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लेख

नोटबंदी पर जायज है, अदालत का सख्त रुख

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500और 1000 रुपये के बंद हो चुके नोट जमा कराने से रह गए लोगों के दिल में एक उम्मीद की किरण जगी है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में नोटबंदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए नोटबंदी के दौरान किसी मजबूरीवश 500 और 1000 के पुराने नोट जमा न करा पाए लोगों को एक और मौका दिए जाने पर केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया दोनों से जवाब मांगा है।

संविधान का अनुच्छेद-21 देश के सभी नागरिकों को जीवन का अधिकार देता है। यह अनुच्छेद उसे सम्मान से जीवन जीने का अधिकार भी देता है। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने भी इस बात को माना कि जिनके पास तार्किक आधार है, उनकी बात सुनी जानी चाहिए। उन्हें सरकार नोट जमा करने का एक और मौका दे।

गौरतलब है कि सुधा मिश्र और कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल कर निश्चित अवधि में पैसा जमा न करा पाने की अपनी मजबूरी बताते हुए अदालत से पुराने नोट जमा कराने का निर्देश मांगा था। मामले की सुनवाई के बाद अदालत को भी याचिकाकर्ताओं की दलील में दम दिखाई दिया।

लिहाजा उसने सरकार से इस मसले पर संजीदगी से विचार करने को कहा। अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 जुलाई को होगी, जिसमें सरकार अपना पक्ष अदालत के सामने रखेगी। हालांकि सरकार, अदालत में पहले ही एक हलफनामा दाखिल कर यह कह चुकी है कि वह पुराने नोट जमा कराने के लिए अब कोई विंडो नहीं खोलने जा रही।

सरकार के इस हलफनामे के बावजूद शीर्ष अदालत को अब भी यह लगता है कि जो लोग किसी मजबूरी से अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा बैंक में जमा नहीं कर पाए, उन्हें रियायत मिले।

नोटबंदी से पीड़ित लोगों के किस्से यदि जानें, तो वह ऐसे हैं कि उन्हें सुनकर पत्थर दिलवालों का भी दिल पसीज जाए। उन्हें उनसे सहानुभूति पैदा हो जाए। मसलन एक याचिकाकर्ता की यह शिकायत है कि वह अपने 66 लाख, 80 हजार रुपये महज इसलिए बैंक में नहीं जमा करा सका, क्योंकि बैंक में उसकी केवाईसी अपडेट नहीं थी और बैंक ने उस वक्त केवाईसी अपडेट करना स्वीकार नहीं किया।

वहीं दूसरी याचिकाकर्ता सुनीता गुप्ता जो कि राजस्थान के अलवर जिले की रहने वाली हैं, उन्हें लंबे समय से लंग्स कैंसर हैं। उनका एम्स में इलाज चल रहा है। जब पुराने नोट बंद किए गए, तब वह कोमा में थीं।

तीन महीने बाद वह कोमा से बाहर आईं, तो उन्हें यह मालूम चला कि इलाज के लिए जो उनके पुराने नोट घर में रखे हैं, उनका कोई मोल ही नहीं है। फिर भी आखिरी उम्मीद लेकर सुनीता और उनके पति रिजर्व बैंक पहुंचे, लेकिन गार्ड ने उन्हें अंदर ही नहीं जाने दिया। उन्हें बाहर से ही भगा दिया गया।

तीसरी याचिकाकर्ता सुधा मिश्र नोटबंदी के दरमियान अस्पताल में भर्ती थीं। बच्चे को जन्म देने की वजह से वह बंद कर दिए गए नोट जमा नहीं कर सकीं। अब जब वे ठीक होकर रिजर्व बैंक पहुंची, तो उन्हें भी निराशा हाथ आई। वहीं एक दीगर याचिकाकर्ता 71 साल की सरला श्रीवास्तव का कहना था कि उनके पति की मौत बीते साल अप्रैल में हुई।

उन्हें जनवरी में यह बात मालूम हुई कि पति के बक्से में 1.79 लाख के पुराने नोट हैं। इसके अलावा देश में तमाम लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो नोटबंदी के दरमियान जेल में बंद थे, लिहाजा वे अपने नोट बैंक में जमा नहीं कर पाए।

सरकार के वादे के मुताबिक पहले तो पुराने नोट 31 मार्च तक हर हाल में जमा होने चाहिए थे, पर सरकार ने देशवासियों से किया अपना वादा नहीं निभाया। वह अपने वादे से मुकर गई।

अब जबकि कुछ लोग उचित कारणों के साथ अपना पैसा आरबीआई में जमा कराने आ रहे हैं, तो बैंक को उनका पैसा जमा करना चाहिए। सरकार और आरबीआइ को भी ऐसी राह निकालना चाहिए, जिससे नोटबंदी से पीड़ित लोगों को राहत मिले। वह अपना बाकी का जीवन सम्मान के साथ बिता सकें।

-जाहिद खान

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