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अफगानिस्तान में बम: अमेरिका और रुस में बढ़ी तनातनी

America and Russia

तारीक अता और देवांशु गौर

America and Russia अमेरीका ने अफगानिस्तान में अपना सबसे बड़ा गैर परमाणु बम गिराया है, लेकिन इसके लिए अमरीका ने यही समय क्यों चुना है? कई सालों से युद्ध की मार झेल रहे अफगानिस्तान में शांति लाने के मकसद से रूस ने कई देशों के एक सम्मेलन का आयोजन किया है और इससे ठीक पहले अमरीका ने अफगानिस्तान के नांगरहार में बम गिराया।

अमेरिका में संशय बरकरार

यह वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच बड़ी राजनीतिक होड़ का संकेत है। चीन, पाकिस्तान, ईरान, भारत और पांच मध्य एशियाई देशों समेत कई देश मॉस्को में सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन अमरीका इस सम्मेलन में हिस्सा लेने से इनकार कर चुका है। इससे कहीं न कहीं यह साफ होता है कि अफानिस्तान से अमरीकी सेना की वापसी के बाद रूस की बढ़ी भूमिका को लेकर अमरीका में संशय बना हुआ है।

America and Russia गठबंधन को कमजोर करने का प्रयास

वॉइस आॅफ अमरीका का कहना है, ‘अमरीका के सैन्य अधिकारियों को शक है कि रूस की तरफ से अफगानिस्तान के लिए तथाकथित शांति प्रक्रिया के प्रयास का लक्ष्य नैटो गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश करना है। अमरीका ने रूस पर तालिबान को हथियार देने का भी आरोप लगाया है।’

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक रूस पूर्वी अफगानिस्तान में तथाकथित इस्लामिक स्टेट के उदय को रोकने के लिए तालिबान की तरफ हाथ बढ़ा रहा है, क्योंकि रूस को डर है कि मध्य एशिया से होते हुए इस्लामिक चरमपंथी हिंसा कहीं रूस तक न पहुंच जाए।

मॉस्को ने इन आरोपों से इनकार किया

रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस के राष्टÑपति व्लादिमीर पुतिन और विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने अफगानिस्तान की सरकार से तालिबान से बातचीत की अपील की है। इसके अलावा ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि मॉस्को में रूस, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच मुलाकातें भी हुई हैं। कथित तौर पर रूस पर तालिबान को फंड मुहैया कराने के आरोप भी लगे हैं लेकिन मॉस्को ने इन आरोपों से इनकार किया है। और ये सब तालिबान की कमर तोड़ने के लिए अमरीका की कोशिशों को कमजोर करने जैसा है।

America and Russia अमेरिका की कार्रवाई उचित

अमरीका कथित तौर पर तालिबान पर इसलिए वार कर रहा है ताकि शांति प्रक्रिया में रुस का पक्ष कमजोर किया जा सके। इस लिहाज से अफगानिस्तान में अमरीका की बमबारी अहम हो जाती है क्योंकि यह रूस के तालिबान का समर्थन करने के कथित कारण पर ही वार है।

अफगानिस्तान के निजी चैनल अरियाना न्यूज के मुताबिक, ‘अमेरिका द्वारा बम गिराना अफगानिस्तान में आईएस के खिलाफ पहला कदम है और इससे पता चलता है कि अफगानिस्तान की लड़ाई में अमरीका फिर से सक्रिय हो गया है।’

रूस की बहुपक्षीय कूटनीति

अफगानिस्तान के एक विश्लेषक हाशेम वाहदात्यार ने कहा, ‘इससे आईएस को बड़ा झटका लगा है और इससे सभी चरमपंथियों को संदेश गया है कि उनके खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है।’ तालिबान को शांति प्रक्रिया में शामिल करने के लिए अमरीका की कोशिशें नाकाम होने के बाद अफगानिस्तान को लेकर रूस की बहुपक्षीय कूटनीति में तेजी आई है।

America and Russia पहले भी नाकाम रहा अमेरिका

2016 में, अमरीका के पूर्व राष्टÑपति बराक ओबामा के प्रशासन ने तालिबान को शांति प्रक्रिया में शामिल करने हेतु राजी करने के लिए अमरीका, अफगानिस्तान, चीन और पाकिस्तान वाले समन्वय समूह बनाया था। इससे ख़ास तौर पर रूस, ईरान और अन्य क्षेत्रीय देशों को बाहर रखा गया था। लेकिन काफी कोशिशों के बावजूद अमरीका इसमें नाकाम रहा था।

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