सम्पादकीय

शंकाओं को दूर कर उम्मीदों की तरफ बढ़ता जीएसटी

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जीएसटी लागू होने से पहले जिस तरह की शंकाएं थी, वह दो दिन में ही धुंधली पड़ने लगी हैं। जीएसटी से महंगाई बढ़ेगी, जीडीपी घटेगी, आर्थिक मंदी आएगी, बेरोजगारी बढ़ेगी, किसानों पर भार बढ़ेगा आदि शंकाएं टूटती जा रही हैं।

बाजार में भीड़ कम होना मध्यम वर्ग में दुविधा की देन है। आमतौर पर मध्यम वर्ग सुनी-सुनाई बातों पर एतबार कर लेता है। जीएसटी लागू होने से पहले सस्ता मिलने की बातें सुनकर दुकानों पर भीड़ लगी रही।

ज्यादा सामान खरीद चुके लोगों ने जीएसटी के बाद बाजार में चक्कर कम लगाए। कुछ लोग टैक्स के बारे में ज्यादा जानकारी न होने के कारण जानकारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं और आने वाले दिनों में बाजारों में रौनक लौटने के साथ-साथ भीड़ बढ़ने के आसार हैं।

अभी तक तो गांवों की चौपालों व शहरों के चौकों-चौराहों पर बैठे लोग कम-ज्यादा हुए रेट की चर्चा करने में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ, सस्ते की खबरें मध्यम वर्ग के लिए सपने से कम नहीं।

सोशल मीडिया पर सस्ती हुई वस्तुओं की जानकारी महंगी हुई वस्तुओं से अधिक शेयर हो रही है। कारें, मोबाइल फोन व कुछ मोटरसाईकिल कंपनियों के भाव में कटौती की खबरों ने मोटरसाईकिल शोरूम्स में रोनकें लगा दी हैं।

जीएसटी लागू होने से पूर्व मीडिया में आई खबरों कि कुछ वस्तुएं सस्ती होंगी व कुछ महंगी, ने खरीददारों की दिलचस्पी बरकरार रखी है। शिक्षा व रसोई की वस्तुओं सहित कुछ अन्य जरूरी वस्तुओं को जीएसटी से बाहर रखने के पीछे सोच स्पष्ट नजर आती है

कि सरकार आम जनता पर भार नहीं डालना चाहती। कुछ अड़चनों पर पूरी तैयारी न होने की चर्चा के बावजूद आम आदमी जीएसटी को ईमानदारी के लिए वरदान व टैक्स चोरों के लिए मुसीबत मान रहा है।

सरकार के लिए संतोषजनक बात यह है कि इस दौरान नोटबंदी वाली मुश्किल नहीं हैं। नियमों का पालन न करने व गैर कानूनी काम करने वालों को कानून के तहत लाना कोई जुर्म नहीं, बल्कि ड्यूटी है।

व्यापार को नियमित करना अच्छी बात है। लगता है सरकार इस विचार को लागू करने के लिए दृढ़ सकंल्प है कि ‘काम ही पूजा है, काम करना चाहिए, काम करो, काम करना ही पड़ेगा, चाहे हंस कर करो अथवा रोकर करो।’

व्यापार में ईमानदारी देश के लिए वरदान है। ईमानदारी से काम करने वाले देशभक्त हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार नोटबंदी से एक लाख फर्जी कंपनियों को ताले लगे हैं और तीन लाख कंपनियां शक के घेरे में हैं।

आजादी से लेकर देश फर्जीवाड़े का गढ़ रहा है। फर्जी कामकाज बंद होंगे, तो देश की तकदीर बदलेगी। आखिरकार कालाधन भी फर्जी कारोबार की देन है, जिसे जीएसटी बंद कर सकता है। जनता जीएसटी के हक में है और इसके अच्छे परिणामों का भी इंतजार करने के लिए तैयार है।

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