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भीष्म साहनी को कोई कैसे भुला सकता है?

Bhishma Sahni

प्रगतिशील और प्रतिबद्ध कथाकार, नाटककार भीष्म साहनी की आज 103वी जयंती है। वे इतने बड़े रचनाकार हैं कि उनको बार-बार, लगातार याद किया जाना बेहद जरूरी है। भीष्म जी की रचनाशीलता मुख्तसर नहीं है, बल्कि इसका दायरा काफी लंबा है। उपन्यास, कहानियां, नाटक, आत्मकथा, लेख और लेखन एवं कला की तमाम दीगर विधाओं में उन्होंने अपनी कलम निरंतर चलाई। भीष्म जी के उपन्यास-‘तमस’, ‘कुन्तो’, ‘बसंती’, ‘कड़ियां’, ‘झरोखे’, ‘मय्यादास की माड़ी’।

कहानी संग्रह-‘निशाचर’, ‘पाली’, ‘डायन’, ‘शोभायात्रा’, ‘वांडचू’, ‘पटरियां’, ‘भटकती राख’, ‘पहला पाठ’। नाटक-‘कबिरा खड़ा बाजार में’, ‘हानूश’, ‘माधवी’, ‘मुआवजे’ और आत्मकथा-‘आज के अतीत’ को भला कौन भूल सकता है ? भीष्म साहनी ने ज्यादातर कहानियां मध्य वर्ग के ऊपर लिखी हैं। मध्य वर्ग के सुख-दु:ख, आशा-निराशा, पराजय-अपराजय उनकी कहानियों में खुलकर लक्षित हुई हैं। ‘चीफ की दावत’, ‘वांड्चू’ जैसी उनकी कई कहानियां, हिंदी कथा साहित्य में खास मुकाम हासिल कर चुकी हैं।

कहानी ‘चीफ की दावत’ साल 1956 में साहित्य की लघु पत्रिका ‘कहानी’ में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी को प्रकाशित हुए बासठ साल हो गए, लेकिन यह कहानी मौजूदा दौर में भी आधुनिक मध्य वर्ग की सोच की नुमाइंदगी करती है। इस वर्ग की सोच में आज भी कोई ज्यादा बड़ा फर्क नहीं आया है। भारत के बंटवारे पर हिंदी में जो सर्वक्षेष्ठ कहानियां लिखी गई हैं, उनमें से ज्यादातर भीष्म साहनी की हैं। उन्होंने और उनके परिवार ने खुद बंटवारे के दु:ख-दर्द झेले थे, यही वजह है कि उनकी कहानियों में बंटवारे के दृश्य प्रमाणिकता के साथ आएं हैं। कहानी ‘आवाजें’, ‘पाली’, ‘निमित्त’, ‘मैं भी दिया जलाऊंगा, मां’ और ‘अमृतसर आ गया है’ के अलावा उनका उपन्यास ‘तमस’ बंटवारे और उसके बाद के सामाजिक, राजनीतिक हालात को बड़े ही बेबाकी से बयां करता है।

उपन्यास ‘तमस’ बंटवारे की पृष्ठभूमि, उस वक्त के साम्प्रदायिक उन्माद और इस सबके बीच पिसते आम आदमी के दर्द को बयां करता है। उनके उपन्यास ‘तमस’ के ऊपर जब निर्देशक गोविंद निहलानी ने ‘तमस’ शीर्षक से ही टेली सीरियल बनाया, तो इसे उपन्यास से भी ज्यादा ख्याति मिली। पूरे देश में लोग इस नाटक के प्रसारण का इंतजार करते। सीरियल को चाहने वाले थे, तो कुछ मुट्ठी भर कट्टरपंथी इस सीरियल के खिलाफ भी थे। उन्होंने सीरियल को लेकर देश भर में धरने-प्रदर्शन किए। यहां तक कि दूरदर्शन के दिल्ली स्थित केन्द्र पर हमला भी किया। लेकिन जितना इस सीरियल का विरोध हुआ, यह उतना ही लोकप्रिय होता चला गया।

अविभाजित भारत के शहर रावलपिंडी में 8 अगस्त 1915 को जन्मे भीष्म साहनी ने अपनी आला तालीम लाहौर में पूरी की। बंटवारे के बाद उनका पूरा परिवार भारत आ गया। देश के कई विश्वविद्यालयों में उन्होंने अध्यापन का कार्य किया। साल 1957 से लेकर 1963 तक मास्कों में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में अनुवादक के तौर पर कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने करीब दो दर्जन किताबों का हिंदी में अनुवाद किया। अध्यापन और अनुवाद के अलावा भीष्म साहनी ने दो साल ‘नई कहानियां’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया।

उनका जुड़ाव प्रगतिशील लेखक संघ से तो था ही, अफ्रो-एशियाई लेखक संघ से भी वे जुड़े रहे। इस संगठन की पत्रिका ‘लोटस’ के कुछ अंकों का संपादन भी उन्होंने किया। साल 1993 से 1997 तक वे साहित्य अकादमी के कार्यकारी समिति के सदस्य रहे। साहित्य, नाटक और संस्कृति के क्षेत्र में भीष्म साहनी के अविस्मरणीय योगदानों को देखते हुए उन्हें कई सम्मानों से नवाजा गया।

साल 1975 में उपन्यास ‘तमस’ के ऊपर उन्हें ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार मिला, तो इसी साल पंजाब सरकार ने भी उन्हें ‘शिरोमणि लेखक अवार्ड’ से सम्मानित किया। भीष्म साहनी के लेखन का सम्मान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुआ। साल 1980 में उन्हें ‘अफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन’ का ‘लोटस अवार्ड’ तो साल 1983 में सोवियत सरकार ने अपने प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से नवाजा। साल 1998 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ अलंकरण से विभूषित किया।

‘तमस’ के अलावा ‘मय्यादास की माड़ी’ भीष्म साहनी का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने बड़े ही विस्तार से यह बात बतलाई है कि किस तरह देश में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना हुई। देशी शासक और सेनापति यदि विश्वासघात नहीं करते, तो देश कभी गुलाम नहीं होता। कहानी, उपन्यास की तरह भीष्म साहनी के नाटक भी काफी चर्चित रहे। ‘कबीरा खड़ा बाजार में’, ‘हानूश’, ‘माधवी’, ‘आलमगीर’, ‘रंग दे बसंती चोला’ और ‘मुआवजे’ उनके चर्चित नाटक हैं।

उनके सभी नाटकों में वैचारिक प्रतिबद्धता और समाज के प्रति दायित्व साफ नजर आता है। भीष्म साहनी का नाटक ‘तमस’ हो या ‘हानूश’ या फिर ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ इन सभी नाटकों में एक बात समान है, यह नाटक धर्म और राजनीति के भयानक गठजोड़ पर प्रहार करते हैं। उनके कई नाटकों में स्त्री विमर्श भी है। नाटक ‘माधवी’ और ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ स्त्रीवादी नजरिए से लिखे गए हैं। नाटक के बारे में उनकी मान्यता थी, ‘‘नाटक में कही बात, अधिक लोगों तक पहुंचती है।

दर्शकों के भीतर गहरे उतरती है। साहित्य से आगे सामान्यजनों तक बात पहुंचती है।’’ नाट्य लेखन के जरिए समाज को उन्होंने हमेशा एक संदेश दिया। भीष्म साहनी ने कुछ सीरियलों और फिल्मों में अभिनय भी किया। मसलन ‘तमस’, ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ और ‘मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’। भीष्म साहनी, प्रगतिशील लेखक संघ से शुरू से ही जुड़ गए थे, एक बार वे इससे जुड़े तो इसमें आखिर तक रहे। अपने बड़े भाई अभिनेता बलराज साहनी की तरह भीष्म साहनी भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा के भी समर्पित कार्यकर्ता थे।

विचारधारा और संगठन से कभी उनकी निष्ठा नहीं डिगी। साल 1975 में ‘गया सम्मेलन’ में वे प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव बने और इस पद पर साल 1986 तक रहे। इस दौरान उन्होंने संगठन और उसकी विचारधारा फैलाने के लिए जी-जान से काम किया। भीष्म साहनी वैचारिक तौर पर एक परिपक्व रचनाकार थे। सभी मामलों में उनका नजरिया बिल्कुल साफ-साफ था। उनके विचारों में आज के कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब हमें मिलते हैं। यही नहीं एक रचनाकार को अपनी रचना किस तरह से लिखना चाहिए, ये भी उनके लेखन में विस्तार से मिलता है। नौजवान रचनाकार उनके विचारों से काफी कुछ सीख सकते हैं।

अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में विचारधारा और साहित्य के रिश्ते को स्पष्ट करते हुए भीष्म साहनी लिखते हैं, ‘‘विचारधारा यदि मानव मूल्यों से जुड़ती है, तो उसमें विश्वास रखने वाला लेखक अपनी स्वतंत्रता खो नहीं बैठता। विचारधारा उसके लिए सतत प्रेरणास्त्रोत होती है, उसे दृष्टि देती है, उसकी संवेदना में ओजस्विता भरती है। साहित्य में विचारधारा की भूमिका गौण नहीं है, महत्वपूर्ण है। विचारधारा के वर्चस्व से इंकार का सवाल ही कहां है। विचारधारा ने मुक्तिबोध की कविता को प्रखरता दी है।

ब्रेख्त के नाटकों को अपार ओजस्विता दी है। यहां विचारधारा की वैसी ही भूमिका रही है, जैसी कबीर की वाणी में, जो आज भी लाखों-लाख भारतवासियों के होठों पर है।’’ भीष्म साहनी एक कुशल संगठनकर्ता थे। प्रलेस के महासचिव के तौर पर उन्होंने देश भर में इसकी विचारधारा फैलाने का काम किया। भारतीय साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन और प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका को वे महत्वपूर्ण मानते थे।

भीष्म साहनी एक लंबी जिंदगी जिये। अपनी जिंदगी का हर पल उन्होंने जी भर के जिया और आखिर तक अपने पाठकों को पढ़ने के लिये कुछ न कुछ दिया। उनके निधन के बाद हिंदी के एक और बड़े लेखक कमलेश्वर ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए जो लिखा, वह आज भी हिंदी साहित्य में उनके अवदान और उनकी लोकप्रियता को जानने का पैमाना हो सकता है, ‘‘भीष्म साहनी को याद करने का मतलब है, उनके पूरे समय को याद करना।

बीसवीं सदी पर उनका नाम इतनी गहराई से अंकित है कि उसे मिटाया नहीं जा सकता। आजादी के साथ और इक्कीसवीं सदी की 11 जुलाई 2003 तक यह नाम हिंदी कथा साहित्य और नाटक लेखन का पर्याय रहा है। ऐसी अनोखी लोकप्रियता भीष्म साहनी ने प्राप्त की थी कि प्रत्येक तरह का पाठक उनकी रचना की प्रतीक्षा करता था। उनका एक-एक शब्द पढ़ा जाता था।

किसी सामान्य पाठक से भी यह पूछने की जरूरत नहीं पढ़ती थी कि उसने भीष्म की यह या वह रचना पढ़ी है या नहीं। उनकी कहानी या उपन्यास पर एकाएक बात शुरू की जा सकती थी। ऐसा विरल पाठकीय सौभाग्य या तो प्रेमचंद को प्राप्त हुआ था, या हरिशंकर परसाई के बाद भीष्म साहनी को प्राप्त हुआ और यह भी विरल घटना है कि भीष्म को जो यश हिंदी से मिला वह उनके जीवित रहते हिंदी का यश बन गया। ऐसा दुर्लभ सौभाग्य भी किस रचनाकार को प्राप्त होता है ? भीष्म जैसे कालजयी रचनाकर को कोई कैसे भुला सकता है ?’’

जाहिद खान

 

 

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