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मालामाल कर देगी ग्वार की खेती

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विस्तार से जानें औद्योगिक, व्यवसायिक, चारे व हरी सब्जी वाली फसल के बारे में

हरियाणा समेत उत्तर भारत के अनेक शुष्क क्षेत्रों में ग्वार की खेती प्रमुखता से की जाती है। औद्योगिक, व्यवसायिक, चारे व हरी सब्जी वाली फसल के रूप में इस्तेमाल की जा रही ग्वार की डिमांड लगातार बढ़ रही है। इसे खाद्य प्रसंस्करण व हरी खाद वाली फसल के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।

ग्वार चूरी व कोरमा जो ग्वार के गौण उत्पाद हैं, इसमें 42 से 48 फीसद तक प्रोटीन होती है जबकि बीज में यह 31 फीसद होती है। इसका अनेक रूपों में प्रयोग बढ़ने से इसकी खेती फायदेमंद साबित हो रही है। उन्नतशील कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान ग्वार का उत्पादन निम्न प्रकार से बढ़ा सकते हैं। दलहनी फसल : ग्वार की उन्नतशील किस्मे, एच.जी-365, एच. जी-563, एच. जी-870 एवं एच. जी-220 हैं। इसकी बिजाई के लिए 15जून से 15 जुलाई तक समय उचित रहता है।

बिजाई के लिए 5-6 कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ पर्याप्त रहता है। बिजाई के समय 16 किग्रा. फॉस्फोरस तथा 8 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति एकड़ के हिसाब से प्रयोग करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए एक गोड़ाई बिजाई के 25-30 दिन पर व जरुरत पड़े तो दूसरी गोड़ाई “हैण्ड व्हील हो” द्वारा 15 दिन बाद करें। ग्वार की बिजाई से पहले व जमाव के बाद कड़ी फसल में किसी भी खरपतवारनाशी की सिफारिशशुदा नहीं है जबकि किसान भाई बाजार में उपलब्ध गैर सिफारिशुदा खरपतवारनाशियों का प्रयोग करते हैं,

जिससे आगामी सरसों की फसल के जमाव व बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पाया गया है। चारा फसल सूखे को सहन करने के कारण वर्षा पर निर्भर इलाकों में ग्वार मूल्यवान पौष्टिक चारे की फसल है ।

इसको अकेले या ज्वार, बाजरा व लोबिया के सस्थ मिलवा भी बोया जा सकता है। हरे चारे के लिए ग्वार की उन्नत किस्म एचएफ जी- 156, एक लम्बी , शाखादार, खुरदरी पत्तियों वाली नवीनतम किस्म है। यह बोने के बाद चारे के लिए 20 दिन में तैयार हो जाती है। हरी सब्जी वाली फसल ” ग्वार को हरी सब्जी वाली फसल के रूप में भी सफलतापूर्वक लिया जा सकता है।

इसके लिए पूसा नव बहार किस्म है , ग्रीष्म ऋतू में बिजाई के 45 दिनों बाद व वर्षा ऋतू में 55 दिन बाद फलियाँ आणि शुरू हो जाति हैं। औसत पैदावार 20 क्विंटल प्रति एकड़ है। एक एकड़ की बिजाई के लिए 6 कि.ग्रा. बीज की मात्र आवश्यक है। हरी खाद के रूप में: धान – गेहूँ फसल चक्र में भूमि की उर्वरा शक्ति घट रही है ।

गोबर की खाद का प्रयोग कम होता जा रहा है , क्योंकि अधिकांश हिस्सा ईंधन के रूप में प्रयोग हो रहा है। अत: हरी खाद वाली फसलों को उगाना जरूरी हो गया है। हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। रबी की फसल की कटाई के बाद किसी भी दलहनी फसल जैसे -सनई , ढेंचा, मूंग, ग्वार इत्यादि को खेत में बो देना चाहिए।

कीड़ों की रोकथाम :

फसल पर तेले का आक्रमण हो सकता है। इसकी रोक्ताहम के लिए 200 एमएल मैलाथियान 50 ई.सी. को 200लीटर पानी में मिलकर प्रति एकड़ के हिसाब से हस्तचालित यंत्र से छिड़काव करें। यदि फसल चारे के लिए उगाई गई तो छिड़काव के सात दिन तक पशुओं क इसका चारा ना खिलाएं।

ऐसे करें खेत की तैयारी

  • भूमि- बलुई, बलुई दोमट, दोमट, मार, काबर, राकड़, पडुवा।
  • भूमि की तैयारी- दो या तीन जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से मिट्टी को भुरभुरी बनाएं।
  • उन्नत किस्में- टाइप-2, एफएस-277, एचएफजी-119, एचएफजी-156 व आईजीएफआरआई-1
  • बुआई का समय- प्रथम मानसून के बाद जून या जुलाई।
  • बीज दर- 45 से 50 किग्रा.।
  • बुआई की विधि- छिटकवा विधि से की जा सकती है।
  • उर्वरक- 15 से 20 कि.ग्रा. नत्रजन तथा 40 से 50 किग्रा फास्फोरस प्रयोग करें।
  • सिंचाई- खरीफ में बोने से बरसात के चलते कम से कम पानी की आवश्यकता होती है।
  • कटाई- ग्वार की फलियों की तुड़ाई सब्जी के रूप में 45 से 50 दिन में करें। हरी खाद बनाने के लिए 40-45 दिन में पलट दें। बीज के लिए करीब 75 से 80 दिन में कटाई करें।
  • उपज- हरे चारे के रूप में औसत उपज 150 से 225 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। दाने के
    रूप में 25 क्विंटल पैदावार।

 

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