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फिल्म समीक्षा : ‘जट्टू इंजीनियर’

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कॉमेडी से ग्रामीण उत्थान | Jattu Engineer Review

संदीप कम्बोज |

आमतौर पर कॉमेडी फिल्मों में कम मेहनत व ज्यादा शौहरत के चक्कर में अश्लील कॉमेडी का चलन बढ़ रहा था, जिससे दर्शक अब ऊबने लगे है। प्रचार के बावजूद भी कई कॉमेडी फिल्में फ्लॉप हो गई। डॉ. एमएसजी ने कॉमेडी फिल्म ‘जट्टू इंजीनियर’ लीक से हटकर बनाई जो अच्छे समाज की सरंचना का संदेश लेकर आई है। (Jattu Engineer Review)

‘जट्टू इंजीनियर’ सिर्फ एक फिल्म ही नहीं बल्कि वर्तमान ग्रामीण परिवेश की सच्चाई को बयां करती एक ऐसी सामाजिक कहानी है जिसमें डॉयलोग व रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी परिस्थितियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र के उत्थान का संदेश बड़े ही अद्भुत, मनोरंजन के साथ दिया गया है। जहां डॉ. एमएसजी का एक किरदार गंभीर हैं वहीं दूसरा हंसमुख हैं।

हर किरदार का अहम रोल है

वहीं फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में हर किरदार का अहम रोल है। कोई भी किरदार निष्क्रिय नहीं है, बल्कि सभी का गांव के विकास में पूरा योगदान है। फिल्म के डायलॉग भी हर किरदार के व्यक्तित्व व परिस्थितियों को बखूबी बयां कर रहे हैं। दरअसल फिल्म के निर्देशक डॉ. एमएसजी व आदरणीय साहिबजादी हनीप्रीत जी इन्सां(बाप-बेटी की जोड़ी) ने फिल्म के लिए एक ऐसी कहानी चुनी है जो कॉमेडी फिल्म जगत के इतिहास में बिल्कुल अलग है।

बड़े ही सुंदर तरीके से दर्शाया गया है हर संदेश

फिल्म में बड़े ही सुंदर तरीके से दर्शाया गया है कि गांवोें को अगर सही मार्गदर्शन मिले, ग्राम पंचायतों का नेतृत्व व अगुवाई सही हो तो गांवों को स्वच्छ-सुंदर, खुले में शौचमुक्त, आत्मनिर्भर व स्वर्ग बनने से कोई नहीं रोक सकता। फिल्म पूरे भारतवर्ष के दर्शकों का एक साथ मनोरंजन करने में सफल होगी क्योंकि इसमें हिंदी के अलावा कई क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग किया गया है।

शक्ति सिंह सिसौदिया व संघैट सिंह सिद्धू

फिल्म की कहानी एक अति पिछड़े व बेहद गंदे गांव टटियाकर पर आधारित है जहां फिल्म के मुख्य हीरो दो अलग-अलग भूमिकाओं (शक्ति सिंह सिसौदिया व संघैट सिंह सिद्धू के किरदार) में हंसाने-गुदगुदाने के साथ ही स्वच्छता, खुले में शौच न करने, महिला सशक्तिकरण, अपराधियों के सुधार व ग्रामीण उत्थान पर गहरे स्तर पर फोकस कर पूरे लग्न व जुनून से अलग-अलग तरह से ग्रामीणों को जागरूक कर रहा है। डॉ. एमएसजी के दोनों ही किरदार बहुत ही प्रभावशाली व कहानी को संजीवता प्रदान करते हैं। कुल मिलाकर फिल्म का प्लॉट गांव टटियाकर पर आधारित है। वहां के लोग नशेड़ी व आलसी हैं।

डायलॉग ‘मैं तां उड्डूंगा’ फिल्म में दर्शकों को पूरी तरह से लोट-पोट करता रहता है

फिल्म की कहानी रोचक है और अगले पल क्या होने वाला है इस बात की उत्सुकता लगातार बनाए रखती है। गांव को महा सुंदर गांव यानि ‘एमएसजी’ बनाने में क्या-क्या परेशानियां आई, इन हालातों को दमदार तरीके से दिखाया गया है।
फिल्म में न तो शहरों सी चमक-धमक है और न ही डबल मीनिंग का चक्कर। मात्र एक छोटे से गांव के लोगों की रोजाना की जीवनशैली को फिल्मा कर दुनियाभर के गांवों को मनोरंजक अंदाज में अद्भुत संदेश दिए गए हैं।

फिल्म में गांव का नाम ही नहीं बल्कि अभिनय करने वाले कलाकारों के नाम भी ऐसे हैं कि आप उनके नाम सुनने मात्र से खुद-ब-खुद हंसने लगेंगे। फिल्म के पात्र लल्लु के सैल्फी लेने का दिलकश अंदाज व एक नशेड़ी का डायलॉग ‘मैं तां उड्डूंगा’ फिल्म में दर्शकों को पूरी तरह से लोट-पोट करता रहता है। एक ओर जहां फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत ही जबरदस्त है वहीं डायलॉग भी दमदार हैं।

“जोश में, होश में, चलते हैं देश लिए’

कहानी में जहां ट्विस्ट है वहीं कई जगह इमोशनल भी। म्यूजिक की बात करें तो फिल्म के हिसाब से बिल्कुल सटीक बैठता है। दोनों गानों का फिल्मांकन जोरदार है। ‘मारी होली की पिचकारी’ जो कि पूरी तरह मनोरंजक है जबकि अन्य गीत “जोश में, होश में, चलते हैं देश लिए’ युवाओं को व्यायाम करने का संदेश देता प्रेरणादायक गीत है।

दिल को छू जाने वाले डॉ. एमएसजी की आवाज में ये गाने दर्शकों को हॉल के बाहर भी लंबे समय तक याद रहेंगे। म्यूजिक जबरदस्त है, कोरियोग्राफी भी शानदार है। केवल बॉलीवुड ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा के इतिहास में भी अब तक ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित ऐसी कोई दूसरी प्रेरणादायक कॉमेडी फिल्म नहीं मिलेगी।

रेटिंग: 5 स्टार

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