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कोचिंग संस्थानों का फैलता जाल

व्यवसायिक  हो चली शिक्षा पद्धति का एक अर्थजाल में फंसा रूप स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की दुनियां से बहार निकल कर दिखाई पड़ता है। औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद यदि छात्र इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी या किसी सरकारी विभाग में बाबू तक बनने का सपना देखते हैं तो उन्हें कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले कोचिंग संस्थानों के एक विशाल समुन्दर में गोता लगाना ही पड़ेगा। स्थितियां कुछ ऐसी हो गयी हैं कि इन सस्थानों के भंवर में फंसे बिना अब कश्ती का पार निकलना थोड़ा मुश्किल हो गया है।

भारत में होते जनसंख्या विस्फोट के मुकाबले सरकारी क्षेत्र बहुत सीमित मात्रा में ही नौकरियां उपलब्ध करा पा रहे हैं यदि कोई छात्र प्रतियोगी परीक्षा में बैठता है तो उसे एक जटिल और कठिन प्रतियोगी प्रणाली से गुजरना पड़ेगा। और उसकी रणनीति या मेहनत में जरा सी चूक छात्र को प्रतियोगिता से बाहर कर देती है। और यही मुश्किलें भारत के कोने-कोने में कोचिंग के बाजार में खूब बहार ला रही हैं।

आज से लगभग 15 से 20 साल पहले कोचिंग का यथार्थ था कि व्यक्ति गत स्तर पर किसी छात्र की मदद लेकिन आज के दौर में कोचिंग सेक्टर एक संगठित रूप ले चुका है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिस मकसद से स्कूली शिक्षा दी जाती है उसका क्या? क्योंकि उस मकसद को अब कोचिंग संस्थान पूरा कर रहे हैं। एक आंकलन के मुताबिक भारत में कोचिंग इंडस्ट्री लगभग 23.7 अरब डॉलर की थी जो 2015 में 40 अरब डॉलर होने की सम्भावना है। जोकि आगामी कुछ वर्षों में तेजी से बढ़कर 500 अरब डॉलर तक पहुंच जायेगी। ऐसे में लाजिमी है कि यहमार हर हाल में माध्यम वर्गीय परिवार को झेलनी पड़ रही है।

एसोचेम द्वारा किये गए एक सर्वे में जिक्र किया गया मेट्रोपोलिटन शहरों में प्राइमरी स्कूल के 87 प्रतिशत और हाईस्कूल के 95 प्रतिशत बच्चे कोचिंग ले रहे हैं। और यह हालात तब हैं, जब इस स्तर पर किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं की जाती। इन बड़े मेट्रो शहरों में भी स्कूली स्तर पर कोचिंग संस्थानों की सहायता का उभरता ट्रेंड हमारे देश के बड़े-बड़े स्कूलों की वास्तविक हालातों की कहानी बयां कर रहे हैं।

एसोचेम के मुताबिक भारत में 35 फीसदी की दर से कोचिंग का धंधा बढ़ रहा है और देश में मध्यम वर्गीय अपनी आय का एक तिहाई हिस्सा कोचिंग में खर्च कर रहा है ताकि उनके बच्चे जटिल और कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में पास हो सकें। राजस्थान का कोटा शहर निजी कोचिंग का सबसे बड़ा केंद्र है जहां करियर पॉइंट, बंसल, एलन जैसी तमाम संस्थाएं आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करा रहे हैं इसके अतरिक्त अन्य बड़े शहर भी इससे पीछे नहीं हैं दिल्ली में आईएएस के लिए वाजीराव, चाणक्य, एएलएस जैसे तमाम संस्थान हैं, हैदराबाद में श्री चैतन्य नारायण, देहरादून में प्रयास आईएएस जैसे बड़े संस्थान कोचिंग उपलब्ध करा रहे हैं।

एक दूसरा पहलू भी

यह कहना ठीक नहीं होगा कि कोचिंग संस्थान का उभरता ट्रेंड मध्यम वर्ग की जेब पर बट्टा लगा रहा है। क्योंकि देश के जिन शहरों में बड़े स्तर पर कोचिंग संस्थान चल रहे हैं वहां स्थानीय जनता का आय का बड़ा स्रोत भी उभर कर आया है। किराये के लिए मकान की मांग तेज हुई है, धोबी, नाई, बावर्ची का व्यवसाय बढ़ा है और शहर में अधिक रोजगार सृजित हो रहे हैं, कोचिंग संस्थान में भी नए अध्यापकों को प्लेटफॉर्म मिल रहा है।

हमारे देश में कोचिंग का व्यवसाय इतना अधिक विकसित हो चुका है कि यहां विदेशी निवेश तक होने लगे हैं गेट, मेट, कैट, टोफ्फेल, एलसैट जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कुछ संस्थानों में कैप्लेन जैसी कुछ विदेशी कंपनियां निवेश कर रही हैं।

पर छात्रों का क्या?

पैर पसारते कोचिंग संस्थानों के बीच एक जो छिपी समस्या सबसे गंभीर होती जा रही है वह है कम उम्र के छात्रों के मन पर एक मनोवैज्ञानिक दवाब। आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने का दवाब कम उम्र के बच्चों पर स्कूली दिनों से ही बनाना शुरू कर दिया जाता है। अपरिपक्व दौर में बच्चों के ऊपर हर हाल में प्रतियोगिता पास करने का दवाब तब और बढ़ जाता है जब उनपर कोचिंग संस्थानों में भारी-भरकम निवेश किया जाता है।

और जरुरी नहीं कि हर छात्र सफल ही होगा लेकिन आर्थिक निवेश असफलता को अधिक गंभीर बना देता है और कुछ कमजोर मन के बच्चे नासमझी में आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। दरअसल वैज्ञानिक पक्ष यह कहता है कि 18 या 20 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के मस्तिष्क का फ्रंटल लोब इतना विकसित नहीं होता कि वह कार्य की गंभीरता को समझ सकें और उन पर अधिक दवाब बनाने पर वह आत्म हत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए इसका जवाब इतना आसान नहीं क्योंकि जिस तरह का प्रतियोगी माहौल बन चुका है ऐसे में कोचिंग की भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता है।

एडवांस दौर में अब तो आईआईटी की तैयारी कराने वाले संस्थान स्कूल से ही टाईअप करने लगे हैं और स्वयं स्कूल भी बच्चों को संस्थानों में जाने के लिए प्रोत्साहित करने लगे हैं ऐसे में जरुरत है कि सरकार को मशरूम की तरह उगते इन संस्थानों के विनियमन के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए। जब छात्रों के भाग्य विधाता आज कोचिंग ही हो गए हैं तो फिर इन्हें बिना किसी के जवाब देह हुए केवल अपनी मर्जी पर कैसे छोड़ा जा सकता है।

सरकार को एक निगरानी और विनियमन प्राधिकरण गठित करना चाहिए और कोचिंग संस्थान में क्लास स्ट्रेंथ, फीस निर्धारण, अध्यापकों की योग्यता जैसे कुछ मानक आवश्यक रूप से बनाए जाने चाहिए। प्रतिवर्ष आईएएस की परीक्षा में साढ़े नौ लाख फार्म भरे जाते हैं, जबकि केवल 1100 के आस पास वेकेंसी निकलती है बड़े स्तर पर कोचिंग उपलब्ध हैं, इसी तरह आईआईटी परीक्षा के लिए कुल सीट लगभग नौ हजार होती है लेकिन लगभग 14 लाख बच्चे तैयारी करते हैं इसमें तो ज्यादा भीड़ बढ़ाने का श्रेय कोचिंग संस्थान को भी जाता है। यद्यपि ये संस्थान ही फोकस, पैनापन,परीक्षा की आदत, सवालों की प्राथमिकता सिखाते हैं लेकिन जिस तरह एडवर्टिजमेंट करते हैं उससे पानी की बहाव की तरह अयोग्य छात्र भी बहे चले आते हैं।

अकादमिक शिक्षा का गिरता स्तर भी जिम्मेदार

अगर अकादमिक शिक्षा से कोचिंग की शिक्षा की तुलना की जाए तो खामियां अकादमिक शिक्षा में ही नजर आती है। सामान्यत: कोचिंग संस्थानों की ऊंची-ऊंची फीस और शिक्षा का स्तर दोनों ही स्कूल और कॉलेज को पछाड़ रहा है।

 

पार्थ उपाध्याय

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