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किसानों को एक और गांधी की प्रतीक्षा

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मोइन काजी

farmers यह वर्ष चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष है। चंपारण सत्याग्रह गांधी जी की सविनय अवज्ञा नीति का पहला प्रयोग था। बाद में यह गांधी जी का सबसे शक्तिशाली हथियार बना और इसके चलते उन्हें विश्व के महान नेताओं में स्थान मिला। गांधी जी ने 17 अप्रैल 1917 को चंपारण जिले में सत्याग्रह शुरू किया। कांग्रेस के 31वें लखनऊ अधिवेशन में गांधी जी चंपारण के किसानों के प्रतिनिधि राजकुमार शुक्ला से मिला और शुक्ला ने उनसे आग्रह किया कि वे स्वयं जाकर चंपारण के नील की खेती करने वाले काश्तकारों की दुर्दशा देखें।

गांधी जी इससे सहमत हुए और उनके साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी गए। गांधी जी 10 अप्रैल 1917 को पटना पहुंचे और उसके पांच दिन बाद वे मोतिहारी पहुंचे और 17 अप्रैल से उन्होंने अपना चंपारण सत्याग्रह शुरू किया। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि गांधी जी यह यात्रा पहला शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन होगा।

farmers मोहनदास से बने महात्मा गांधी

चम्पारण में मोहनदास गांधी में परिवर्तन शुरू हुआ और वे महात्मा गांधी बनने लगे। इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम चंपारण कृषक अधिनियम बनना था जिसमें किसानों को अनेक रियायतें दी गयी। गांधी जी का आंदोलन एक विपरीत राजनीतिक वातावरण में एक राजनीतिक अभियान था। किंतु इससे एक सुधार हुआ। गांधी जी ने इस तकनीक को पहली बार अपनाया और किसानों को न्याय दिलाया।

1917 जैसी दशा आज किसानों की

इस आंदोलन के शक्तिशाली नैतिक प्रभाव से उत्साहित होकर उन्होंने इसे अपने सारे आंदोलनों का हथियार बनाया तथा अहिंसा और सत्याग्रह गांधी दर्शन का मूल बना। गांधीजवादी विद्वान और विचारक मानते हैं कि चंपारण और देश के अन्य भागों में किसानों की दशा जो 1917 में थी वैसी ही दशा आज भी देश में किसानों की हैं। इस आंदोलन के बाद जबरन श्रम को समाप्त किया गया। आज किसान अपनी दशा में सुधार के लिए एक और गांधी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

farmers जागरूक नहीं हैं छोटे किसान

भारतीय किसानों की दुर्दशा के कारण स्पष्ट हैं। उनमें कर्ज और साहूकारों के कारण उनकी आजीविका पर संकट, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उत्पादकता खत्म होना, सूखे और बेमौसमी बरसात तथा जलवायु परिवर्तन के कारण फसल और पशु धन का नुकसान, जल स्तर में गिरावट, विकास के कार्यों में कृषि भूमि का उपयोग, कपास के दामों में गिरावट, हाइब्रिड बीजों की बढ़ती कीमत, कृषि विस्तार सहायता का समाप्त होना आदि शामिल है। देश की जनसंख्या में किसानों की संंख्या बहुत अधिक है। किंतु छोटे किसान संगठित नहीं हैं। न ही वे राजनीतिक रूप से जागरूक हैं।

छोटे किसानों को प्रशिक्षण की जरूरत

सरकार को विस्तार सेवाओं में सुधार करना चाहिए ताकि किसानों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और फसल विधियों का पता चले। कृषि विश्वविद्यालयों को किसानों के लिए ऐसे कार्यक्रम बनाने चाहिए जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों की ग्रामीण जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। छोटे किसानों को यह सीखना होगा कि वे अपनी सीमित भूमि का उपयोग किस तरह उत्पादकता बढ़ाने में कर सकते हैं। उन्हें न केवल अच्छे बीज, पौधे चाहिए अपितु मार्ग निर्देशन भी चाहिए।

farmers 52 प्रतिशत परिवार कर्जदार

देश के नौ करोड़ ग्रामीण कृषि परिवारों में से 52 प्रतिशत परिवारों पर किसी न किसी तरह का कर्ज है। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा गिर रहा है जिसके चलते बैंक अन्य उत्पादक क्षेत्रों को अधिक ऋण दे रहे हैं। किसानों के लिए संस्थागत ऋण के स्रोत सूख रहे हैं और बैंकों का स्थान स्थानीय साहूकार ले रहे हैं जो किसानों को ऊंची ब्याज दर पर ऋण देते हैं तथा किसान उनके ऋण जाल में फंस जाता है और कई बार वह ऋण का भुगतान नहीं कर पाता तो आत्महत्या कर देता है। किंतु आत्महत्या के बाद भी उसका परिवार उस ऋण से मुक्त नहीं होता है।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में कहा था ‘‘हर चीज प्रतीक्षा कर सकती है किंतु कृषि नहीं।’’ किंतु आज भारत में इसके प्रतिकूल स्थिति दिखायी देती है। भारतीय अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र आगे बढ़ रहा है केवल कृषि क्षेत्र ऐसा है जो पिछड़ रहा है।

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