सम्पादकीय

एक और गोरा ठग, जिसे भारतीयों ने जाने दिया

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जितना बड़ा गायक, उतना ही बड़ा ठग निकला जस्टिन बीबर। 10 मई को मुंबई के वाईवी पाटिल स्टेडियम में कनाडा का ये नामी गायक आया था। जस्टिन ने बहुत जल्द गीत-संगीत की दुनिया में अपनी धाक जमाई है। 23 वर्षीय इस गायक का जब भारत में कन्सर्ट रखा गया, तब से भारत में पश्चिमी संगीत के रसिया,

खासकर जस्टिन बीबर के फैन्स में उनके इस शो के टिकट पाने की होड़ मच गई। भारतीयों ने महीनों शो का इंतजार किया और चार हजार रुपए से 76 हजार रुपए खर्च कर अपने लिए टिकटों का जुगाड़ किया। लेकिन जैसा कि अंग्रेजों की फितरत है, अपनी चमक-धमक दिखाकर ठग लेना। ठगी का वही फार्मूला एक बार फिर से कामयाब रहा।

अपना भारी भरकम लवाजमा दिखाकर होटल को अपने प्राइवेट बंगले में बदलाकर, खाने-सोने के न जाने क्या-क्या नखरे किए कि भारतीय आयोजकों ने सौ करोड़ रुपए खर्च कर डाले। भारतीय संगीत प्रेमियों को बीबर से देखने को मिला, तो बस लिप सिंकिंग। यानि बीबर अपने गानों के रिकॉर्ड पर अपने होंठ हिलाकर चलता बना। कला के नाम पर यह विशुद्ध धोखा है।

सबसे हैरत की बात कि इस धोखेबाज गायक को भारतीयों ने ठगी कर जाने दिया। यह नहीं होना चाहिए था। वहां मौजूद सुरक्षा बलों को तुरंत स्वत: संज्ञान लेकर इस गायक को एक बारगी रोकना चाहिए था। या तो बीबर भारतीय दर्शकों की खर्च की गई राशि, आयोजकों द्वारा खर्च राशि को लौटाता या फिर वह रूककर एक बढ़िया कार्यक्रम पेश करता,

जिसके लिए कि आयोजकों ने या दर्शकों ने उसके साथ करार किया था और टिकट खरीदे थे। भारतीय जनमानस, नेता, प्रशासन न जाने कब अक्ल लेंगे। आखिर कब तक भारतीय गोरी चमड़ी के आकर्षण में यूं ही अपने-आपको ठगवाते रहेंगे? जो पैसा बीबर ले गया, वह किसका था? साफ जाहिर है कि वह भारतीयों के खून-पसीने की कमाई थी।

जस्टिन बीबर तो निकल गया, क्या भारत का फिल्म एवं संगीत जगत उससे कोई सबक लेगा? अरब देशों के शाह यदि ऐसा आयोजन करते हैं, तब किसी की मजाल नहीं कि उन्हें बेवकूफ बनाकर कोई चलता बने। बल्कि वहां तो दंड स्वरूप पैसा भी वापिस ले लेंवे और गवाएं भी। कितने ही मामले हैं, जो भारतीय इतिहास में दर्ज हैं कि अंग्रेजों ने कैसे-कैसे भारतीयों को ठगा।

अभी भी आए दिन बहुत सी विदेशी कंपनियां विभिन्न प्रॉडक्ट व सेवाओं के नाम पर देश में अपना ठगी तंत्र चला रही है, जिन्हें आए दिन मीडिया, सेंटर फॉर सार्इंस जैसे गैर-सरकारी संगठन व स्वदेशी कंपनियां बेनकाब करती रहती हैं। अब वक्त आ गया है कि भारतीय अपने-आपको बौद्धिक तौर पर भी पश्चिम के समक्ष स्थापित करें।

चूंकि हर क्षेत्र में भारत ने अच्छी प्रगति कर ली है, लेकिन बौद्धिक क्षेत्र अभी भी ऐसा क्षेत्र बना हुआ है, जहां भारतीय विश्वास की नीति अपनाए हुए हैं। यदि धोखा होता है, तब उस पर उदासीन बने रहते हैं। इसके चलते पश्चिम जगत के व्यापार, शिक्षा-विज्ञान, कला-साहित्य, विभिन्न क्षेत्रों के लोग भारतीयों का बार-बार शोषण करते रहते हैं। भारतीयों को अपनी बौद्धिकता पहचाननी होगी और विश्व के साथ जैसे को तैसा नीति पर चलना होगा।

 

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