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बातचीत के जरिए सुलझे, भारत-चीन सीमा विवाद

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विश्व की दो बड़ी महाशक्ति, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर आपसी रिश्ते एक बार फिर तनावपूर्ण हो गये हैं। दुखद यह है कि संबंध सुधारने की दिशा में कोई भी पक्ष पहल करता नहीं दिख रहा है। जर्मनी के हैम्बर्ग में शुरू हुए, जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता की उम्मीद जगी थी लेकिन,

चीन के विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में पहले ही स्पष्ट कर दिया गया कि सीमा पर माहौल खराब होने की वजह से उनकी आधिकारिक मुलाकात नहीं हो सकती। लिहाजा, शुक्रवार को दोनों राष्ट्राध्यक्षों के आपस में मिलने के बाद भी वह मुलाकात अधूरी और केवल औपचारिकता भर रह गई।

स्पष्ट है कि सीमा विवाद को लेकर चीन जिस तरह का अड़ियल रुख अपना रहा है, उससे विवाद के लंबे समय तक बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जी-20 शिखर सम्मेलन में द्विपक्षीय कूटनीतिक मुलाकात से इनकार करने से पूर्व, चीन ने भारतीय पत्रकारों का तिब्बत दौरा भी रद्द कर दिया है।

दरअसल, चीन के आमंत्रण पर ही भारतीय पत्रकारों का एक दल 8 जुलाई से 15 जुलाई तक तिब्बत दौरे पर जाने वाला था, लेकिन सीमा विवाद का हवाला देकर चीन ने इस दौरे को भी रद्द कर दिया है। चीन के इस तरह के दोयम रवैये से लगता है कि वास्तव में वह इस विवाद का स्थाई हल नहीं चाहता है।

भारत और चीन, एक दूसरे के पड़ोसी देश जरुर हैं लेकिन, दोनों देशों के मध्य भौगोलिक क्षेत्र को लेकर तनाव वर्षों से कायम रहा है। दोनों के मध्य सीमा विवाद को सुलझाने के लिए 1914 में मैकमोहन रेखा खींची गई थीं

बावजूद इसके, भारत-चीन सीमा पर गतिरोध पिछले कई दशकों से जारी है। दरअसल, जम्मू कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन के साथ जुड़ी भारत की 3,488 किमी की लंबी सीमा हमेशा से विवादों का केंद्र रही है। गौरतलब यह भी है कि इस सीमा विवाद को लेकर 1962 और 1967 में दोनों देशों के बीच युद्ध भी हो चुका है।

जबकि, हाल के वर्षों में यह देखा जा रहा है कि चीन का भारत में अवैध प्रवेश तथा भारतीय भूमि के अतिक्रमण के अपने नापाक मंसूबों को जाहिर करने से बाज नहीं आ रहा है। इसी क्रम में, कभी चीनी सेना जबरन भारतीय सीमा के अंदर तक घुस आती है तो कभी, उनके सैनिक भारतीय बंकर को नष्ट कर देते हैं।

भारत के प्रति चीन हमेशा से दोहरा रवैया अपनाता रहा है। 1954 के ऐतिहासिक पंचशील समझौते और पंडित नेहरू के भाईचारे पर केंद्रित, ‘भारतीय-चीनी भाई-भाई’ के नारे को धता बताते हुए चीन ने 1962 में भारत से युद्ध किया था।

हालांकि, इसके पांच वर्ष बाद 1967 में भी चीन भारत पर आक्रमण की फिराक में था लेकिन, भारतीय सैनिकों ने उनके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया था। खैर, दोनों युद्ध को हुए सालों बीत चुके हैं

लेकिन, अब भी दोनों सरकारें 1962 के युद्ध का हवाला देकर एक-दूसरे को नसीहत देती दिख रही हैं। जबकि, पिछले 55 सालों में दोनों देशों की राजनीति और अर्थव्यवस्था में काफी बदलाव आ चुका है लेकिन, चीन के अड़ियल रवैये पर किसी तरह का बदलाव नहीं आया है। 2013 में लद्दाख में सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच गतिरोध करीब 21 दिनों तक बरकरार रहा था लेकिन, इस बार सिक्किम में उत्पन्न टकराव के एक महीने बाद भी कोई पक्ष शांति की पहल करता नहीं दिख रहा है।

मौजूदा टकराव की शुरूआत तब हुई, जब तिब्बत-भारत-भूटान मार्ग पर, चीन ने बिना किसी की अनुमति से सामरिक सड़क बनाने की शुरूआत कर दी जो, 1890 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और चीन की किंग सरकार के बीच हुए सीमा समझौते का साफ उल्लंघन था। इस पर, भूटान और भारत ने आपत्ति जताई।

अवैध सड़क निर्माण रोकने के लिए भारत ने अपने सैनिक भेज दिये। जवाब में चीन ने भी ऐसा ही किया। इसके बाद से, सिक्किम का डोकालाम पठार क्षेत्र ‘रेड जोन’ में तब्दील हो चुका है। आलम यह है कि विवादित क्षेत्र में हजारों भारतीय तथा चीनी सैनिक गश्त लगा रहे हैं। चीन के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह उन्हीं समझौतों को मानता है, जो उसके पक्ष में होता है।

चीन 1890 के उक्त समझौते को मानने से हमेशा से इंकार करता आया है। दूसरी तरफ, 2007 में भूटान से हुई मैत्री संधि के तहत भारत और भूटान ने एक-दूसरे के राष्ट्रीय हितों में निकटता से साथ देने का वादा किया था।

इसी बाबत, भारत ने विवादित स्थल पर सड़क निर्माण से चीन को रोका क्योंकि, इससे भारत की सुरक्षा व संचार व्यवस्था की गोपनीयता को भी खतरा हो सकता था। फिलहाल, दोनों देशों द्वारा जारी बयानों और विवादित स्थल पर बंदूकधारी हजारों सैनिकों को देखकर रिश्तों की तल्खी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

उधर, चीनी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ के संपादकीय में दोनों देशों के मध्य युद्ध की नौबत आने की संभावना भी व्यक्त कर दी गई है। चीन के इसी सरकारी अखबार के माध्यम से भारत को रोजाना धमकियाँ भी मिल रही हैं।

चीन और भारत विश्व के दो सर्वाधिक जनसंख्या वाले तथा विशाल अर्थव्यवस्था के साथ तेजी से उभरते एशियाई राष्ट्र भी हैं लेकिन, चीन के साथ दिक्कत यह है कि उसे भारत की आर्थिक उन्नति तथा अमेरिका से मीठे संबंध व निकटता हमेशा से चुभती रही है। ‘वन बेल्ट, वन रोड’ फोरम से भारत के बहिष्कार के बाद से ही चीन आग-बबूला हो उठा है।

चीन की दादागिरी का अपना एक अलग इतिहास रहा है। अपने पड़ोसी देशों की जमीन पर धौंस जमाना उसकी पुरानी फितरत रही है। दक्षिणी चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर फिलीपींस, ताइवान, वियतनाम, इंडोनेशिया और अन्य राष्ट्रों के साथ उसका विवाद उल्लेखनीय है। वहीं, जापान के साथ पूर्वी चीन सागर के द्वीपों को लेकर वह झगड़ता रहा है।

जबकि, ताइवान पर भी वह अपना पूरा अधिकार जमाना चाहता है। इसी तरह, उत्तर कोरिया, नेपाल, रुस के कुछ हिस्सों पर वह अपना दावा करता आया है। चीन के इस रवैये की वजह से उसकी आलोचना संपूर्ण विश्व में होती रहती है।

अगर, मौजूदा परिस्थिति की बात की जाए तो, दोनों देश (भारत और चीन) सामरिक मोर्चे पर पूरी तरह सक्षम हैं। इस मामले में, किसी एक को कम आंकना गलत होगा। दोनों के पास युद्ध के लिए अत्याधुनिक हथियार और आवश्यक तकनीक दोनों मौजूद हैं लेकिन,

मूल सवाल यह है कि क्या इस सीमा विवाद का हल केवल युद्ध है? क्या बातचीत के जरिये इसे सुलझाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए? युद्ध समस्या का स्थाई हल नहीं है क्योंकि, युद्ध से तात्कालिक लाभ तो हो सकता है लेकिन, इसके दूरगामी परिणाम दोनों देशों के लिए विपरीत होंगे। विडंबना है कि जब दुनिया में अमन, शांति और सौहार्द की बातें हो रही हैं तब,

दो पड़ोसी एशियाई देश एक-दूसरे के प्रति परस्पर सहयोग की भावना रखने की बजाय, युद्ध करने पर आमादा दिख रहे हैं। भारत और चीन को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार बनने पर जोर देना चाहिए।

भारत-चीन सीमा विवाद से इतर देखें, तो ज्ञात होता है कि आज पूरी दुनिया ही बारुद के ढेर पर बैठी है। ऐसे में, एक चिंगारी लगने मात्र से सृष्टि खाक हो जाएगी। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि तृतीय विश्व युद्ध अब अधिक दूर नहीं है। यह जानने-समझने के बावजूद, आज विश्व में विभिन्न राष्ट्रों के बीच तनातनी के माहौल हैं।

अत्याधुनिक हथियारों की बदौलत, एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने की लालसा ने एक-दूसरे के प्रति विद्वेष की भावना उत्पन्न की है। विडंबना है कि विश्व के अधिकांश राष्ट्र आज लोकतांत्रिक व्यवस्था को अंगीकार कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, कमजोर देशों पर एकाधिकार की संकीर्ण सोच विश्व शांति के लिए खतरा साबित हो रही है। ऐसी परिस्थिति में, संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

-सुधीर कुमार

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