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हरियाणा में सुधरते लिंगानुपात से जगी उम्मीदें!

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2011 की पिछली जनगणना के बाद, जिस भारतीय प्रदेश ने लिंगानुपात के मामले में सर्वाधिक तरक्की की है, उनमें हरियाणा का नाम सबसे पहले आता है। राज्य-स्थापना के 51 वर्षों के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब हरियाणा में लिंगानुपात 1000 पुरुषों के बरक्स, 900 के जादुई आंकड़े को पहली बार छूते हुए, ऐतिहासिक रुप से 950 पर आ पहुंचा है।

यह अनुपम उपलब्धि न सिर्फ हरियाणा, अपितु देश के लिए भी बेहद खास है। एक समय, हरियाणा की छवि एक ऐसे प्रदेश के रुप में कुख्यात रही थी, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या, आॅनर किलिंग तथा बेटी होने पर गर्भपात से जुड़े मामले बहुत अधिक घटित हो रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में जब तमाम चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हों,

बावजूद इसके लिंगानुपात के मामले में जिस तरह का क्रांतिकारी सुधार हरियाणा में हुआ है, वह देश के अन्य राज्यों के समक्ष एक बेहतर नजीर बन गया है। दरअसल, लिंगानुपात में सकारात्मक सुधार लाकर, हरियाणा ने एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश भी की है कि अगर इरादे अटल हों, तो आपसी एकजुटता से समाज में किसी भी तरह का परिवर्तन या सुधार लाना संभव हो जाता है।

हरियाणा में भी यही सामाजिक सूत्र काम आया।एक तरफ, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर लड़कियों की सुरक्षा तथा शिक्षा को लक्षित ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरूआत की, तो वहीं राज्य सरकार ने लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम-1994 तथा चिकित्सकीय गर्भ समापन कानून-1971 को सख्त बनाकर भ्रूण के अवैध परीक्षण तथा जान-बूझकर कराये जाने वाले अनैतिक गर्भपात को रोकने की कवायद शुरू कर दी।

इसके अलावा, लोगों को जागरुक करने के लिए, सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों द्वारा ढेर सारे अभियान चलाये गये, जिसका सुफल यह हुआ कि लड़कियों के प्रति, लोगों की सोच धीरे-धीरे बदलने लगी और इस वजह से बेटियों की संख्या, पहले से अधिक बढ़ने लगी।

मार्च 2017 में, राज्य सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार कैथल, रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, भिवानी, जींद, फतेहाबाद, पंचकूला, रेवाड़ी, अम्बाला, मेवात, सोनीपत और फरीदाबाद में प्रति 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 900 से कम है, जबकि करनाल, हिसार, यमुनानगर, सिरसा, कुरुक्षेत्र, पानीपत में यही संख्या 950 से अधिक पहुँच चुकी हैं।

यहां, पलवल और महेंद्रगढ़ जिला का विशेष रुप से उल्लेख करना चाहूंगा, क्योंकि पलवल में प्रति 1000 पुरुषों में स्त्रियों की संख्या अब 1217 और महेन्द्रगढ़ में 1279 तक पहुंच गयी है। इन दो जिलों के आंकड़ों पर मैं विशेष जोर इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि, इन दो जिलों ने, 2011 की जनगणना में सर्वाधिक लिंगानुपात के मामले में शीर्ष पर रहे, पुडुचेरी के माहे जिला (1184) को पीछे छोड़ दिया है।

दरअसल, जागरुकता के लिए देशभर में चलाए जा रहे तमाम अथक प्रयासों का ही नतीजा है कि अब बेटियों के प्रति लोगों की परंपरागत सोच बदल रही है। जागरुकता के लिए चलाए गए, ‘सेल्फी विद डॉटर’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना हो या मध्यप्रदेश सरकार की ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ अथवा झारखंड सरकार द्वारा शुरू की गई ‘राष्ट्रीय बालिका प्रोत्साहन योजना’ या फिर ‘सीबीएसई की एक लड़की वाले परिवार को बारहवीं तक की मुफ्त शिक्षा’ की मुहिम; ये सारे कार्यक्रम देश में लाखों लड़कियों के लिए उन्नति की नयी राहें खोल रहे हैं।

आधुनिकता के इस युग में अभी भी विडंबना है कि कुछ राज्यों में पितृसत्तात्मक परिवार प्रणाली के कारण, अत्यधिक पुत्र मोह की भावना तथा कुकुरमुत्ते की तरह खुले जांच-घरों में अवैध और चोरी-छिपे होने वाले भ्रूण जांच के कारण, असंख्य बच्चियां बाहर की दुनिया देखने से पूर्व ही दम तोड़ने को बाध्य कर दी जाती हैं। आशा है, हरियाणा के उदाहरण से प्रेरित होकर लोग बेटियों की रक्षा के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझेंगे।

-सुधीर कुमार

 

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