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लेख

मुठभेड़ पर स्वार्थ की राजनीति और पुलिस

दीपावली की अगली सुबह देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली भोपाल सेंट्रल जेल से आठ कैदियों के भागने की खबर आई, फिर थोड़ी ही देर बाद पता चला कि वे सभी एक पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। ये आठों कैदी प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के कार्यकर्ता थे और इन पर आतंकवादी गतिविधियों के संगीन आरोप थे। इनमें से तीन पहले भी खंडवा जेल से भाग चुके थे। इन हालातों में जाहिर है, जेल में इन पर खास नजर रखी जा रही होगी। बावजूद इसके, जेल की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए एक जेलकर्मी की हत्या कर इनका जेल से निकल भागना न केवल हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खडे़ कर रहा है बल्कि जेल की लापरवाही को भी उजागर कर रहा है।
इन आठ आरोपियों का इस तरह से जेल से फरार होने की घटना को हम साधारण नहीं मान सकते। इस घटना के घटित होने के बाद इसकी गंभीरता पर और उससे घटित होने वाले घातक परिणामों पर चर्चा न होकर उन पर स्वार्थ की राजनीति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि देश में मुठभेड़ का प्रचलन बढ़ता जा रहा है और इसे जायज ठहराने की भी कोशिशें हो रही है, जबकि 2011 में एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फर्जी मुठभेड़ में हत्याओं के मामले में कड़ी टि΄पणी की थी, जो पुलिस के निरंकुश और नृशंस चेहरे को उजागर करती है।
आज आम जनजीवन अशांति, असुरक्षा, दहशत और वहशत के विषाक्त वातावरण में सांस ले रहा है। सद्भावना जख्मी है, सहजीवन आहत है, हर तरफ गोलियां बरसाती बंदूक, खून सनी खुंखरिया और आग उगलता बारूद है। सीमाओं पर पड़ोसी देश की हिंसक और आतंकी गतिविधियां नित नयी रक्तरंजित लाशों की कहानी गढ़ रही है, वहीं शहरों में अराजकता, गांव में आतंक और पहाड़ों में खूनी मंजर सर्वत्र नरसंहार। इन स्थितियों के बीच कहीं भी शांति, सद्भावना, सौहार्द एवं अहिंसा की बात सुनाई नहीं दे रही है। आखिर कब तक हिंसा का तांडव! नृशंसता!! घृणा!!! वहशीपन!!!! होता रहेगा। कब तक असहाय निरूपाय मानवता को ये सब झेलने पड़ेंगे? उत्तर हमें ही खोजना पड़ेगा, देना होगा।
मुठभेड़ों पर अक्सर गम्भीर सवाल उठते रहे हैं और उठते रहेंगे। क्योंकि पुलिस ने अपनी विश्वसनीयता को धुंधलाया है। इसके कारण उनकी मुठभेड़ या ऐसी अन्य निर्णायक स्थितियां औचित्यपूर्ण होने के बावजूद भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। कानून की दृष्टि में पुलिस को किसी भी इंसान की जान लेने का अधिकार नहीं है, यही कारण है कि जब-जब मुठभेड़ की घटनाएं हुई हैं, उन पर मुकद्दमें अदालतों में चले हैं। इशरत जहां, सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति और बाटला मुठभेड़ काफी चर्चित रहे हैं। अब भोपाल की उच्च सुरक्षा वाली सैंट्रल जेल से भागे 8 सिमी कार्यकतार्ओं को 9 घंटे के भीतर पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मार गिराए जाने पर मध्य प्रदेश पुलिस और मध्यप्रदेश सरकार विपक्ष के विरोध का सामना कर रही है और इस पर स्वार्थ की राजनीति भी शुरू हो चुकी है। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए इस तरह की घटनाओं को हथियार बनाना राजनीति की मर्यादा को खंडित करना है। आज हमारी राजनीति दूषित हो गयी है, राजनीतिक मूल्य चरमरा रहे हैं।
प्रस्तुत प्रकरण में एक गंभीर प्रश्न खड़ा हुआ है कि सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जेल से आखिर खूंखार आठ सिमी कार्यकर्ता कैसे भागने में सफल हो गए? प्रश्न इसी से जुड़ा हुआ यह भी है कि इनके पास कथित मुठभेड़ के लिए हथियार कहां से आए? उनके पास भागने के लिए पर्याप्त समय था तो वे वहीं क्यों रूके रहे? वे आत्मसमर्पण करना चाहते थे, तो उन्हें जिन्दा पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की गई? विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इसी प्रांत के खांडवा जिले से इन्हीं आरोपियों में से कुछ आरोपी पूर्व में भी फरार हो गये थे। प्रश्न और भी हैं जिनकी पड़ताल जरूरी है।
इस तरह की घटनाएं राष्ट्रीय चरित्र पर एक धब्बा है। क्योंकि जब समूचा राष्ट्र पड़ोसी देश के प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है तब ऐसे ही 8 गंभीर आरोपियों पर जेल प्रशासन क्यों नाकाम रहा? इन आरोपियों का जेल से बाहर आना आसान कैसे हुआ? बहस इस पर होनी चाहिए कि क्या पुलिस ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया? क्या उसका तरीका गलत है? क्या उसने संविधान के दायरे से बाहर जाकर इस घटना को अंजाम दिया? अगर उसने ऐसा किया है तो पुलिस दोषी है, अगर संविधान के दायरे में रहकर काम किया तो फिर यह उसकी सफलता है। लेकिन अफसोस है कि मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के चलते अक्सर राष्ट्रीय चरित्र को धुंधलाया गया है।
कैसी विडम्बना है कि शस्य श्यामला भारत भूमि पर आज अशांति, आतंक और हिंसा का तांडव हो रहा है। इन स्थितियों के बीच में भी सत्ता की भूख जायज को जायज और नाजायज को नाजायज मानने का साहस भी नहीं दिखा पा रही है। ऐसी स्थितियों में लोकतंत्र से प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग हो रहा है और इसी ने लोकतंत्र की रीढ़ को तोड़ दिया है। कृषि प्रधान देश को कुर्सी प्रधान देश में बदल दिया है। सरकारें हैं-प्रशासन नहीं। कानून है-न्याय नहीं। साधन है-अवसर नहीं। भ्रष्टाचार की भीड़ में राष्ट्रीय चरित्र खो गया है, उसे खोजना बहुत ही कठिन कार्य है।
भोपाल में जेल सिमी के आठ कैदियों का फरार होना, उनका ईंटखेड़ी की पहाड़ी तक पहुंचना और मुठभेड़ में उनका मारा जाना और इन घटनाओं ने जिन सवालों को खड़ा किया है, वे सभी सवाल राष्ट्रीय चरित्र को घायल कर रहे हैं। जब तक इन सवालों के माकूल जवाब नहीं तलाशे जायेंगे, राष्ट्रीय चरित्र इसी तरह घायल अवस्था में रहेगा।
अत: स्वार्थ की राजनीति छोड़कर देशहित के लिए स्वस्थ चिंतन अपेक्षित है। विघटनकारी प्रवृत्तियों को त्याग कर भावात्मक एकता के वातावरण का निर्माण करना होगा। स्वार्थी हथकण्डों को छोड़कर बुरे और बुरे में से कम से कम बुरे का नहीं, अपितु अच्छे और अच्छे में से सबसे अधिक अच्छे चुने जाने का वातावरण बनाना होगा। विघटन के कगार पर खड़े राष्ट्र को बचाने के लिए राजनीतिज्ञों को अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागना होगा। पुलिस को भी अपनी धुंधली होती छवि को बचाने के लिए ईमानदारी एवं राष्ट्रीय जिम्मेदारी का चोला ओढ़ना ही होगा।
ललित गर्ग

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