सम्पादकीय

महिलाओं के विरूद्ध अपराध सामाजिक उदासीनता

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अभी निर्भया केस का फैसला आए अभी दो सप्ताह भी नहीं हुए कि हरियाणा के सोनीपत जिला की एक युवती के साथ निर्भया जैसा ही जघन्य अपराध सामने आया है। इस अपराध में भी लड़की की दुष्कर्म के बाद हत्या की गई है। हत्या का तरीका बेहद की क्रूर है। जिस तरह से निर्भया के दोषियों को मृत्युदंड मिला है,

उसी तरह इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि इस हैवानियत के दोषियों को भी मृत्युदंड ही मिलेगा। मृतक युवती की मां का दर्द अपराधियों की मानसिक विकृति को दर्शाने के लिए काफी है कि क्यों कोई इस देश में बेटी पैदा करेगा? देश में दिन-ब-दिन महिलाओं खासकर किशोरियों एवं युवतियों के लिए माहौल खराब होता जा रहा है।

यहां समाज ज्यादा दोषी नजर आ रहा है, अन्यथा ऐसा कैसे हो सकता है कि अपराधियों को मृत्युदंड भी मिल रहे हैं, और अपराधी हैं कि हर नए दिन और ज्यादा भयानक रूप धर रहे हैं। सोनीपत की इस युवती के साथ जो हुआ, वह कोई एक दिन में घटित नहीं हुआ, न ही यह हमला निर्भया के जैसा है, यहां अपराधियों ने रात को एकदम से हमला बोल दिया था।

निर्भया के मामले में अपराधी व पीड़िता पहले कभी आमने-सामने भी नहीं हुए थे। सोनीपत की इस दूसरी निर्भया को तो कई महीनों तक सताया जाता रहा। अपराधी आए दिन पीड़िता के विरूद्ध मौका ताकते रहे। समाज, पुलिस सब उदासीन रहे। नतीजा, एक और युवती को निर्भया की तरह बलि चढ़ना पड़ा। भारतीय पुलिस व्यवस्था,

विधि विशेषज्ञ, समाज विज्ञानी अभी भी महिलाओं के विरूद्ध अपराध की शुरुआत को सही तरीके से परिभाषित नहीं कर पा रहे। जब तक अपराध परिभाषित नहीं होगा, तब तक उसका निवारण बेहद कठिन है। अभी जो महिला सुरक्षा अधि. है, उसके अंतर्गत हालांकि काफी बातों को परिभाषित कर लिया गया है, जैसे- युवतियों महिलाओं को घूरना, उनका पीछा करना,

गलत तरह से छूना वगैरह-वगैरह, लेकिन ये सब दुष्कर्म की तैयारी के तौर पर परिभाषित किए जाएं। इनका दंड भी कठोर किया जाए। नारकोटिक्स उन्मूलन में स्पष्ट है कि नशे के पौधे बोना भी अपराध है, जबकि नशा तो कहीं पैदा भी नहीं हुआ होता, ठीक इसी तरह महिला सुरक्षा अधि. में पुन: सुधार हो और अपराधियों को कठोर दंड मिले।

वक्त बहुत समय से मांग कर रहा है कि लड़कियों को आत्मरक्षा में पारंगत किया जाए, जो नहीं हो रहा। अभी भी स्कूलों, कॉलेजों, कार्यस्थलों पर खानापूर्ति हो रही है, जबकि यह सब गंभीरता से हो। महिलाओं के विरूद्ध अपराधों का न्यायालय में विचारण तीन माह में ही पूरा किया जाए, ताकि कोई भी अपराधी दंड से बचा न रह सके। समाज में बेटियां पैदा होने से नहीं रोकी जाएं, बल्कि बेटियों के पैदा होने से ही उन्हें रणचण्डी या रानी झांसी बनाया जाए।

 

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