिया था और जिस लड़ाई में रूस ने हमारा पूरा साथ दिया था। यह वह ऐतिहासिक दिन था, जब मात्र 14 दिनों की लड़ाई के बाद पाकिस्तानी फौज के 93 हजार सैनिकों ने ढाका (बांग्लादेश) में भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। पाकिस्तान पर हुई ऐतिहासिक जीत के इस दिन को भारत विजय दिवस के रूप में मनाता है।
यह वह लड़ाई थी, जिसमें जब भारतीय सेना कराची पर कब्जे की तैयारी करने लगी थी तो तब उसके रहनुमा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने बौखला कर 8 दिसंबर 1971 को भारत के खिलाफ किंग क्रूज मिसाइलों, सत्तर लड़ाकू विमानों और परमाणु बमों से लैस अपने सातवें युद्धक बेड़े यूएसएस एंटरप्राइजेज को दक्षिणी वियतनाम से बंगाल की खाड़ी की ओर कूच करने का आदेश दे डाला था। दस अमेरिकी जहाजों वाले इस नौसनिक बल को अमेरिका ने टास्क फोर्स 74 का नाम दिया था। तब अमेरिका के इशारे पर ब्रिटेन ने भी अपने विमानवाहक ΄ोत ईगल को भारतीय जल सीमा की ओर रवाना कर दिया था। भारत को घेरने के लिए अमेरिका ने चीन को भी उकसाया। लेकिन चीन सामने नहीं आया। कई अन्य देशों के माध्यम से पाकिस्तान को लड़ाकू विमानों और हथियारों की मदद करवायी गयी थी। फिर भी भारत घबराया नहीं।
इस मौके पर रूस (तब सोवियत संघ) ने यादगार तरीके से भारत का साथ दिया था। सोवियत राष्ट्रपति ब्रेझनेव ने 13 दिसंबर को अपनी परमाणु संपन्न पनडुब्बी व विमानवाहक ΄ोत फ्लोटिला को एडमिरल ब्लादीमिर क्रुग्ल्याकोव के नेतृत्व में भारतीय सेना की रक्षा के लिए भेजा तो अमेरिकी-ब्रिटिश सेना ठिठक गयी। इस लड़ाई से महज तीन माह पहले 9 अगस्त 1971 को भारत ने रूस के साथ एक बीस वर्षीय सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किये थे। अमेरिका का सातवां बेड़ा जब बंगाल की खाड़ी में घुसा, तो रूसी नौसेना को भारत के बचाव में पहले से खड़ी देखकर अमेरिकी नौसैनिक कमांडर ने ΄ोंटागन को संदेश दिया-सॉरी सर! वी आर लेट। दे हैव (रूसी सेना) आॅलरेडी एराइव्ड !!
आखिरकार बांग्ला मुक्ति वाहिनी के आंदोलन को कुचलने के लिए 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने ‘आॅपरेशन चंगेज’ के कोड नाम से पूर्वी पाकिस्तान समेत अनेक भारतीय ठिकानों पर हवाई हमला बोल दिया। भारत ने इसका करारा जवाब दिया और महज 14 दिनों में ही पाक को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। युद्ध के ऐसे नाजुक मौके पर रूस का भारत के साथ पूरी ताकत से खड़ा होना एक ऐसा तथ्य है, जिसका भारत हमेशा ऋणी रहेगा।
अगर अमेरिका पर 9/11 का हमला नहीं होता और आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की भूमिका उजागर न हुई होती, तो शायद अमेरिका आज भी पाकिस्तान के ही पक्ष में खड़ा होता। हकीकत देखिये कि जिस पाकिस्तान को अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपना अहम साझीदार बनाकर चल रहा था, उसी पाकिस्तान ने अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन ओसामा बिन लादेन को अपने घर में छुपा रखा था। अमेरिका के दिये धन और हथियारों का इस्तेमाल वह भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में ही कर ही रहा है।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाज΄ोयी ने अमेरिका को अपना स्वाभाविक सहयोगी करार देकर भारत-अमेरिका संबंधों के एक नये युग का सूत्रपात किया था। पर अमेरिका को भारत की दोस्ती की अहमियत जरा देर से समझ में आयी। साथ ही उसे भारत-रूस की दोस्ती से हमेशा ईर्ष्या भी रही है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत कोई हथियार रूस से खरीदे। बीते वर्ष राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत-रूस के बीच रक्षा सौदों पर यह कहकर क्षोभ जताया था कि यह रूस के साथ सामान्य संबंधों का समय नहीं है। तब प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहकर अमेरिका को जवाब दिया था कि रूस से हमारे संबंध बहुत पुराने और अतुलनीय हैं, और वह हमारा सबसे महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी बना रहेगा।
दरअसल चाहे रूस हो या अमेरिका या अन्य देश, सभी भारत को बाजार मानते हैं। भारत ने उनके साथ बड़े सौदे किये तो वे खुश, नहीं तो नाराज। इसीलिए भारत ने अपनी रणनीति में दो बड़े बदलाव किये हैं। किसी एक देश पर रक्षा संबंधी सौदों के लिए निर्भर नहीं रहना और दो-देश में स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर रक्षा मामलों में आत्म निर्भरता।
आज अमेरिका और भारत के सामने असली चुनौती चीन ही है। चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका और भारत को एक दूसरे का साथ चाहिए। पर भारत अपने पुराने साथी रूस को पाक-चीन के पाले में डालने की गलती भी नहीं कर सकता। लिहाजा इन सबके बीच एक संतुलन कायम करना होगा।
गनीमत है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने समय रहते रूस के साथ बिगड़ते संबंधों को संभाल लिया। भारत-रूस की दोस्ती में आयी इस नयी ताजगी से चीन-पाकिस्तान का परेशान होना लाजिÞमी है। पुतिन से बातचीत के आखिर में मोदी ने कहा-इंडियाई रस्सीया-रुका अब रुकु व स्वेतलोय बदूशीय यानी सुनहरे भविष्य के लिए भारत और रूस साथ साथ। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश पूर्ववत करीबी दोस्त और साझीदार बने रहेंगे।

ओंकारेश्वर पांडेय

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