सम्पादकीय

पंजाब में बेखौफ हुए अपराधी

पंजाब में शराब माफिया द्वारा की गई हत्याकांड की घटनाएं चिंताजनक हैं, जो सरकार के कानून एवं व्यवस्था के प्रबंधों की ΄ोल खेल रही हैं। सरकार व पुलिस की ढीली कार्यशैली का अनुमान इस बात से ही लग सकता है कि मानसा में घटित घटना के सारे आरोपी अभी काबू भी न हो सके कि जालंधर में दिन-दहाड़े भरे बाजार में शराब माफिया के करिंदों ने शराब का विरोध करने वाले एक युवा को गाजर-मूली की तरह काट दिया। शराब माफिया ने जिस तरह से उक्त कत्लेआम को अंजाम दिया है, उससे आम शहरी डरे हुए हैं। ये घटनाएं देश में मैक्सिको व कोलंबिया की अपराध दुनिया का मंजर नजर आ रही हैं। सबसे दु:खद बात यह है कि प्रशासनिक व सरकारी स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर कोई चिंता नजर नहीं आ रही। अन्यथा यह कैसे संभव है कि शराब माफिया पुलिस प्रशासन के होते हुए आम शहरियों का खून बहाए। उल्टे सरकार व प्रशासन अपनी औपचारिक बोली बोल रहे हैं कि दोषियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा, मृतकों के परिवार को मुआवजा दिया जाएगा। पंजाब में इस वक्त लॉ एंड आॅर्डर को कायम रखने वाली पुलिसिंग कहीं नजर नहीं आ रही। यह एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर क्यों प्रदेश में शराब माफिया इतना बेखौफ हो रहा है? यह एकदम साफ जान पड़ रहा है कि अपराधी मान रहे हैं कि वह जो मर्जी अपराध करते फिरें, पुलिस उन्हें छू नहीं सकती। अगर आमजन, मीडिया या न्यायालय के दबाव में आकर पुलिस कुछ अपराधियों को पहचान कर गिरफ्तार कर भी लेती है, तब उसमें एक मजबूत मुकदमा बनाने की इच्छाशक्ति नहीं होती कि अपराधी दंड के अंजाम तक पहुंच जाएं। पंजाब में इस समय पुलिस एवं राजनेताओं का एक शानदार गठबंधन हो चुका है, जिसमें अपराधी भी एक पक्ष को सकते हैं। राजनेताओं के साथ बैठी पुलिस का नुक्सान स्वयं पुलिस को ही हो रहा है। क्योंकि राजनेता अपनी अल्पकालीन सत्ता जी लेने के बाद किनारे हो जाएंगे, लेकिन पुलिस सिद्धांत विहीन होकर किसी दूसरे राजनेता की चौखट ढूंढेगी। अच्छा हो यदि पुलिस सिर्फ पुलिसिंग ही करे, ताकि प्रदेश का आम नागरिक अपने-आपको सुरक्षित महसूस करे। जब नागरिक सुरक्षित होंगे, तब किसी नेता की भी हिम्मत नहीं होगी कि वह पुलिस को अपनी जकड़ में ले सके। प्रदेश में पिछले वित्तीय वर्ष में सैकड़ों पंचायतें शराब के विरूद्ध अपने प्रस्ताव सौंप चुकी हैं, लेकिन सरकार शराब को इस शिद्दत से बेचना चाहती है कि उन पंचायतों के प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है। पंजाब के आम नागरिकों को भी अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए, ताकि प्रदेश को लोकहितकारी सरकार मिल सके। छोटे-छोटे स्वार्थों की वजह से दिए गए वोट कई बार प्रदेशों को अपराध, नशा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार एवं सरकारी तानाशाही की अंधी गलियों में धकेल देते हैं। जैसा कि अब पंजाब के लोग इन अंधी गलियों में चीख-पुकार मचाते बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं, लेकिन रास्ता है कि मिल ही नहीं रहा।

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