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साइबर अपराध रोकने की चुनौती

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देश में डिजिटल लेन-देन और कैशलेश अर्थव्यवस्था को गति दिए जाने के तहत भारतीय बैंकों ने भले ही अपनी सेवाओं को काफी हद तक आॅनलाइन कर दिया है और ऐप के जरिए सेवाएं देने लगे हैं, लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि बैंकों की सेवाओं को लेकर देश के लोग संतुष्ट नहीं हैं। उसका एक प्रमुख कारण साइबर अपराध में लगातार हो रही वृद्धि है।

हाल ही में अमेरिकी कंपनी एफआईएस ने वैश्विक स्तर पर कुछ ऐसा ही खुलासा किया है। उसने अपने तीसरे वार्षिक परफार्मेंस अगेंस्ट कस्टमर एक्सपेक्टेशन सर्वेक्षण में पाया है कि देश के लोग विशेषकर 18 से 36 वर्ष के आयु वर्ग के युवा उपभोक्ता अपनी सुविधानुसार किसी भी समय कहीं से भी जुड़े रहना चाहते हैं और बैंक शाखा तक जाना पसंद नहीं करते।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि दुनिया के अन्य बैंकों की तरह भारतीय बैंक भी अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहे हैं। बैंकों की जो सबसे बड़ी समस्या साइबर अपराध रोकने की है, उसमें वह बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। अभी पिछले ही दिनों सरकार के आंकड़ों से उद्घाटित हुआ कि पिछले तीन वित्त वर्ष में बैंकों से जुड़े साइबर अपराध के 43,204 मामले सामने आए हैं, जिसमें अपराधियों ने 232.32 करोड़ रुपए का चूना लगाया है।

एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर साइबर अपराध पर नियंत्रण नहीं कसा गया, तो साइबर हमलावर न्यूक्लियर प्लांट, रेलवे, ट्रांसपोर्टेशन और अस्पतालों जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर कंट्रोल कर सकते हैं, जिसके नतीजे में पावर फेलियर, वाटर पॉल्युशन, बाढ़ जैसी गंभीर समस्या उत्पन हो सकती है।

साइबर अपराध के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे नंबर पर है। आज भारत की बड़ी आबादी डिजिटल जिंदगी जी रही है। अधिकांश लोग बैंक खाते से लेकर निजी गोपनीय जानकारी तक कंप्यूटर और मोबाइल फोन में रखने लगे हैं। इंटरनेट उपयोग करने के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर जितनी तेजी से निर्भरता बढ़ी है, उतना ही तेजी से खतरे भी बढ़े हैं। यहीं वजह है कि हैकिंग की वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं।

भारत की ही बात करें, तो यहां ऐसी अनेक देशी-विदेशी कंपनियां हैं, जो इंटरनेट आधारित कारोबार एवं सेवाएं प्रदान कर रही हैं। उचित होगा कि भारत सरकार ऐसी कंपनियों पर निगरानी रखने के लिए एक ऐसी निगरानी तंत्र को विकसित करे, जो इन कंपनियों के कार्यप्रणाली पर कड़ी नजर रखे।

उचित यह भी होगा कि जिन कंपनियों की कार्यप्रणाली संदिग्ध नजर आए उन पर शीध्र शिकंजा कस कानूनी कार्रवाई की जाए। ऐसे कंपनियों का लाइसेंस निरस्त किया जाए जो साइबर सुरक्षा से संबंधित नियमों का पालन करने में कोताही बरतती हैं।

इसके अलावा देश में अनेक ऐसी विदेशी कंपनियां सेवाएं दे रही हैं जिनका सर्वर अपने देश में नहीं है। ऐसी कंपनियों को निगरानी की जद में रखना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा नहीं है कि भारत में साइबर अपराध रोकने के लिए कानून नहीं है। भारत में साइबर अपराध को तीन मुख्य अधिनियमों के अंतरर्गत रखा गया है। ये अधिनियम हैं-सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय दंड संहिता और राज्य स्तरीय कानून।

सच कहें तो साइबर अपराध के बदलते तरीकों और घटनाओं ने भीषण समस्या का रुप ग्रहण कर लिया है। जुर्म की दुनिया में अपराधी हमेशा कानून को गुमराह करने के लिए नए-नए तरीके ईजाद कर लेते हैं। देखा भी जा रहा है कि साइबर अपराधी आए दिन देश में साइबर तकनीक के जरिए जहरीला माहौल निर्मित करने का काम कर रहे हैं और सरकार चाहकर भी उस पर रोक लगाने में विफल है।

यहां ध्यान देना होगा कि साइबर अपराध के खेल में अमेरिका, रुस, चीन, ब्रिटेन, जापान बड़े खिलाड़ी है। अमेरिका की साइबर सेंधमारी की कारस्तानी का विकलीक्स द्वारा खुलासा किया जा चुका है। हैकिंग के जरिए रक्षा-सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी हासिल करने का मामला दुनिया में अनगिनत बार उजागर हो चुका है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में अभी भी साइबर अपराध गैर जमानती नहीं है। साथ ही इसके लिए अधिकतम सजा तीन साल है। उचित होगा कि सरकार साइबर अपराध से जुड़े कानूनों में फेरबदल कर इसे कठोर बनाए तथा सजा की दर बढ़ाए।

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