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राष्ट्रपति ट्रंप का अलोकप्रियता का बढ़ता ग्राफ

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव अभियान के दौर से ही अपने विवादास्पद ब्यानों के चलते विवादों के घेरे में रहे हैं, पर शायद यह पहला मौका होगा कि राष्ट्रपति बनने के बाद केवल 100 दिनों में ही लोकप्रियता के ग्राफ में इतने जल्दी सबसे निचले पायदान पर पहुंच गए। अमेरिका में पिछले 64 सालों के इतिहास में लोकप्रियता के ग्राफ में सबसे कमजोर रेटिंग प्राप्त करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बन गए हैं।

ट्रंप के 100 दिनों के कामकाज को देखते हुए उनकी लोकप्रियता को लेकर तीन सर्वे सामने आए हैं, इनमें सीएनएन-ओआरसी के सर्वें में जहां 44 प्रतिशत लोकप्रियता देखी गई, वहीं रियलक्लियर पॉलिटिक्स और गैलप डेली के सर्वें में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत का रहा है। इससे पहले लोकप्रियता के आंकड़े में बिल क्लिंटन की लोकप्रियता का आंकड़ा 55 फीसदी रहा था वहीं सर्वाधिक 68 फीसदी का आंकड़ा

रोनाल्ड रीगन का रहा। बुश सीनियर का 56, जार्ज बुश का 62 और बराक ओबामा का लोकप्रियता की रेंकिंग का आकड़ा 65 फीसदी रहा है।इसे दुर्भाग्यजनक ही माना जाएगा कि अमेरिका जैसे सभ्य, विकसित और प्रगतिशील देश में डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्टÑपति चुने जाने के विरोध में आज भी प्रदर्शन हो रहे हैं।

जब कोई व्यक्ति प्रचलित लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुनकर आ गया है, तो फिर उसके चुने जाने पर विरोध प्रकट करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत ही माना जाना चाहिए। इस तरह की प्रतिक्रियाएं हमारे देश में तो आम है और जिस तरह से दो साल पूरे होने पर भी नरेन्द्र मोदी को विपक्षी व प्रतिक्रियावादी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। हारने का बहाना अब तो ईवीएम पर डाला जाने लगा है।

खैर जहां तक अमेरिका की बात है, ट्रंप जिस तरह से जल्दबाजी में निर्णय कर रहे हैं और उन निर्णयों पर न्यायालय या अन्य कारणों से रोक लग जाती है, तो यह सब निश्चित रुप से ट्रंप की लोकप्रियता को प्रभावित करने के लिए काफी है। हांलाकि अब नए प्रयासों से ओबामा केयर को हटाने के अपने वादे में थोड़ी कामयाबी प्राप्त कर ली है,

वहीं विदेशियों के अमेरिकी प्रवास को लेकर किए गए निर्णयों पर बार-बार मात खानी पड़ी है। सबसे बड़ी कर कटौती का प्रस्ताव रख दिया है, वहीं एच1बी वीजा सख्ती के चलते भारत जैसे मित्र देश को भी निराश ही किया है। ट्रंप को सबसे बड़ा झटका देखा जाए तो मुस्लिम देशों पर पांबदी को लेकर लगा है। इधर ट्रंप आदेश जारी करते हैं, उधर संघीय अदालतें आदेश पर रोक लगा देती हैं।

यह खेल लगातार चल रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका के कई शहरों में मुस्लिम अतिवादी लंबे समय से सरकार की परेशानी का कारण बन रहे हैं और अपने नए-नए प्रस्ताव सरकार के सामने रख मनवाने का प्रयास करते रहे हैं। इधर सारी दुनिया आईएसआईएस व मुस्लिम आंतकवादी गतिविधियों से रुबरु हो रही है, जिसके विरुद्ध प्रभावी कदम उठाने का ट्रंप का संकल्प भी है।

हांलाकि 14 अप्रैल को अफगानी सीमा पर आतंकी ठिकानों पर 10 हजार किलो वजनी महाबम गिराकर पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया हैं। इससे अपने सख्त रवैये को साफ कर दिया है। राष्टÑपति ट्रंप जिस तरह की नीति पर चल रहे हैं इसके परिणाम अमेरिका के लिए घातक हो सकते हैं। विदेशियों के प्रति जहर घोलकर कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। दूसरा विदेशी कौशल पर निर्भरता कम करनी है,

तो पहले अपने युवाओं को इस काबिल बनाने के प्रयास करने होंगे। अमेरिका जैसे सभ्य देश में नस्लीय गतिविधियों का बढ़ना अपने आप में गंभीर है। ऐसा नहीं हो कि अतिवादी सोच के कारण अमेरिका आंतरिक संघर्ष में ही उलझ कर रह जाए। हांलाकि ट्रंप अपने चुनावी वादों के अनुसार ही निर्णय ले रहे हैं पर उन्हें समर्थन नहीं मिल पा रहा,

वहीं एक वर्ग द्वारा आज भी उन्हें राष्टÑपति के रुप में चुना जाना गवारा नहीं हो रहा है। राष्टÑपति ट्रंप की लोकप्रियता में कमी को तात्कालिक ही माना जाना चाहिए, क्योंकि सख्त प्रशासक व निर्णय लेने वाले शख्स की छवि एक दिन ट्रंप को पहचान दिलाने में सफल होगी। पर इसके लिए राष्टÑपति ट्रंप को संभल कर काम करते हुए परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के प्रयास करने होंगे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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