लेख

शिक्षा बनाम लोक संस्कृति

Education, Public, Culture

हाल ही में राजस्थान के समाचार पत्रों में एक खबर पढ़ने को मिली कि राजस्थान सरकार ने निर्णय किया है कि आने वाले शिक्षा सत्र में राजस्थान शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त सभी सरकारी व गैर सरकारी प्रारम्भिक व माध्यमिक स्कूलों में हर शनिवार को सामाजिक सरोकार से जुड़ी शिक्षा प्रदान की जायेगी।

इसके लिये माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने शिविरा पंचाग जारी किया है। शिक्षा विभाग के स्कूलों में प्रथम शनिवार को किसी महापुरूष के जीवन से सम्बन्धित प्रेरक जानकारी दी जायेगी। दूसरे शनिवार को दादी, नानी से जुड़ी प्रेरक कहानियां सुनायी जायेंगी। माह के तीसरे शनिवार को संत, महात्माओं, धर्मगुरूओं के प्रवचन करवाये जायेगें। चौथे शनिवार को महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री होगी। पांचवे शनिवार को प्रेरक नाटकों का मंचन व राष्ट्रभक्ति गीतो का गायन होगा।

शिक्षा विभाग से उक्त आदेश जारी होते ही कई शिक्षक संगठनो ने सरकार के इस आदेश का यह कह कर विरोध करना शुरू कर दिया कि इससे शिक्षा का भगवाकरण होगा। मेरी नजर में सरकार का यह एक अच्छा कदम है। आज के दौर में विद्यार्थी दर्जनों किताबो व कापियों से भरे भारी भरकम बस्तो का बोझ उठाये मानसिक रूप से इतने दब चुके है कि उन्हे समाजिक गतिविधियों का ज्ञान ही नहीं रहता है। छात्र दिन भर अपनी पढ़ाई की चिंता में डूबा रहता है। आज छात्र बोर्ड की परीक्षा में 500 में 499 अंक प्राप्त करने लगा है। पहले के समय में प्रथम श्रेणी से पास होने वाला श्रेष्ठ छात्र माना जाता था। छात्रों के 70-75 प्रतिशत अंक आना तो बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। ऐसे में आज के समय में छात्रों के मध्य पढ़ाई को लेकर भारी प्रतिस्पर्धा चल रही है।

आज हर बच्चे के अभिभावक भी चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में सर्वाधिक अंक लाये। बच्चे भी अभिभावकों के दबाव में दिन भर किताबों में डूबे रहने लगे हैं। ऐसे में बच्चो की पूरी दुनिया किताबो के बस्तों व स्कूल तक ही सिमट कर रह गयी है। आज बच्चे को घर में क्या हो रहा है, क्या सामाजिक रीति-रिवाज, मान्यतायें है इससे उन्हे कोई सरोकार नहीं हैं। बच्चों की पूरी दुनिया तो अधिकाधिक अंक प्राप्त करने का प्रयास करने तक ही रह गयी है।

ऐसे में राजस्थान सरकार का निर्णय एक नयी आस जगाता है। इस निर्णय से बच्चों को अपनी संस्कृति को, अपने स्थानीय रीति-रिवाजों को निकट से जानने, समझने का मौका तो मिलेगा ही उनकी जिन्दगी में एक नया नवाचार भी होगा।

पहले के समय में छोटे बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे तब आज की तरह स्मार्ट फोन का जमाना नहीं था। उस वक्त सभी बच्चे रात में सोने से पहले घर के बड़े बुर्जुगों, दादी, नानी से कहानियां सुनते थे। गर्मी की छुट्टियों में बच्चे जब अपनी ननिहाल जाते थे तो उनको सबसे अधिक उत्सुकता नानी से कहानियां सुनने की होती थी। नानी भी बच्चों को बड़े चाव से कहानियां सुनाती थी। उस जमाने के बुर्जुगों को बहुत सारी कहानियां याद रहती थी जो रोजाना बच्चों को सोने से पहले सुनाया करती थी।

स्कूलों में महापुरूषों के जीवन पर चर्चा करना, प्रेरक कहानियां सुनाना, धर्मगुरूओं के प्रवचन सुनाना, महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री, प्रेरक नाटकों का मंचन करना कतई गलत नहीं हैं। हम जब स्कूल में पढ़ते थे तो गांव के स्कूल में प्रतिवर्ष दो-तीन नाटको का मंचन किया जाता था। स्कूल में खेले जाने वाले नाटकों के सभी पात्र स्कूल के अध्यापक व विद्यार्थी निभाते थे। कई दिन पहले से नाटक का रिहर्सल शुरू हो जाता था। नाटक देखने पूरा गांव उमड़ पड़ता था। नाटक के माध्यम से स्कूल में कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी जिससे गरीब बच्चों की फीस, किताब, कापी व ड्रेस की व्यवस्था की जाती थी। उसमें से कुछ पैसा स्कूल के कमरों में सफेदी करने पर भी खर्च किया जाता था। सफेदी बच्चे स्वंय ही करते थे।

आज के तकनीकी युग में बच्चे अपने महापुरूषों, बड़ों-बुर्जुगों को भूलते जा रहे हैं। स्कूलों में महापुरूषो के जीवन पर चर्चा की जायेगी तो बच्चों में उनके बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होगी। हमारे झुंझुनू जिले के खेतड़ी में स्वामी विवेकानन्द जी ने तीन बार यात्रा की थी व कई दिनों तक यहां ठहरे थे। उनको भगवाबाना व स्वामी विवेकानन्द नाम भी शिकागो धर्म सम्मेलन में जाते वक्त खेतड़ी के राजा अजीतसिंह जी द्वारा ही प्रदान किया गया था।

मगर आज इस बात का ज्ञान कितने विद्यार्थियों को है। स्कूलों में जब महापुरूषों के जीवन पर चर्चा होगी तब स्वामी विवेकानन्द जी का प्रसंग जरूर आयेगा व विद्यार्थियों को उनके बारे में पता लग सकेगा। इसी प्रकार की अन्य पे्ररणादायक बातों से छात्र रूबरू होगें। स्कूलों में धर्मगुरू छात्रों को धर्म से जुड़ी सामाजिक एकता की बाते बतायेंगें तो उनकी सोच का दायरा बढ़ेगा। धर्म कोई भी हो सभी धर्मो में समाज को एकसूत्र में पिरोने की बातें होती हंै। कोई भी धर्म समाज को तोड़ने की शिक्षा नहीं देता हैं। सभी धर्म शान्ति के मार्ग पर चलने की राह दिखाते हैं।

आज के प्रतियोगिता के दौर में मनुष्य एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बन कर रह गया है। वर्तमान समय में स्कूल शिक्षा का केन्द्र ना होकर पढ़ाई के कारखाने बन चुके हैं। हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा उसके पड़ोसी के बच्चे से अधिक अंक प्राप्त करें।

ऊंची पढ़ाई पढ़ कर बड़े पद पर काम करें। अभिभावक प्रतिस्पर्धी के चक्कर में यह भी नहीं देखता की उसका बच्चा क्या पढ़ना चाहता है। उसकी किस विषय में रूचि है। बच्चों को उनकी रूचि का विषय नहीं मिलने पर सही ढ़ंग से पढ़ नहीं पाते हैं, उपर से कम अंक लाने पर घर वालों का डर। ऐसे माहौल में बच्चा अवसाद की स्थिति में आ जाता है व कई बार इसी प्रकार के तनाव के चलते वह गलत कदम उठा लेता है।

राजस्थान का कोटा शहर कोचिंग के क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी मंडी बन चुका हैं। यहां प्रतिवर्ष लाखों छात्र पढ़ने आते हैं मगर तनाव के चलते प्रतिवर्ष दर्जनो छात्र आत्महत्या भी कर लेते हैं। हालांकि यहां से हर साल कई टापर भी निकलते हैं मगर आत्म हत्या करने वाले उनपर एक बदनुमा दाग बन जाते है। यहां पढ़ने वाले छात्र द्वारा आत्म हत्या करने का कारण पढ़ाई का दवाब रहता है।

उन छात्रों के घरवाले उनपर लाखों रुपए खर्च कर उन्हे कोटा इस आस में पढ़ने भेजते हैं कि वहां जाकर वह प्रतियोगी परीक्षा अवश्य पास कर लेगा ऐसे में परीक्षा में असफल होने पर वे मानसिक दबाव में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। जिसका खामियाजा उनके अभिभावकों को जिन्दगी भर उठाना पड़ता है।

आज की शिक्षा मात्र किताबी व कम्प्यूटर वाली रह गयी है। शिक्षा में व्यावहारिक पक्ष गायब हो गया है। शिक्षा का पूर्णत: व्यावसायी करण हो चुका है। इस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों से व्यावहारिकता की उम्मीद करना बेमानी है। सरकारों को शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन कर इसे व्यवहारिक, रोजगारपरक व सामाजिक समरसता वाली बनाने की दिशा में कदम उठाने चाहिये ताकि शिक्षा पूर्ण करने के बाद मात्र सरकारी नौकरी की आश ना रख अपने स्वरोजगार पर भी ध्यान केन्द्रित कर सके। जिससे शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या पर काबू पाया जा सके।

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