सम्पादकीय

गोवा और मणिपुर का खेल कांग्रेस की ही देन

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गोवा और मणिपुर में जो खेल हुआ वह कांग्रेस की ही देन है और अब इस पर पश्चाताप करने का कोई लाभ नहीं है। कांग्रेस चाहे जितना मर्जी चिल्लाए कि इन दोनों राज्यों में धन बल का प्रयोग हुआ है और लोकतंत्र की हत्या हुई है किंतु इसके लिए वह स्वयं दोषी है। पार्टी ने जनादेश का लाभ उठाने के लिए कुछ नहीं किया। पहले दो दिन कांग्रेस उच्च कमान इसी बात पर विचार करती रही कि विधायी दल का नेता कौन होगा और उसकी दौड़ में शामिल नेताओं को भ्रम में रखा। इसके विपरीत भाजपा ने समय गंवाए बिना तुरंत निर्णय लिया। उसने छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों को अपने पक्ष में कर बहुमत जुटाया और मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर ने विश्वासमत जीता।

चुनाव के बाद बने सहयोगी दलों के नेताओं को मंत्री पद दिए गए। पार्रिकर को 21 के बजाय 22 विधायकों का समर्थन मिला। कांग्रेस के विधायक राणे मतदान के दौरान अनुपस्थित रहे और बाद में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेस के पुराने सहयोगी राकांपा ने भी भाजपा के पक्ष में मतदान किया। किंतु यदि कांग्रेस त्वरित कदम उठाती तो स्थिति पलट सकती थी। विजय सरदेशिया गोवा फारवर्ड पार्टी बनाने से पहले कांग्रेसी नेता थे और ऐसा कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस का समर्थन करने के लिए तेयार थे और यही स्थिति राकांपा की भी थी। किंतु प्रतीक्षा के बाद दोनों ने भाजपा को समर्थन दिया। वस्तुत: कांग्रेस को अपनी गलती की भारी कीमत चुकानी पड़ी। जहां तक भाजपा का सवाल है उसकी राह भी आसान नहीं थी।

उसे जनता का विश्वास पुन: प्राप्त करना पड़ा, जोकि इन चुनावों में उसके पक्ष में नहीं था। इसी तरह कांग्रेस को मणिपुर में भी सहयोगी ढूंढने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए थे। राज्य में भाजपा की पहली बार बनी सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले एन बीरेन सिंह कांग्रेसी नेता रह चुके हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके ओकराम इबोबी सिंह उनके राजनीतिक गुरू हैं। बीरेन पहले फुटबाल खिलाड़ी रह चुके हैं। फिर वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आए और फिर 2002 में वे राजनीति में आए ओर 2003 से वे इबोबी सिंह सरकार में मंत्री थे। किंतु यहां भी कांग्रेस को अंतर्कलह का सामना करना पड़ा।

बीरेन सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, किंतु 2012 में उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया और चुनाव से पूर्व उन्होंने त्यागपत्र दिया अ‍ैर भाजपा में शामिल हो गए। राज्य में कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी पार्टी थी और उसके 28 विधायक हैं और अब वह विपक्ष में बैठी है जबकि भाजपा के केवल 21 विधायक थे और उसने 32 विधायकों का समर्थन जुटा लिया है। भाजपा ने एनपीपी, एनपीएफ, लोजपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन लिया। मुख्यमंत्री के साथ जिन आठ मुंत्रियों ने शपथ ली उनमें एनपीपी के मणिपुर के पूर्व पुलिस महानिदेशक वाई जयकुमार सिंह ने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। असम के बाद मणिपुर में भाजपा की जीत से पूर्वोत्तर क्षेत्र के एक और राज्य में कांग्रेस का सफाया हो गया है।

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