सम्पादकीय

दिल्ली को दी मुस्कुराने की वजह…

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इतिहास के पन्ने पलटें तो पाते हैं कि देश की राजधानी दिल्ली का इतिहास महाभारत जितना ही पुराना है। इस जगह का कभी नाम इंद्रप्रस्थ था यहां पांडवों का निवास था। दिल्ली लगभग पिछली 5 शताब्दियों से देश की बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल की गवाह रही है। मुगल, खिलजी और तुगलक शासकों ने दिल्ली पर राज किया।

वहीं 1803 में दिल्ली ब्रिटिश शासकों के अधीन आ गई। लेकिन जांबाज़ क्रांतिकारियों के दम पर 1947 में देश आजाद हुआ और दिल्ली देश की राजधानी बन गई। दिल्ली के इतिहास में ज्यादा तह तक जाना मुनासिब नहीं लेकिन सबसे बड़ी बात जो दिल्ली के ज्यादातर शासकों, आक्रमणकारियों की रही वह यह थी कि वे सब दिल्ली को केवल लूटने के मकसद से आते थे।

भाव दिल्ली रोई है, इतिहास में और मौजूदा वक्त में भी खूब। 1947 में देश आजाद हुआ और राजधानी दिल्ली सत्ता का केंद्र हो गई। तब से लेकर अब तक पूरा देश दिल्ली से चलता है। समय समय पर सरकारें बदलती रही हैं लेकिन एक बात कॉमन रही है कि हर राज्य, हर व्यक्ति की जब कहीं सुनवाई न हो तो वह दिल्ली की तरफ रुख करता है और दिल्ली उसे निराश नहीं करती। देश के दक्षिण राज्य तामिलनाडू, पश्चिम के गुजरात, पूर्व के बंगाल और उत्तर के हरियाणा, पंजाब आदि के किसान अपनी मांग केंद्र, राज्य सरकार तक पहुंचाने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने देते हैं।

2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ क्रप्शन फ्री मूवमेंट भी दिल्ली से शुरू हुआ। 2012 में निर्भया कांड के बाद दिल्ली में लोग इकट्ठा हुए और महिलाओं के अधिकारों की मांग की। दिल्ली असल मायने में दानी है, वह दे रही है वर्षांे से लोगों की जरूरतों, आशाओं को पूरा करने का बोझ उठा रही है। सीधे शब्दों में कहें तो मांग कोई भी हो सभी को आखिरी उम्मीद दिल्ली से ही होती है। सब दिल्ली से कुछ न कुछ मांग रहे हैं। दिल्ली से ग्रहण कर रहे हैं और दिल्ली उन्हें हमेशा कुछ न कुछ दे रही है।

स्वास्थ्य, धन, व्यापार, शिक्षा आदि सब, जो दिल्ली से कुछ लेने गया वह दिल्ली से खाली नहीं लौटा। लेकिन दिल्ली को भी क्या कोई कभी कुछ देकर आया? किसी ने दिल्ली के दिल पर हाथ रख कर पूछा कि हे दिल्ली तुझे भी कुछ चाहिए? नहीं। सब दिल्ली से मांगने में मशगूल हैं। लगभग 3 करोड़ लोगों को आश्रय, खाना, पानी, हवा, रोजगार देने वाली दिल्ली के एक बहुत बड़े बोझ को हल्का करने की कुछ कोशिशें हुई लेकिन नाकाफी रहीं। वह बोझ था दिल्ली में गंदगी का।

लेकिन 2011 से डेरा सच्चा सौदा, सिरसा के पूज्य संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने दिल्ली सहित पूरे देश के इस बोझ को हल्का करने की ठानी। गंदगी जिसे देखकर हर कोई मुंह फेर कर निकल जाता है, को उठाने का बीड़ा डॉ. एमएसजी ने उठाया। बस फिर क्या था निकल पड़े झाड़ू, तसले लेकर अपने 5-7 लाख श्रद्धालुओं के साथ। दिल्ली को दिया श्रमदान और उसकी छाती पर पड़ा गंदगी का बोझ डेरा सच्चा सौदा ने हल्का किया।

ऐसा एक बार नहीं चार बार हो चुका है। दिल्ली के दिल की नसों में बस चुकी गंदगी जिसे निकालने फिर से पूज्य संत जी रविवार को दिल्ली पहुंचे। 7 लाख श्रद्धालुओं ने श्रमदान कर दिल्ली को मुस्कुराने की वजह दी। दिल्ली से हजारों टन कचरा निकाला गया।
यहां महत्वपूर्ण है कि दिल्ली देश के इतिहास की सबसे बड़ी धरोहर है और एक संत बार-बार इल्तज़ा कर रहें हैं कि देश के इस सम्मान पर गंदगी की चादर मत फैलने दो।

वजह है, क्योंकि ये पूज्य संत देश में दिल्ली के महत्व को जानते हैं, दिल्ली में आने वाले हर विदेशी पर्यटक के मुंह से निकलता ‘डर्टी इंडिया’ जो इन्हें चुभता है। और चुभे भी क्यों न, अपने देश को कोई डर्टी कहे यह किसी देशभक्त को तो गवारा नहीं हो सकता।
एक बार पुन: दिल्ली मुस्कुराई है, और यह भी सही है कि खुशी के समय आप अपनी कई इच्छाएं पूरी करवा सकते हैं। दिल्ली में भी क्षमता है आपकी हर इच्छा पूरी करने की, लेकिन इन संत की बातों को अवश्य अपने ज़हन में रखें।

खुले में गदंगी न फैलाएं, जितना हो सके अपने आस-पास सफाई रखें और देश की धरोहर दिल्ली को देश का ऐसा आइना बनाएं कि कोई दिल्ली पहुंचे तो कहे कि वाकई में ये है ‘शाइनिंग इंडिया’।

अनिल कक्कड़, वरिष्ठ मीडिया कर्मी

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