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आओ जानें कहां बेचें औषधीय पौधे

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सरकारें ध्यान दें तो औषधीय पौधों से किसानों की माली हालत ज्यादा सुधर सकती है

परंपरागत फसलों के साथ किसान यदि औषधीय खेती करें तो मोटा मुनाफा कमाकर मालामाल हो सकते हैं। देश के ज्यादातर किसान नहीं जानते कि दूसरी फसलों के मुकाबले औषधीय पौधों की खेती ज्यादा फायदेमंद है। बदलते दौर में किसान खेती के साथ औषधीय पौधे लगाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं। यह बात अलग है कि ज्यादातर किसान इन के बारे में नहीं जानते।

औषधीय पौधों के बीज, पौध, रोपण सामग्री व तकनीकी जानकारी भी हर किसी को आसानी से नहीं मिलती। भारत में औषधीय पौधों पर चल रही सरकारी स्कीमों की कमी नहीं है लेकिन किसानों को इनके बारे में मालूम नहीं है। यही वजह है कि ज्यादातर किसान औषधीय पौधे नहीं लगा पाते। माहिरों की खोजबीन के मुताबिक पहचाने गए औषधीय पौधों का कुनबा बहुत बड़ा है।

इस पर 3 नई किताबें भारत सरकार की चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने पिछले दिनों छापी हैं। इन में शामिल औषधीय पौधों व किस्मों की गिनती 1100 से ऊपर है, लेकिन फिलहाल इन में से सिर्फ 35 औषधीय पौधों की क्वालिटी के लिए ही मानक तयशुदा हैं। आयुष उत्पादों के मामले में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 10 फीसदी है, जबकि बढ़त की गुंजाइश हमारे देश में अभी भी बहुत है।

औषधीय पौधों को बचाने व बढ़ाने के लिए साल 2000 से केंद्र सरकार का स्वास्थ्य महकमा राष्ट्रीय औषध पौध बोर्ड (एनएमपीबी) के जरीए कई स्कीमें चला रहा है। इस के साथ ॅही देश भर में 35 राज्य स्तर के बोर्ड भी चल रहे हैं। मिशन की स्कीमों में औषधीय पौधे उगाने पर 75 फीसदी व प्रोसेसिंग पर 50 लाख रुपए तक माली मदद दी जाती है,

लेकिन इस का प्रचार-प्रसार नहीं के बराबर है। यदि सरकारें ध्यान दें तो औषधीय पौधों से किसानों की माली हालत जल्दी व ज्यादा सुधर सकती है।

यहां बेचें औषधीय पौधे

देसी, यूनानी, सिद्ध व होम्योपैथिक दवाएं बनाने में जड़ीबूटियों का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है। औषधीय पौधों से हासिल फल, फूल, बीज, छाल, तना, पत्ती व जड़ के हिस्से जड़ीबूटियां हैं। हमारे देश में 3 हजार से ज्यादा छोटीबड़ी कंपनियां देसी दवाएं बनाती हैं। अगर जानकारी हो तो औषधीय पौधों के उत्पाद बिकने में दिक्कत नहीं होती।

फिर भी बेहतर होगा कि पहले ही किसी दवा कंपनी या खरीदार से बात कर ली जाए। हरिद्वार की पतंजलि फार्मेसी रोज सैकड़ों टन ग्वारपाठा व आंवला वगैरह कई चीजें खरीदती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी औषधीय उत्पादों के बाजार हैं। यह बात अलग है कि आम किसानों को यह जानकारी नहीं है कि औषधीय पौधों के उत्पाद कहां, कब, कैसे व कितनी कीमत में बिकते हैं।

लिहाजा किसान पूरी जानकारी के बादही औषधीय पौधे लगाएं, ताकि उन्हें बाद में उपज बेचने के लिए परेशान न होना पड़े। इसके लिए जागरूकता जरूरी है। साथ ही देसी दवा बनाने में काम आने वाले कच्चे माल के अनेक खरीदारों के पते इंटरनेट पर भी मौजूद हैं।

ये हैं कुछ खास औषधीय पौधे

अश्वगंधा, गिलोय, रुद्राक्ष, काला सिरस, अशोक, भूमि आंवला, चिरायता, पंगारा, हारसिंगार, मुलैहटी, गूलर, वन तुलसी, सफेद तुलसी, रामा तुलसी, सदाबहार, तुन, पीला वासा, पोई, कचनार, पत्थर चूर, पलाश, कट करंज, प्रियंगू, मद, भांग, देवकिली, अजवायन, कसामर्द, सफेद मूसली, काली मूसली, कालमेघ, इसबगोल, घृतकुमारी, सनाय, बच, भृंगराज,

आंवला, तगर, जंगली अरंड, सेहुंड, दूधी, कैंथा, बरगद, बबूल, बेच, चंदन, सप्तपर्णी, अंबाहलदी, पीली हलदी, हरी चाय, तेजपात, लघुपाठा, हाड़जोड़, नीबू, भाट, अपराजिता, कुंदरू, लसोड़ा, वरुन, सुदर्शन, जमालघोटा, पीपल, गुड़मार, गुड़हल, रतनजोत, आम, नीम, जामुन, इमली, बकैन, मौलश्री, जल ब्राह्मी, शहतूत, लाल कनेर, सर्पगंधा, सेमल, सागौन, सतावर, कदंब, ईश्वरमूल, दमनक, कटहल, काली मकोय, मोथा, शीशम, काला धतूरा, कनक धतूरा, गेंठी, जापानी पोदीना, वाराहीकंद, अनंतमूल, कुचैला, नागेश्वर, गोखरू व कैंच।

भारत में औषधीय पौधों पर चल रही सरकारी स्कीमों की कमी नहीं है लेकिन किसानों को इनके बारे में मालूम नहीं है। यही वजह है कि ज्यादातर किसान औषधीय पौधे नहीं लगा पाते। माहिरों की खोजबीन के मुताबिक पहचाने गए औषधीय पौधों का कुनबा बहुत बड़ा है। इस पर 3 नई किताबें भारत सरकार की चिकित्सा अनुंसधान परिषद ने पिछले दिनों छापी हैं।

तीन माह में तैयार हो जाती है तुलसी की फसल

अशोक, अश्वगंधा, अर्जुन, अतीस, बायबिड़ंग, बेल, ब्राह्मी, चंदन, चिरायता, गिलोय, गूगल, इसबगोल, जटा मांसी, कालमेघ, कुटकी, शतावर, शंखपुष्पी, सफेदमूसली, दालचीनी, हरड़, बहेड़ा, आंवला, सौंफ व सनाय वगैरह की मांग आमतौर पर ज्यादा रहती है। औषधीय पौधों से मिली कई चीजें हमारे देश से दूसरे मुल्कों को भेजी जाती हैं,

लेकिन इस में ज्यादातर हिस्सा रसायनों के बगैर उगाए गए औषधीय पौधों से मिली आर्गेनिक सामग्री का रहता है। एक प्रगतिशील किसान ने बताया कि ज्यादातर किसान अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा आने के इंताजर में रहते हैं, जबकि औषधीय पौधों से पैसा काफी देर से मिलता है, लेकिन तुलसी की फसल सब से जल्दी सिर्फ 3 महीने में पक कर तैयार हो जाती है। लिहाजा किसान हिचक छोड़ कर इस काम की शुरूआत कर सकते हैं।

ये हैं एक साल में तैयार होने वाली औषधीय फसलें

इसके अलावा अश्वगंधा, आंवला, ब्राह्मी, चिरायता, गुडुची, कालमेघ, मकोय, पाषणभेद, सनाय, मेहंदी व बच आदि 1 साल में तैयार हो जाते हैं। लिहाजा किसान अपनी पसंद व कूवत के मुताबिक पेड़ चुन सकते हैं। देसी, यूनानी व होम्योपैथिक वगैरह दवाएं औषधीय पौधों से मिली चीजों से बनती हैं। लिहाजा बहुत सी दवाओं के लिए कच्चे माल की भारी मांग रहती है। नतीजतन औषधीय पौधे बहुत तेजी के साथ घट रहे हैं, जबकि औषधीय पौधों की खेती उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, जितनी कि जरूरत है।

पूरी जानकारी होना जरूरी

इसके लिए जरूरी है कि किसान औषधीय पौधे उगाने से ले कर उन के तैयार होने तक की पूरी तकनीक ठीक से जानते हों। हालांकि यह काम कोई मुश्किल या नामुमकिन नहीं है। किसान ट्रेनिंग ले कर औषधीय पौधे उगाना सीख सकते हैं व उन से हासिल सामग्री बेच कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।

सीमैप से सलाह ले सकते हैं किसान

दिल्ली में भारत सरकार की एक मशहूर संस्था है वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, जिसे सीएसआईआर भी कहा जाता है। इस संस्था के तहत उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान काम कर रहा है, जिसे सीमैप भी कहते हैं। इस संस्थान ने औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने का काफी काम किया है।

सीमैप ने औषधीय पौधों की उम्दा किस्में मुहैया कराने, प्रसंस्करण करने, किफायती उपकरण निकालने, ट्रेनिंग व सलाहमशविरा देने से लेकर बाजार उपलब्ध कराने तक हर पहलू पर काम किया है। लिहाजा किसान इस संस्था से मदद ले सकते हैं। सीमैप औषधीय पौधों की जानकारी देने के लिए किसान मेले एवं प्रदर्शनी लगाती है, ताकि किसान सीधे वैज्ञानिकों से मिल कर सवाल पूछ सकें।

औषधीय पौधों की किस्म, रोपण तकनीक, औजार, मशीनों व प्रोसेसिंग आदि के बारे में अधिक जानकारी के लिए किसान व उद्यमी सीमैप के नीचे दिए पते पर संपर्क कर सकते हैं।

ई-चरक प्लेटफार्म : यहां आॅनलाईन बेचें औषधीय पौधे

ई-चरक”- ई-चरक चैनल जड़ी बूटी, सुगंधित, कच्चे माल और उसकी जानकारी, औषधीय पौधों के क्षेत्र में शामिल विभिन्न हितधारकों के बीच जानकारी का आदान प्रदान करने का एक मंच है। ई-चरक संयुक्त रूप से प्रगत संगणन विकास केंद्र (सी-डैक), राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के द्वारा विकसित किया गया है।

ई-चरक का उपयोग

खरीदारों और औषधीय पौध क्षेत्र के विक्रेताओं में आपसी संपर्क बनाने के लिए एक वर्चुअल बाजार के रुप में कार्य। वर्चुअल शोकेस के रुप में औषधीय पौध क्षेत्र के उत्पाद और संबंधित सेवाओं को प्रदर्शित करने के लिए। प्रौद्योगिकी जानकारी, बाजार की जानकारी और औषधीय पौध क्षेत्र के अन्य संसाधनों के ज्ञान भंडार के रूप में।

इस तरह मदद करता है ई-चरक

उत्पादों/ सेवाओं के लिए बेहतर बाजार, सही ग्राहक पहचान में समय और ऊर्जा की बचत, माल की सही कीमत जानना, लाभ में उचित हिस्सेदारी, क्या और कितना उत्पादन करने के लिए- बेहतर निर्णय लेना, ई-चरक तक कैसे पहुँचें, ई-चरक वेब और मोबाइल संस्करण दोनों रुप में उपलब्ध है।

ई-चरक का उपयोग कैसे करें

ई-चरक पर रजिस्टर करें या वेब इंटरफेस के माध्यम से या मोबाइल एप्लिकेशन डाउनलोड करके। बिक्री/खरीद के लिए ब्राउज की जाने वाली विषयवस्तु। मुख्यपृष्ठ पर खरीद/बिक्री के लिए विषयवस्तु सूचीबद्ध है। एडवांस्ड सर्च विकल्प, जैसे कि “वनस्पतिक/व्यापार नाम से खोजें”, “श्रेणी वार-उत्पाद खोजें”,”राज्यवार विषयवस्त खोजें”, “खरीद/बिक्री के लिए विषयवस्तु

खोजें” का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उपयोगकर्ता विषयवस्तु के साथ उपलब्ध “संपर्क करें “विकल्प का उपयोग कर सकते हैं। विषयवस्तु पोस्ट करने वाले को प्रतिक्रियाएं एसएमएस और ई-मेल दोनों माध्यम से प्राप्त होती हैं। एप्लिकेशन उपयोगकतार्ओं को अधिसूचना मिलती है।

यहां से जानकारी प्राप्त करें किसान

ल्ल निदेशक, केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान, सीमैप, कुकरैल, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) -226015, फोन 0522-2359623।
ल्ल सरकारी स्कीमों में छूट, सहूलियत व माली इमदाद आदि के लिए यहां करें संपर्क ल्ल मुख्य कार्यकारी, राष्ट्रीय औषध पौधा बोर्ड, आयुष भवन, तीसरा तल, बी ब्लाक, जीपीओ कांप्लैक्स, आईएनए, नई दिल्ली-110023। फोन : 011-2465182

कुछ बड़े खरीदारों के पते

– मै. डाबर इंडिया लि।, 8/3 आसफअली रोड, नई दिल्ली
– मै. पतंजलि फार्मेसी, हरिद्वार, उत्तराखंड।
– मै. मेहता फार्मास्यूटिकल, छेहरता, जीटी रोड, अमृतसर, पंजाब।
– मै. बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन, प्रा. लि. लोदीनगर, पटना (बिहार)।

 

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