सम्पादकीय

विरोधियों को नसीहत

आखिर माननीय राष्ट्रपति को ही संसद में हंगामा करने वाले विरोधी दलों को नसीहत देनी पड़ी। आम दिनों में भी विपक्ष के लोग संसदीय मर्यादाओं का हनन करते रहते हैं, जो बार-बार संसद की कार्रवाई में व्यवधान का कारण बनती है और बहुत बार संसद को ठ΄प कर दिया जाता है। जो अभी हो रहा है, यह लोकतंत्र की आत्मा को कुचल देने जैसा है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि नोटबंदी के कारण देशभर में आम जनता के साथ-साथ व्यापारियों को मुश्किलें आ रही है, जिसका सरकार द्वारा कोई न कोई हल निकाला जाना चाहिए। सरकार इस मामले में चुप नहीं बैठ सकती, बल्कि कालेधन पर सख्ती के साथ-साथ लोगों को राहत देने के लिए कोई न कोई तरीका निकालना चाहिए। लेकिन विपक्ष के लोगों ने तो मानो ठान रखी है कि वे मौजूदा सरकार की कमियों को सदन में रख सदन नहीं चलने देंगे। विपक्षी दलों ने नोटबंदी पर सरकार को घेरने की बजाए संसद को घेर लिया है। आलोचना की भाषा तो किसी को याद ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए चोर, ठग जैसे शब्द प्रयोग हो रहे हैं। विपक्षी सवाल भी खुद करते हैं और जवाब भी खुद ही देते हैं। सरकार का जवाब सुनने के लिए उनके पास सयंम ही नहीं है। कोई कह रहा है कि मैं बोलूंगा तो तूफान आ जाएगा। सांसदों का काम तूफान लाना नहीं, बल्कि दलीलों व तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष पेश करना होता है। कम से कम अब राष्ट्रपति के कहने पर विपक्षी दलों को जरूर समझने की कोशिश करनी चाहिए। आम लोग भी गणमान्यजनों की बात सुनते हैं व स्वीकार करते हैं। फिर देश के सबसे उच्च पद पर विराजमान निष्पक्ष नेता की बात तो विरोधियों को माननी चाहिए। राष्ट्रपति की आवाज को देश का बच्चा-बच्चा सुन रहा है। कभी कांग्रेस सरकार में रहते भाजपा व अन्य पार्टियों को मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, लेकिन अब उसी कांग्रेस के नेता ही वही सब कुछ कर रहे हैं जिस पर दूसरी पार्टियों को वह रोकती थी। हैरानी तो इस बात की है कि वोट बैंक की राजनीति ने देश को बुरी तरह से बांट दिया है। किसी भी मुद्दे पर सहयोग व एकता नजर नहीं आती। यदि विरोधी पार्टी का नेता साफ मन से सरकार के किसी काम की सुविधा कर दे तो फिर उसे अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। विरोधी पार्टियां जिस लोकतंत्र की बात करती हैं वह लोकतंत्र अभी न तो पार्टियों के अंदर है व न हीं बाहर है। सदन में बात पूरे देश में सुनी जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सदन में अपनी बात रखी लेकिन हंगामा नहीं किया। उनकी बात सदन में व सदन के बार जनता ने भी सुनी। सभी पार्टियां नोटबंदी के विरोध में एकजुटता भले रखें, लेकिन विरोधी दलों को तर्क के साथ अपनी बात रखनी चाहिए, न कि संसद ठ΄प करनी चाहिए।

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