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स्कूली बस्ते के बोझ तले सिसकता बचपन

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प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. यशपाल कहा करते थे कि ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है। उनकी अध्यक्षता में बनी समिति ने शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी, वो मानते थे बच्चे पढ़ें तो खेल की तरह, वे किताबों से मिलें तो खिलौनों की तरह, देश-दुनिया का ज्ञान उन्हें लुका-छिपी से भी आसान लगे तथा परीक्षाएं उन्हें दोस्तों के गप्प-ठहाकों से भी सहज लगें । हैरान करने वाली बात है कि उनके नेतृत्व वाली समिति ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम के बोझ में कम करने के लिए जो सिफारिशें की थी, उनको दो दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।

देर से ही सही अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय छात्रों के स्कूली बस्तों का बोझ कम करने के इरादे से 2019 के सत्र से एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम आधा करने पर विचार कर रहा है,जो स्वागत योग्य है। लेकिन राज्य सरकारों और राज्य शिक्षा बोर्डो को भी इस पहल का सहभागी बनाने की सख्त दरकार है क्योंकि बस्ते का बोझ बच्चो की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।

एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार, बस्ते के बढ़ते बोझ के कारण बच्चों को नन्हीं उम्र में ही पीठ दर्द जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका हड्डियों और शरीर के विकास पर भी विपरीत असर होने का अंदेशा जाहिर किया गया है।

इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल जानेवाले करीब 68 प्रतिशत बच्चे, जिसमें विशेष तौर पर देखा जाए तो 7 से 13 वर्ष के करीब 88 फीसदी बच्चे पीठ दर्द या उससे जुड़ी समस्या का शिकार हो रहे हैं। इसका प्रमुख कारण किताबों की बोझ, स्पोर्ट किट और उनके बैग हैं, जो बच्चों के वजन से करीब 40 से 45 फीसदी तक ज्यादा होता है।

यह सर्वे अहमदाबाद, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलूरु, मुंबई, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, जयपुर और देहरादून में किया गया, जिसमें 25,00 छात्रों और 1,000 अभिभावकों से बातचीत की गई थी। अधिकतर अभिभावकों की शिकायतें थी कि आठ पीरियड के लिए बच्चे हर रोज करीब 20 से 22 किताबें स्कूल ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्कैट्स, ताइक्वांडो के साधन, स्विङ्क्षमग बैग और क्रिकेट किट भी कभी-कभार बच्चों को ले जाना पड़ता है ।

हड्डी रोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के लगातार बस्तों के बोझ को सहन करने से उनकी कमर की हड्डी टेढ़ी होने की आशंका रहती है। अगर बच्चे के स्कूल बैग का वजन बच्चे के वजन से 10 प्रतिशत से अधिक होता है तो काइफोसिस होने की आशंका बढ़ जाती है। इससे सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है। भारी बैग के कंधे पर टांगने वाली पट्टी अगर पतली है तो कंधों की नसों पर असर पड़ता है। कंधे धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते हैं और उनमें हर समय दर्द बना रहता है। हड्डी के जोड़ पर असर पड़ता है।

लेकिन जब से प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक मिला है,तभी से निजी स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते ही जा रहे हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि सरकारी स्कूल वालों के बस्ते निजी स्कूल वालों के बस्तों से काफी हल्के हैं।तथा सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा, गणित के अलावा एक या दो पुस्तकें हैं। लेकिन निजी स्कूलों के बस्तों का भार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे ज्ञानवृद्धि का कोई कारण नहीं है, बल्कि व्यापारिक रुचि ही प्रमुख है।

आज स्थिति यह है कि देश भर में लाखों बच्चों को भारी बस्ता ढोना पड़ रहा है। इनमें तमाम वे नामी-गिरामी स्कूल भी हैं जो कथित तौर पर पठन-पाठन के आधुनिक तरीके अपनाए हुए हैं। मोहल्ला ब्रांड अंग्रेजी स्कूलों के लिए तो भारी बस्ते शुभ लाभ कर रहे हैं। लेकिन बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर गैर-जरूरी दबाव बढ़ रहा है।

तथा माता-पिता भी होमवर्क की चक्की में पिस रहे हैं। बच्चे की समझ में न आने पर उसे ट्यूशन के हवाले कर दिया जा रहा है और अपनी प्रारंभिक उम्र से ही बच्चा रटी-रटाई शिक्षा लेने पर मजबूर हो रहा है। जिससे उसकी मानसिक चेतना कहीं दब कर रह जाती है,तथा बच्चे का सर्वांगीण विकास भी बाधित होता है । ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता बच्चों का स्वास्थ्य होना चाहिए,इसके लिए सरकार को निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अब आगे आना होगा।

-कैलाश बिश्नोई

 

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