लेख

चीनी वस्तुओं का बाजार पर कब्जा

त्यौहार का मौसम है। अब चारों तरफ चीन के बने सामानों से बाजार अटा पड़ा है। पिछले दिनों चीन के बने सामान और उसकी नीतियों को कोसने वाले अपील कर रहे हैं कि चीन के उत्पादनों का बहिष्कार करें। लोगों को शपथ दिलायी जा रही है कि चीन के किसी उत्पादन को कभी हाथ नहीं लगाएंगें। अब जरा घर की ओर देखिए, जिस टीवी पर रोज खबरें देते हैं, उसका सेटटॉप बॉक्स चीन में बना है। जो मोबाइल फोन और लैपटॉप वह प्रयोग करते हैं, उसकी असेंबलिंग भी चीन में ही हुई है। जिस कंपनी के शानदार जूते वह पहनते हैं, वह कंपनी भी चीन की ही है। रसोई से लेकर ड्राइंरूम तक में चीन की वस्तुएं भरी पड़ी है, जो आज उनकी दिनचर्या का अंग बन गई है। चीन के उत्पादनों के बहिष्कार की शपथ लेने से कुछ नहीं होगा, बल्कि सरकार को उन नीतियों को पलटना होगा, जिनकी वजह से सैरेमिक टाइल्स से लेकर, कटलरी तक धड़ल्ले से भारत आ रही है। चीन ने भारत की मुक्त अर्थव्यवस्था वाली नीति की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि आज देश का बड़े से बड़ा औद्योगिक घराना चीन से टक्कर लेने से डरता है। चीन की वस्तुएं भारतीयों के जनमानस पर छाई हुई हैं। आज बाजार के हालात यह है कि रिटेल सेक्टर से लेकर ऊर्जा तक और वस्त्र उद्योग से लेकर आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री तक चीन के उत्पादन कब्जा किए हुए है। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी होगा कि भारत के उद्योगपति ने छत्तीसगढ़ में पॉवर ΄लांट लगाने का काम शुरू किया। ΄लांट लगाने के लिए उन्हें जिस इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत थी, वह भारतीय बाजार में 10 करोड़ से ऊपर की लागत का था। अपने किसी परिचित के जरिए उन्होंने चीन से संपर्क साधा और जो सामान उन्हें भारत में दस करोड़ रुपए में मिल रहा था वह चीन से 4 करोड़ रुपए में मिल गया। दरअसल, चीन ने भारतीय जनमानस के दिमाग पर सस्ती चीजों को इस तरह चस्पा कर दिया, जो आज लोगों के सिर चढ़ कर बोल रही है। चीन भारत के रिटेल बाजारों में इतनी तेजी से घुसा है कि रिलायंस के स्टोर से लेकर बिग बाजार तक की चेन में चीन के बेशुमार उत्पाद भरे पड़े हैं। एक बड़ी सधी हुई रणनीति के सहारे चीन ने पहले भारत की आर्थिक, औद्योगिक, सामाजिक और बाजार नीति का गहन विश्लेषण किया। जिसके बाद भारत में अगर होली हुई तो पिचकारी से लेकर गुलाल तक दीवाली हुई तो लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा से लेकर आतिशबाजी तक,रक्षा बंधन हुआ तो राखियों और मकर संक्रांति हुई तो पतंग और मांझे से भारत के बाजारों को पाट डाला। हाल ही में एक ताजा सर्वेक्षण में पता चला है कि हर छठे भारतीय ने चीन के उत्पादनों को खरीदा है। चीन भारत को कोई सस्ते उत्पादन नहीं दे रहा, बल्कि गरीब अफ्रीकी देशों के लिए वह जो उत्पादन बनाता है, उन्हें ही भारत भी भेजता है। अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देशों ने चीन के उत्पादनों के लिए अपने बाजार के दरबाजे बंद कर रखे हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि यूरोपीय देशों से फेल हुई चीन के उत्पादनों की खेप भारत के बाजार में हाथों हाथ बिक गई। चीन ने यूरोपीय देशों पर व्यापारिक कब्जा करने की गरज से अपनी एक मह्त्वाकांक्षी परियोजना का खुलासा किया है। चीन की योजना है कि वह एक बड़ी रेल लाइन तजाकिस्तान के रास्ते ईरान से ईराक को जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है। यानी मध्यपूर्व के देशों के साथ चीन का व्यापार सीधा जुड़ जाएगा। अभी तक समुद्र के रास्ते चीन का माल यूरोपीय देशों में दो महीनों में पहुंचता था, इस रेल परियोजना के बाद दस दिनों में पहुंच जाएगा। एशिया की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के बाजार को चीन से सबसे ज्यादा खतरा है। विगत 15 वर्षों से में चीन ने भारतीय ग्राहकों की मानसिकता को बदल डाला। देशभर की सड़कों पर चीन के जूते च΄पलों से लेकर लैपटॉप, आईपॉड मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक डायरियां बिकती चली जा रही हैं। चीन के बने सामानों की गारंटी नहीं होती। बेशक वह सस्ते होते हैं, लेकिन खराब हो जाने के बाद वह किसी काम के नहीं रहते।
चीन के उत्पादनों से भारत में ईकचरा काफी बढ़ता जा रहा है। यदि देश के ग्रामीण बाजार और कुटीर उद्योगों को बचाना है, तो चीन के उत्पादनों को भारत में प्रतिबंधित कर देना चाहिए, जैसा अमेरिका आदि देशों ने कर रखा है। दरअसल, चीन में दुनिया के सबसे ज्यादा श्रमिक जो लगभग तीस करोड़ हैं। साथ ही वहां की औद्योगिक नीतियां भारत की तरह ΄ोचीदा नहीं है। चीन के कारखानों से सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है और ऊर्जा का भी सबसे ज्यादा खर्चा होता है। साम्यवादी देशों का अगुवा बना चीन आज दुनियाभर के उन देशों की चिंता का विषय हुआ है जहां चीन के उत्पादनों ने घरेलू बाजार को चौपट कर रखा है। भारत में ब़ड़े शॉपिंग माल की बात छोड़िए, गांव-कस्बों की छोटी-छोटी दुकानों पर चीन का सामान सजा मिलेगा। भारत में चीन के उत्पादनों को लेकर एक चुटकुला भी काफी प्रचलित हो रहा है। यदि आपके घर चीन का बना सामान है, तो चोर भी उसे नहीं चुराते। खैर, यह तो महज चुटकुला है, लेकिन चीन के इस आर्थिक हमले को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

वीएस धर्मकुमार

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