लेख

बेहतर समाज निर्माण में साहित्य व कला का अहम् योगदान

Culture, Great Contribution, Art, Society

सभ्य समाज साहित्य, कला और संस्कृति के बिना अधूरा

एक सभ्य समाज साहित्य, कला और संस्कृति के बिना अधूरा है। साहित्य और संस्कृति का क्षेत्र समाज में नई चेतना व ऊर्जा का संचार करता है। मनुष्य के आंतरिक विकास और एक बेहतर समाज के निर्माण में साहित्य व कलाओं का अहम योगदान है।भूख मिटाने के लिए जैसे कृषि की जरूरत है, वैसे ही मनुष्य की बौद्धिक व भावनात्मक भूख की तृप्ति साहित्य और कलाओं से होती है। आज हमारे चारों तरफ भय, असंतोष, असुरक्षा, वैचारिक शून्यता, सत्ता की क्रूरता और चकाचौंध भरा अजीबोगरीब माहौल पैर पसारता जा रहा है, जिसमें विचार, संवेदना और तर्क का कोई स्थान नहीं है।

बाजार हमारी जरूरतों का निर्णायक होता जा रहा है। हमें क्या खाना है, क्या पीना है, क्या पहनना है, क्या देखना है, क्या सुनना है। आदि सब कुछ हमारे विचार के बिना निर्धारित हो रहा है। मनुष्य की वास्तविक जरूरतें हाशिये पर चली गई हैं और कृत्रिम सी जरूरतें व इच्छाओं का बोलबाला हो गया है। ऐसे में साहित्य और कलाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है।

एग्रीकल्चर और कल्चर को अलग नहीं किया जा सकता

हालांकि एग्रीकल्चर और कल्चर को अलग नहीं किया जा सकता। कृषि हमारी भोजन की जरूरतें पूरी करती है, तभी हम सोच-विचार कर पाते हैं। हरियाणा के बारे में अक्सर कहने-सुनने को मिलता है कि यहां पर एग्रीकल्चर है, कल्चर नहीं है। इस बात में आंशिक सच्चाई होते हुए भी यह पूरी तरह सही नहीं है। साहित्य की ही बात करें तो यहां पर भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि सूरदास, गरीबदास, विख्यात निबंधकार व संपादक बालमुकुंद गुप्त, उर्दू के प्रसिद्ध शायर हाली पानीपती, फिल्मकार व शायर ख्वाजा अहमद अब्बास सहित लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है। हरियाणवी में पं. लख्मीचंद, फौजी मेहर सिंह और बाजे भगत जैसे नाम हैं। कुल मिलाकर हमारे पास समृद्ध विरासत मौजूद है। लेकिन इस विरासत को संभालने में हम कहीं पीछे रह जाते हैं।

शिक्षा संस्थानों की हालत खास अच्छी नहीं

शिक्षा के संस्थानों की हालत भी कोई खास अच्छी नहीं है। यहां पर पाठ्यक्रम को परीक्षा पास करने के सूत्रों में तब्दील कर दिया गया है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक में इस विरासत पर गंभीर चर्चा और विमर्श का अभाव है। विश्वविद्यालयों में शोध के नाम पर कर्इं बार खानापूर्ति होती हुई दिखाई देती है। इस मामले में निजी शिक्षण संस्थानों की स्थिति बेहद दयनीय है। साहित्य अकादमी सत्ता के साथ कदमताल करती हुई चलती हैं।

सरकार बदलने के साथ ही इसके ढ़ांचों में परिवर्तन के मतलब को समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। प्राचीन काल के राजाओं और रियासतदारों की तरह लोकतांत्रिक देश के अंदर सरकारों द्वारा साहित्य और संस्कृति को आत्म-प्रचार का माध्यम बनाया जाता है। ऐसा ना भी हो तो इसकी जनपक्षधरता को भोंथरा बनाने की कोशिशें किसी से छिपी नहीं हैं। हरियाणा की सरकारी अकादमियों द्वारा प्रकाशित अधिकतर किताबें ज्यादा समय तक प्रासंगिक नहीं रहती हैं। ना ही इन पर इतनी अधिक चर्चा होती है।

समाज को कुछ देने का भाव हो

वहीं साहित्य व कला चिरस्थाई रहते हैं, जोकि लोक में रचा-बसा हो। जिसमें समाज को कुछ देने का भाव हो। कबीर, नानक, रैदास, मीरा, सूरदास व गरीबदास जैसे कवियां की रचनाएं इसी कारण से आज भी प्रासंगिक हैं। रीतिकाल के कितने ही कवि काव्य-कला की विशेषज्ञता रखने के बावजूद आज याद भी नहीं किए जाते हैं। इस क्षेत्र में आम जन की पहलकदमियां ज्यादा मायने रखती हैं। फरवरी माह के अंत में इसी तरह का प्रयास कुरुक्षेत्र में आयोजित हरियाणा सृजन उत्सव में देखने को मिला।

बिना किसी सरकारी सहयोग के दो दिन तक चले साहित्य और कलाओं के उत्सव के लिए हरियाणा के संस्कृतिकर्मियों ने पूरी एकजुटता के साथ ना केवल संसाधन जुटाए, बल्कि आयोजन और प्रबंधन की जिम्मेदारी भी ली। सृजन उत्सव से हरियाणा के रचनाकारों एवं कलाकर्मियों को खासी ऊर्जा मिली है। सृजन सभा ने उत्सव को हर वर्ष आयोजित करने का संकल्प लिया है। इस तरह के स्वैच्छिक और समावेशी प्रयास निश्चय ही साहित्य और कलाओं के संवर्धन में अहम योगदान निभाने वाले हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रदेश में सृजन का एक बेहतर माहौल तैयार होगा।

साहित्य व कला चिरस्थाई रहते हैं, जोकि लोक में रचा-बसा हो। जिसमें समाज को कुछ देने का भाव हो। कबीर, नानक, रैदास, मीरा, सूरदास व गरीबदास जैसे कवियां की रचनाएं इसी कारण से आज भी प्रासंगिक हैं। रीतिकाल के कितने ही कवि काव्य-कला की विशेषज्ञता रखने के बावजूद आज याद भी नहीं किए जाते हैं।

अरुण कुमार कैहरबा

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