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पिछड़े वर्ग: नए आयोग के गठन से उनके विकास की आशा

New commission

धुर्जति मुखर्जी

दलितों, आदिवासियों और अन्य निचली जातियों के शोषण और दमन के प्रति उदासीनता का मुद्दा देश में गरमा रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास बताता है कि निचले वर्ग तथा जातियां हमेशा कष्टों में रही हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नव उदारवाद का परिणाम है और एक प्रवृति देखने को मिली है जिसमें धनी और मध्यम आय वर्ग अपने हितों की रक्षा कर रहे हैं।

New commission दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार

साथ ही शहरी क्षेत्रों पर बल दिया जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा के कारण वहां स्थिति और बिगड़ी है। दलितों पर अत्याचारों के मामले पहले भी और आज भी आर्थिक मुद्दों जैसे भूमि, मजदूरी, पानी, आवास से जुड़े रहे तथा अस्पृश्यता भी अत्याचारों का एक कारण रहा है। किंतु दलितों के प्रतिरोध के कारण इसे एक नया आयाम मिला है। जिसके कारण समस्याएं बढ़ी हैं। संपूर्ण देश में विशेषकर उत्तरी राज्यों में भेदभाव बढ़ता जा रहा है।

लोहिया के जन्मदिन पर की घोषणा

इस तथ्य को ध्यान मे रखते हुए केन्द्र ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दी है और इस आयोग को अनुसूचति जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के समान संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा। इसकी घोषणा राममनोहर लोहिया के जन्म दिन पर की गयी।

लोहिया पिछडे वर्गों के मसीहा के रूप में जाने जाते हैं और सरकार द्वारा इस अवसर पर ऐसी घोषणा करने से स्पष्ट होता है कि वह पिछड़े वर्गों के प्रति चिंतित है। सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग के नाम से इस प्रस्तावित आयोग का गठन संविधान संशोधन के माध्यम से किया जाएगा।

New commission राष्ट्रीय आयोग गठित होगा

लोक सभा मे इस सप्ताह इस संबंध में विधयेक पारित कर दिया गया है और इसे राज्य सभा में पारित होने के लिए भेजा गया किंतु राज्य सभा ने इसे प्रवर समिति को भेजा है। इस विधेयक के पारित होने के बाद सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछडे वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन होगा जो राष्ट्रीय पिछडे वर्ग का स्थान लेगा तथा इस आयोग को इन वर्गों की शिकायतों के निवारण सहित समस्याओं के प्रभावी समाधान की शक्तियां प्राप्त होंगी।

परंपरागत जातीय व्यवस्था को चुनौती

आयोग के समक्ष अनेक समस्याएं होंगी किंतु सबसे महत्वपूर्ण समस्या जाटों द्वारा अन्य पिछडे वर्ग का दर्जा मांगने के संबंध में निर्णय लेने की है। आयोग के प्रयास इन वर्गों की दशा में सुधार करना होना चाहिए किंतु देश में व्याप्त वर्तमान स्थितियों में यह बहुत ही जटिल कार्य है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाबा साहेब अंबेडकर के बाद समाज के दलित और वंचित वर्ग अपने राजनीतिक अधिकारों को जताने लगे और परंपरागत जातीय व्यवस्था को चुनौती देने लगे।

क्रांति के रूप में छेड़ा संघर्ष New commission

दलितों द्वारा अपने अधिकारों की मांग तथा सामाजिक, आर्थिक विकास के कारण दलितों में एक नए राजनीतिक वर्ग का उदय हुआ। इस वर्ग ने राजनीतिक जागरूकता पैदा की और उनमें से कुछ लोगों ने सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए संघर्ष छेड़ा। दलित आंदोलन एक सच्ची लोकतांत्रिक क्रांति के रूप में उभरा है।

New commission समुदायों का मनोबल बढ़ेगा

हालांकि राज्य वंचित समुदायों को नागरिक अधिकार उपलब्ध कराने में विफल रहा है। इसलिए सरकार को यह साबित करना होगा कि वह न केवल उच्च जातियो की मांगों को पूरा कर रही है अपितु समाज के सभी वर्गों का ध्यान रख रही है। देश के विभिन्न भागों में विभिन्न घटनाओं को ध्यान में रखते हुए आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह इन समुदायों का मनोबल बढ़ाएगा। अत: इन वर्गों को न्याय तथा राजनीतिक और सामाजिक अधिकार उपलब्ध कराए जाने आवश्यक हैं।

आयोग से बंधी उम्मीदें

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समानता और सामुदायिक दृष्टिकोण के हिमायती थे किंतु बाद में विभिन्न सरकारों ने इस पर ध्यान नहंी दिया। इस संबंध में अंबेडकर की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है: ‘‘जातियां राष्ट्र विरोधी हैं। ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं।

ये इसलिए भी राष्ट्र विरोधी हैं क्योंकि इनके चलते विभिन्न जातियों के बीच ईर्ष्या और वैमनस्य बढ़ता है किंतु यदि हम एक राष्टÑ के रूप में वास्तविकता बनना चाहते हैं तो हमें इन कठिनाइयों को दूर करना होगा।’’

राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और नेताओं द्वारा बांटो और राज करो की नीति अपनाने के कारण यह वास्तविकता अभी जमीन पर नहीं उतरी है। आशा की जाती है कि आगामी माहों में इस आयोग के गठन से स्थिति में बदलाव आएगा।

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