[horizontal_news id="1" scroll_speed="0.1" category="breaking-news"]
फीचर्स

करेले की खेती

Farming, Bitter Gourd, Variety, Crop, Climate

हमारे देश में करेला की खेती काफी समय से होती आ रही है। इसका ग्रीष्मकालीन सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है। पौष्टिकता एवं अपने औषधीय गुणों के कारण यह काफी लोकप्रिय है । आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के अनुसार मधुमेह के रोगियों के लिये करेला की सब्जी का सेवन लाभदायक रहता है। इसके फलों से सब्जी बनाई जाती है। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करके धूप में सुखाकर रख लिया जाता हैं, जिनका बाद में बेमौसम की सब्जी के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

जलवायु :

करेला की खेती के लिए ठाम एवं आर्द्र जलवायु की जरूरत पड़ती है। करेला के पौधों की खासियत है कि यह अन्य कद्दू वर्गीय फसलों की अपेक्षा अधिक शीत सहन कर सकता है, पर अधिक वर्षा से फसल की उपज घट जाती है। करेला की खेती के लिए उत्तर एवं मध्य भारत की जलवायु अधिक अनुकूल मानी गई है।

कैसे करें तैयारी :

करेला की खेती के लिए ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए, जिनमें अम्ल एवं नमक का प्रतिशत सामान्य से अधिक न हो अर्थात् भूमि का पी.एच. 6.5 से 8.00 के मध्य तथा मृदा में जीवांश का प्रतिशत अधिक से अधिक होना चाहिए, ताकि पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध हो सकें।

करेले की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय 200 लीटर बायोगैस स्लरी अथवा 2000 लीटर संजीवक खाद खेत में डालकर 4-5 दिन पश्चात मिट्टी पलट हल से जुताई करें। इसके उपरान्त एक सप्ताह तक खेत को खुला छोड़ देते हैं। तत्पश्चात तीन से चार बार देशी हल से जुताई कर मेंडा (पटेला) लगाकर खेत को समतल करें,

तत्पश्चात तीन-तीन फीट के अन्तराल पर 1 फीट गहरा तथा 2 फीट चौड़ा थावला बनाकर प्रत्येक थावले में 500 ग्राम वर्मी कम्पोस्ट तथा 50 ग्राम कॉपर सल्फेट पाउडर एवं 200 ग्राम राख मिलाकर थावले को मिट्टी से ढ़क देते हैं तथा खेत की सिंचाई कर लें। सिंचाई के 5-6 दिन पश्चात करेला बीजों की बुवाई थावले में कर दें। बुवाई करते समय प्रत्येक थावले में 4 से 5 बीज पौध हेतु डालें।

किस्में:

कोयम्बटूर लौग:

यह दक्षिण भारत की किस्म है, इस किस्म के पौधे अधिक फैलाव लिए होते हैं। इसमें फल अधिक संख्या में लगते हैं तथा फल का औसत वजन 70 ग्राम होता है। इसकी उपज 40 क्विंटल प्रति एकड़ तक आती है।

कल्याणपुर बारहमासी:

इस किस्म का विकास चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है, इस किस्म के फल आकर्षक एंव गहरे हरे रंग के होते हैं। इसे गर्मी एवं वर्षा दोनों ऋतुओं में उगाया जा सकता है, अर्थात् ये किस्म वर्ष भर उत्पादन दे सकती है। इसकी उपज 60-65 क्विंटल प्रति एकड़ तक आती है।

हिसार सेलेक्शन:

इस किस्म को पंजाब, हरियाणा में काफी लोकप्रियता हासिल है। वहां की जलवायु में इसकी उपज 40 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त होती है।
अर्का हरित: इसमें फलों के अन्दर बीज बहुत कम होते हैं। यह किस्म गर्मी एवं वर्षा दोनों ऋतुओं में अच्छा उत्पादन देती है। पतंजलि विषमुक्त कृषि विभाग ने अपने शोध प्रयोगों में पाया कि इसकी प्रत्येक बेल से 34 से 42 फल प्राप्त होते हैं।

पूसा विशेष:

यह किस्म बीज बुवाई के 55 दिन बाद फल देना प्रारम्भ कर देती है। इस किस्म के फल मध्यम, लम्बे, मोटे व हरे रंग के होते हैं। इसका गूदा मोटा होता है। फल का औसत भार 100 ग्राम तक होता है। पतंजलि विषमुक्त कृषि विभाग इस किस्म को फरवरी से जून माह के बीच उठाने की सलाह देता है।

खेत की सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई:

करेला की फसल में सिंचाई काफी महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है, अत: समय-समय पर सिंचाई अवश्य करते रहना चाहिए। चुंकि करेला की फसल ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में उगाई जाती है, जिस वजह से खरपतवार अधिक संख्या में उग जाते हैं। अत: इनको समय-समय पर खेत से निकालना बहुत जरूरी है। इसी प्रकार खेत का नियमित अन्तराल पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए, ताकि फसल पर फल-फूल अधिक से अधिक संख्या में आए।

कुदरती खाद बनाएं:

बीज बुवाई के 3 सप्ताह पश्चात जब करेला के पौधे में 3-4 पत्ते निकलना प्रारम्भ हो जाएं, उस समय 2000 लीटर बायोगैस स्लरी अथवा 2000 लीटर संजीवक खाद अथवा 40 किलो गोबर से निर्मित जीवामृत खाद प्रति एकड़ की दर से फसल को दें।

दूसरी बार जब पौधों पर फूल निकलने प्रारम्भ हो जाएं, उस समय पुन: उपरोक्त कुदरती खाद फसल को देनी चाहिए। इसी प्रकार जब करेला फसल की प्रथम तुड़ाई प्रारम्भ हो, उस समय 200 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट में 50 किलोग्राम राख मिलाकर फसल पर छिड़काव कर देना चाहिए, ताकि फसल की उपज अधिक से अधिक मिल सके।

फसल की सुरक्षा कैसे करें:

करेला की फसल में कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है, किन्तु अधिक स्वस्थ फसल हेतु नियमित अन्तराल पर कुदरती कीट रक्षक का छिड़काव करते रहना चाहिए, ताकि फसल उपज ज्यादा एंव उत्तम गुणवत्ता के साथ प्राप्त हो सके।

1. रैड बीटल:

यह एक हानिकारक कीट है, जोकि करेला के पौधे पर प्रारम्भिक अवस्था पर आक्रमण करता है। यह कीट पत्तियों का भक्षण कर पौधे की बढ़वार को रोक देता है। इसकी सूंडी काफी खतरनाक होती है, जोकि करेला पौधे की जड़ों को काटकर फसल को नष्ट कर देती है।

रोकथाम:

रैड बीटल से करेला की फसल सुरक्षा हेतु पतंजलि निम्बादी कीट रक्षक का प्रयोग अत्यन्त प्रभावकारी है। 5 लीटर कीटरक्षक को 40 लीटर पानी में मिलाकर, सप्ताह में दो बार छिड़काव करने से रैड बीटल से फसल को होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

पाउडरी मिल्ड्यू रोग:

यह रोग करेला पर एरीसाइफी सिकोरेसिएटम की वजह से होता है। इस कवक की वजह से करेले की बेल एंव पत्तियों पर सफेद गोलाकार जाल फैल जाते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं। इस रोग में पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं।

कुदरती उपचार:

इस रोग से करेला की फसल को सुरक्षित रखने के लिए 5 लीटर खट्टी छाछ में 2 लीटर गौमूत्र तथा 40 लीटर पानी मिलाकर, इस गोल का छिड़काव करते रहना चाहिए। प्रति सप्ताह एक छिड़काव के हिसाब से लगातार तीन सप्ताह तक छिड़काव करने से करेले की फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

एंथ्रेक्वनोज रोग:

करेला फसल में यह रोग सबसे ज्यादा पाया जाता है। इस रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर काले धब्बे बन जाते हैं, जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण क्रिया में असमर्थ हो जाता है। फलस्वरुप पौधे का विकास पूरी पूरी तरह से नहीं हो पाता।

कुदरती उपचार:

रोग की रोकथाम हेतु एक एकड़ फसल के लिए 10 लीटर गौमूत्र में 4 किलोग्राम आडू पत्ते एवं 4 किलोग्राम नीम के पत्ते व 2 किलोग्राम लहसुन को उबाल कर ठण्डा कर लें, 40 लीटर पानी में इसे मिलाकर छिड़काव करने से यह रोग पूरी तरह फसल से चला जाता है ।

फसल की तुड़ाई कैसे और कब

करेला फलों की तुड़ाई कोमल अवस्था में करनी चाहिए, वैसे सामान्यत: बीज बुवाई के 90 दिन पश्चात फल तोड़ने लायक हो जाते हैं। फल तुड़ाई का कार्य सप्ताह में 2 या 3 बार करना चाहिए।करेले की उपज उपरोक्त निर्देशानुसार करेले की उपज 55 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त की जा सकती है।

Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।

लोकप्रिय न्यूज़

To Top