लेख

चीनी माल के बहिष्कार के मूड में देश

आज जब पाकिस्तान की आतंकी हिमाकत का पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए जवाब देकर भारत ने यह साफ कर दिया है कि अब इस मुद्दे पर वह प्रखर प्रतिरोध की नीति पर चलेगा तो चीन की प्रतिक्रिया हतप्रभ करने वाली है। यूरोप से लेकर दक्षिण एशिया तक तमाम मुल्क जहां भारत के स्टैंड के साथ हैं, वही आतंकवाद प्रायोजक पाक के कंधे पर अब भी चीन का हाथ है। भारत में चीन के इस रुख को लेकर गहरी प्रतिक्रिया है। देशवासियों का जागा-सोया राष्ट्रप्रेम इस मुद्दे पर स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रवाद की जुनूनी आंच में तपने लगा है। देश की हिफाजत और तिरंगे की शान की ललकार के साथ कई उत्साही मंसूबे देश-समाज में आकार ले रहे हैं। इनमें सबसे दिलचस्प है चीनी सामान का बहिष्कार।
अटल बिहारी वाजपेयी के सरकार के जमाने में तब के रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीस की इस बात को लेकर काफी आलोचना होती थी कि वे पाकिस्तान से ज्यादा चीन को लेकर सुरक्षा खतरे की बात कहते थे। उन्होंने उस दौर में चीन को भारत का दुश्मन नंबर एक तक कहा था। पर तब जिन लोगों को फर्नांडीस की बातें ऊटपटांग लगती थी, आज वे भी उन्हीं की तरह सोचने को मजबूर हैं। दरअसल चीन को लेकर भारतीयों के मन में गुस्से की और भी कई वजहें हैं। एक तो पिछले दिनों चीन ने संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को मोस्ट वांटेंड आतंकी करार दिए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल किया। उससे पहले एक और भड़काऊ फैसले में उसने ब्रह्मपुत्र नदी की तिब्बत से भारत होकर आने वाली एक सहायक नदी की धारा को रुकवा दिया।
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से तो भारत को लेकर चीनी मंशा खुलकर सामने आ गई है। लिहाजा भारत में लोगों के बीच यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक तेजी से बढ़ रही है कि हम उस देश को अपने यहां करोड़ों रुपए का मुनाफा क्यों कमाने दें, जो हमारे खिलाफ पाकिस्तान की पीठ ठोकने में लगा है। दिलचस्प है कि यह सब तब हो रहा है जब देश में त्योहारों का सीजन है। दशहरे से लेकर दिवाली तक बाजार में खासी रौनक रहने वाली है। लेकिन इस रौनक में संभव है कि इस बार चीनी रंग थोड़ा फीका नजर आए। खासतौर पर दिवाली के मौके पर बाजारों में दिखाई देने वाले चीनी लड़ियों-पटाखों, खिलौनों-मूर्तियों आदि के बहिष्कार के लिए सोशल मीडिया में मुहिम चल रही है। संघ परिवार के कई संगठन तो बहष्किार के इस आह्वान को आगे बढ़ा ही रहे हैं, कारोबारियों, युवाओं और महिलाओं तक की कई संस्थाओं ने चीनी माल के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है।
अगर भारत में चीनी सामान का बहिष्कार वाकई एक कारगर होता है, तो यह व्यापारिक लिहाज से चीन के खिलाफ सचमुच एक बड़ी कार्रवाई होगी। 2006 में दिवाली में चीनी सामानों का भारतीय कारोबार 11 हजार करोड़ का आंका गया था, जो 2012 में बढ़कर 33 हजार करोड़ से भी ज्यादा हो गया। यानी सीधे तीन गुना उछाल। मौजूदा सूरत में इस आंकड़े के 60 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचने का अंदाजा है। एक अनुमान के मुताबिक चीनी सामानों की वजह से भारतीय बाजार को बीते एक दशक में तकरीबन 200 फीसदी की चपत खानी पड़ी है। यह व्यापारिक सच्चाई भारत में लोगों को अब चुभ रही है। पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम के बाद से देश में सोशल मीडिया से आगे सड़कों पर चीनी सामान पर बैन लगाने की मांग इसी चुभन की प्रतिक्रिया है। लोगों में आज जितना गुस्सा पाकिस्तान के खिलाफ है, उतना ही आक्रोश चीन के खिलाफ भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में लोगों को लगता है कि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन अब चीन का सबसे बड़ा दोस्त है।
चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर जो देश में मूड बन रहा है, उसको लेकर फिलहाल सरकार का कोई घोषित स्टैंड नहीं है। इसके पीछे की वजहें जाहिर तौर पर कूटनीतिक हैं। क्योंकि भूमंडलीय दौर में इस तरह का रुख चाहकर भी किसी देश की सरकार नहीं अपना सकती है। पर इतना तो जरूर है कि जो माहौल देश में बना है, उससे चीनी सामान को लेकर आकर्षण तो कमजोर पड़ेगा ही। रही इसके तार्किक और दूरगामी प्रभाव के आकलन की तो इसको लेकर कुछ सवाल भी अभी से उठने शुरू हो गए हैं। जिस फेसबुक-व्हॉट्सऐप पर चीनी सामान की होली जलाने जैसे आह्वान फॉरवर्ड किए जा रहे हैं, वहीं कुछ लोग इस राष्ट्रवादी आह्वान को लेकर आशंका भी जता रहे हैं। खासतौर पर स्मार्टफोन को लेकर यह कहा जा रहा है कि इसे त्यागने का फैसला आसान नहीं होगा।
इंटरनेशनल डाटा कॉर्पोरेशन (आईडीसी) की इस साल की दूसरी तिमाही की रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान भारत में कुल 2.75 करोड़ स्मार्टफोनों की बिक्री हुई। बिक्री के आधार पर दूसरी तिमाही में चीनी कंपनी लेनोवो बाजार में सैमसंग (दक्षिण कोरियाई कंपनी) और माइक्रोमैक्स (भारतीय कंपनी) के बाद तीसरे नंबर पर रही। इस दौरान कुल बिके स्मार्टफोनों में 7.7 प्रतिशत लेनोवो-मोटोरोला के थे। मोटोरोला को लेनोवो ने 2014 में खरीद लिया था। इस साल की दूसरी तिमाही में लेनोवो के अलावा तीन अन्य चीनी वेंडरों ने 10 लाख से अधिक स्मार्टफोन भारत में बेचे। इस तरह केवल चार चीनी कंपनियों ने मिलकर साल की दूसरी तिमाही में 50 लाख से अधिक स्मार्टफोन भारत में बेचे। ये आंकड़ा तो चीनी कंपनियों का है।
साफ है कि चीन को लेकर भड़के गुस्से को अगर नैतिक और तार्किक धार देनी है, तो देश को अपनी लालच, आदत और व्यवहार के स्तर पर कुर्बानी की बड़ी चुनौती के लिए तैयार होना पड़ेगा। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर यह मानना मुश्किल है कि महज पटाखों-लड़ियों, खिलौनों, मूर्तियों तक अपने बहिष्कार को सीमित कर हम शायद ही चीन को कोई बड़ा और कड़ा संदेश दे पाएं। देखना दिलचस्प होगा कि वे संस्थाएं और समूह जो चीनी सामान के बहिष्कार को एक नैतिक और सामयिक तकाजे के तौर पर देश के सामने रख रहे हैं, वे आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर क्या अभिमत प्रकट करते हैं। जाहिर है कि देश अपने राष्ट्रप्रेम को राष्ट्रवाद की अलख में तब्दील करते हुए चुनौती और त्याग के लिए कितना तत्पर होता है, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।  प्रेम प्रकाश 

लोकप्रिय न्यूज़

To Top