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रूहानी सत्संग- इबादत से ही मिलेगी अंदरूनी तंदरूस्ती

 पूज्य गुरु जी ने बताया जन्मों-जन्मों के संचित पाप कर्म दूर करने का तरीका

सरसा (सच कहूँ न्यूज)।  सत्संग में जब जीव चलकर आता है तो जन्मों-जन्मों के पाप कर्म राम-नाम में बैठने से ही कटने शुरू हो जाते हैं। इस जन्म में किए गए पाप कर्म संत-पीर फकीर प्रार्थना, दुआ करके कटवा देते हैं। जन्मों-जन्मों के पाप कर्मों को दूर करने के लिए संत-पीर फकीर इन्सान को अल्लाह, वाहेगुरु का नाम सौंप देते हैं, जैसे-जैसे वह सुमिरन करता जाएगा, वैसे-वैसे ही उसके पाप कर्म कटते चले जाएंगे और वह मालिक की दया-मेहर रहमत के काबिल बनता चला जाएगा। उक्त अनमोल वचन पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने रविवार को शाह सतनाम जी धाम में आयोजित रूहानी सत्संग के दौरान फरमाए। पूज्य गुरु जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं द्वारा पूछे गए रुहानियत संबंधी सवालों के जवाब देकर उनकी जिज्ञासाओं को भी शांत किया। रूहानी सत्संग के दौरान पूज्य गुरु जी ने हजारों नए लोगों को गुरूमंत्र की अनमोल दात प्रदान कर मोक्ष मुक्ती का अधिकारी बनाया।

गुरुमंत्र लेने के साथ ही उन्होंने सामाजिक कुरीतियों व नशों आदि को त्यागने का भी संकल्प लिया। इस अवसर पर पूज्य गुरु जी ने अपने पावन कर कमलों से 3 जरूरतमंद परिवारों को आशियाने की चाबियां तो दो निशक्तजनों को ट्राइसाइकिल प्रदान की गई। इस अवसर पर कई जोड़े दिल जोड़ माला पहनाकर वैवाहिक बंधन में बंधे।

पूज्य गुरु जी ने साध-संगत को अपने अनमोल वचनों से लाभान्वित करते हुए फरमाया कि जिस प्रकार सामने कितने भी प्रकार के भोजन पड़े हों, जब तक आप उस भोजन को खाते नहीं, उसके स्वाद का पता नहीं चलता और ताकत भी नहीं मिलती। उसी तरह राम, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड का नाम है। जब तक इन्सान उसका जाप नहीं करता, तब तक न तो उसे कोई ताकत मिलती है और न ही उसके पाप कर्म कटते हैं और न ही अलौकिक नजारे मिलते हंै। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि भक्ति, इबादत करने से अंदर की ताजगी और तंदरुस्ती मिलती है। आप जी ने फरमाया कि इन्सान हर समय बाल-बच्चे, मोह-ममता, लोभ लालच,काम-वासना, क्रोध, अंहकार में खोया रहता है, जिससे उसे दु:ख ही मिलता है। जैसे-जैसे इन्सान भक्ति इबादत करता है, त्यों-त्यों इन्सान बुरे कर्म छोड़कर, बुरी हरकतें छोड़कर मालिक की भक्ति में लिव लगाकर अल्लाह-वाहेगुरु राम की दया-मेहर का हकदार बन जाता है।

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि जब इन्सान बुरे कर्म करता रहता है और सुधरता नहीं तो कर्मों का बोझ उसे उठाना पड़ता है और दुखी होता रहता है। जो सतगुरु के मुरीद हैं वो सेवा-सुमिरन करके अन्दर-बाहर से माला-माल होते रहते हैं, खुशियों से लबरेज होते रहते हैं। इसलिए ऐसे कर्म ना करें जिस वजह से दु:ख भोगने पड़ें,बल्कि ऐसे कर्म करें जिससे उनके कर्म पहाड़ से राई बन जाएं और खुशियों से मालामाल हो जाएं।

 

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