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‘इन्सान, इन्सान बने, ऐसी शिक्षा दी जाए’

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सरसा (सकब)। पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने शाह सतनाम जी धाम में आयोजित शुक्रवार सायंकालीन रूहानी मजलिस के दौरान फरमाया कि इंसान बेचैन है, गमगीन है, परेशान है, फैसला नहीं ले सकता, डबल मांईड रहता है, नेगिटिव ज्यादा सोचता है, खान-पान में जहर ज्यादा है और घर-परिवार की परेशानियां बहुत ज्यादा हैं।

अगर ये सब न होता तो कलयुग कैसे होता? इसी का नाम तो कलयुग है। दरअसल ज्यों-ज्यों इंसान पढ़ाई कर रहा है, दुनियावी शिक्षा, तालीम हासिल कर रहा है, त्यों-त्यों नेगेटिविटी की दिशा और दशा बदल जाती है। लेकिन ये नहीं है कि नेगेटिविटी बदल जाए, या इंसान के अंदर की गलत सोच ही बदल जाए, क्योंकि वर्तमान शिक्षा प्रणाली, पढ़ाई-लिखाई में ऐसा कुछ नहीं है।

आजकल वो पढ़ाया जाता है, जो पै्रक्टिकली कम इस्तेमाल में आता है। हमारे गुरुकुल होते थे, उनमें वो पढ़ाया जाता था, जिनमें पै्रक्टिकल किया जाता था। आजकल प्रैक्टिकल कुछ और होते हैं, पढ़ाया कुछ और जाता है। दिमाग पर बोझ ज्यादा है और जो पढ़ाई से सफलता की दर कम है।

जबकि होना ये चाहिए कि बच्चा जिस फील्ड में जाना चाहता है, उस फील्ड को चुने, अच्छी लैंग्वेज का ज्ञान ले। उसके बाद वो जीवन में लक्ष्य निर्धारित करके उसकी तरफ बढ़ता जाए, तो देश और समाज सफलता की चरम सीमा पर पहुंच सकते हैं।
आपजी ने फरमाया कि कईयों को तो कॉलेज में जाते ही +2 में क्या पढ़ा था, यही याद नहीं रहता। वहीं कॉलेज पढ़ गए, तो इससे पहले की पढ़ाई याद नहीं रहती। अब सोचो, क्या उसकी जरूरत ही नहीं! जब उसकी जरूरत नहीं है, तो पढ़ाया क्यों? वास्तव में देखा जाए तो जिसकी जरूरत है, उसे बचपन से ही पढ़ाया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर इंसान सफलता के झंडे गाड़ सकता है।

पुरातन काल में सार्इंस ऐसी थी कि तब साऊंडलेस जहाज होते थे। जब चाहा बरसात करवा ली जाती थी। परमाणु से लैस जो बेहद घातक शस्त्र होते थे, लेकिन उनको रोकने का तरीका भी उन्हें आता था। उस वक्त सार्इंस इसलिए तरक्की करती थी, क्योंकि जिसके पास जो टैलेंट, हुनर होता था, एक आयु सीमा तक उसे वो पढ़ाया जाता था। ताकि बच्चे के हुनर में निखार आ जाए और फिर एक सब्जेक्ट चुनकर उस पर पूरा ध्यान दिया जाता था और पूरे जीवन में काम आने वाले सब्जेक्ट शुरु से ही पढ़ा दिए जाते थे।
पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि एक ही गुरु राजा भी बनाता था, दुकानदार भी बनाता था, उसी से पढ़े हुए बिजनेसमैन भी बनते थे, मंत्री भी बनते थे। एक गुरु में इतने टैलेंट होते थे, तभी उसके शिष्यों में भी अनेक टैलेंट होते थे। अब एक टीचर एक ही सब्जेक्ट को बोझ समझ कर पढ़ा रहा है, तो बच्चे भी बोझ ही समझेंगे! इस तरह बच्चे आज के दौर में असली पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं।

हमारे धर्माें में पवित्र वेदों का पाठ कराया जाता था

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि हमारे धर्माें में पवित्र वेदों का पाठ कराया जाता था, ताकि इंसान, इंसान जरूर बने। राम जिसके अरबों नाम पड़ गए, उससे प्यार करना सिखाया जाता था, ताकि इंसान का आत्मबल बुलंद रहे और वो दुनिया की तमाम परेशानियों, दु:ख-तकलीफों को दूर कर सके। आज वो सब्जेक्ट ही हट गया है। आजकल तो बच्चा गर्भ में होता है, मां-बाप पहले ही सोचने लग जाते हैं कि आॅफिसर बनेगा! बिजनेसमैन बनेगा! यानि नोटों की मशीन बनाना पहले शुरु कर देते हैं! वो बच्चा इंसान बनेगा या नहीं, इस पर ध्यान नहीं देते। पहले तो ये सोचा जाता था कि ये इंसान बनेगा, बाकि बाद में गुरुकुल में जो गुरु बनाएंगे, वही बनेगा।

हमारी शिक्षा प्रणाली में पवित्र धर्मोें की पढ़ाई को शामिल किया जाए

पहले जो गुरुकुल के गुरु होते थे, वो टैलेंट को पहचानते थे। उस टैलेंट के अनुसार बच्चे को शिक्षा दी जाती थी और वो बच्चा पूरे देश में नाम रोशन करता था। आज तो कोई प्रतिभा नहीं है, बस जो सब्जेक्ट हैं, उसी को रटते रहो। इसलिए वो बात नहीं बन पा रही, जो पहले की संस्कृति में हुआ करती थी। इसलिए बहुत जरूरी है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में पवित्र धर्मोें की पढ़ाई को शामिल किया जाए, ताकि सबसे पहले इंसान, इंसान बने, शैतान न बने।

कैसे कमाई की जाए?

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि जो लोग ठग्गी मारते हैं, क्या वो इंसान हैं? टेबलेट से इंसान ठीक हो सकता है, उसकी जगह आॅपरेशन करते हैं, क्या वो इंसान हैं? गाड़ी में पचास-साठ रूपए का डीजल पेट्रोल जलता है और भोले-भालों से हजार रूपया किराया बताकर लूटते हैं, क्या वो इंसान हैं? क्योंकि इंसानियत तो है ही नहीं, दांव लगते ही लूटते हैं! इसकी वजह है इंसानियत का पाठ नहीं जानना। आज के बच्चों से पूछ लो कि इंसानियत क्या है? किसी ने सत्संग सुना है, तो वे बता सकते हैं। नहीं सुना, तो नहीं बता पाएंगे। क्योंकि पढ़ाई में तो कहीं आता नहीं कि इंसानियत क्या होती है? अरे, कम से कम इंसान क्या है, उसकी परिभाषा तो इंसान को सिखाओ! दूसरों के दु:ख-दर्द दूर करना, दया की भावना रखना, दूसरों की मदद करना, यही सच्ची इंसानियत है। और यही आज के बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता।

आजकल तो पढ़ाया जाता है कि कैसे कमाई की जाए? बहुत मास्टर-उस्ताद ऐसे होते हैं, जो दिखने में नहीं आते, लेकिन लूटना कैसे है, ये शिक्षा देते हैं।

हर क्षेत्र में रिश्वत लेने वाले भी हैं और न लेने वाले भी हैं, कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। इसलिए भाई, जरूरी है कि ईश्वर का नाम लो और पढ़ाई में ईश्वर के नाम को शामिल किया जाए, ताकि इंसान, इंसान बने और पूरी प्रकृति का भला हो और इसांन का भला हो और घर में खुशियां आएं। अगर ऐसा होगा तो पूरे समाज में प्यार की गंगा फिर से बहने लगेगी।

 

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