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हमने रंगों को भी बेरंग कर दिया

Hindi Article, Apartheid, Children, Problem, Global

हम काले हैं, तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…’ मोहम्मद रफी का ये गाना सुनने में तो हमें बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जब यही गाना हमारे समाज की सच्चाई से हमें रुबरु कराता है, तो हम इसे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। समाज की तमाम कुरीतियों और भेदभाव पर तो चर्चा हो जाती है, परन्तु रंग-भेद पर चर्चा…?

रंग-भेद की समस्या सिर्फ हमारे देश की समस्या नहीं है, ये एक वैश्विक समस्या है और हमारे समाज की तो यही खासियत है कि हम उन मामलों मे जरूर हस्तक्षेप करते हैं, जो वैश्विक होती है। लेकिन जाने क्यों यह (रंग-भेद) समस्या वैश्विक होकर भी समाधान की मंजिल तक अब तक नहीं पहुंच पाया है।

कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि हम गोरे-काले रंगों में विश्वास नहीं करते। फिर क्यों आज का युवा समाज शादी के लिए लड़के या लड़की का रंग ही पहले देखता है? अगर हम रंगों में विश्वास नहीं करते, तो क्यों आज भी बाजार में चंद दिनों में गोरे करने की क्रीम और पाउडर अब-तक टिके हुए हैं?

और दिन-प्रतिदिन अपना बाजार बढ़ा रहे हैं? हमारे मन में काले रंग के प्रति कितनी दुर्भावना है, इसके उदाहरण हमें आए-दिन राह चलते दिख जाते हैं। हमने अपने इस भेदभाव से भगवान को भी नहीं बख्शा। हमसे अधिकांश लोगों ने बचपन में अपनी दादी-नानी की तमाम कहानियों में सुना ही होगा कि भगवान श्री कृष्ण जी का रंग सांवला था,

परन्तु एक बात जो सोचने वाली है, वह यह कि अब तक जितने भी सीरियल बने हैं, उनमें कृष्ण जी के बचपन के अवतार को सांवला क्यों नहीं दिखाया गया? अधिकांशत: सभी सीरियल्स में श्री कृष्ण जी का बचपन अवतार गोरा ही होता है। ऐसा नहीं कि ये रंग-विभेद सिर्फ एक ही धर्म में है! दुनिया के तमाम धर्मों में कहीं न कहीं इसका प्रभाव दिख ही जाता है। लेकिन जरूरत अभी दुनिया सुधारने की नहीं है, जरूरत है अभी अपने घर को संवारने की।

हम अगर रंग-विभेद में विश्वास नहीं करते, तो क्यों हमारे सिनेमा और सीरियल (जिसे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग देखता है) के नायक और नायिका सिर्फ गोरे रंगों के होते हैं? गोरे रंग के लिए हम इतने संवेदनशील हैं कि हम जन्म लिए बच्चे को भी अपनी मानसिकता का शिकार बना लेते हैं।

जो बच्चा अभी अपने परिवार जनों को ठीक से नहीं पहचानता, वे भी थोड़ा बड़े होने पर पाउडर लगाकर ही घर से बाहर जाने की जिद्द करता है। रिसर्च के मामले में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र छूटा होगा, जहां हमारे देश में रिसर्च नहीं हुई है,

लेकिन अब तक रंगों के भेदभाव के मामले में किसी बड़ी रिसर्च एजेंसी का रिसर्च सामने नहीं आया। समाज का जो युवा तमाम गलत बातों पर क्रांतिकारी बनने को तैयार हो जाता है, उनमें से ही अधिकांश युवा कॉलेज कैम्पस में काले-गोरे रंगों के बीच दूरी बढ़ाने का काम करते हैं।

हमने फैशन एक्सपर्ट से यह तो खूब सुना होगा कि अगर आप काले हैं, तो ऐसे रंग के कपड़े न पहनें, लेकिन कभी यह क्यों नहीं सुना कि आप गोरे हैं, तो यह रंग के कपड़े न पहने! रंगों के इस भेद का शिकार न केवल लड़कियों को होना पड़ता है,

बल्कि लड़के भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। यहां एक बात यह भी गौर करने वाली है कि इस समस्या का समाधान समस्या में ही छुपा है। अगर सांवले रंग के लोग अपने रंग के कारण मन में बैठे डर को निकाल दे, तो आधी समस्या का समाधान हो जाएगा।

हमें अपने रंग पर नहीं अपने काम पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और रही बात समाज की, तो उसकी स्थिति ऐसी होगी कि उसको पड़ोसी का घर गंदा दिखता है, लेकिन अपने घर पर लगे शीशे की धूल नहीं दिखती।

-सुप्रीया सिंह

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