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आखिर पुरुषों की ही नजरअंदाजी क्यों ?

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हम अक्सर महिलाओं के हक की बातें करते हैं और करनी भी चाहिए, क्योंकि लंबे समय से उनका कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में शोषण होता रहा है। लेकिन इन सबके बीच हम पुरुषों के हक या उनसे जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों को नजरअंदाज कर देते हैं। पुरुष भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, उनसे जुड़े भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर हमें चर्चा भी करनी चाहिए और अपनी विचारधारा को बदलना भी चाहिए। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर किस तरह से पुरुषों को अपने पुरुष होने की कीमत अदा करनी पड़ती है।

हमारे जेहन में एक पुरुष की तस्वीर यही होती है कि वो सुपरमैन टाईप का स्ट्रॉन्ग होता है। उसे न तो शारीरिक चोट लगने पर और न ही भावनात्मक रूप से आहत होने पर दर्द का एहसास होता है जबकि सच्चाई तो यही है कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, दर्द सभी को होता है। स्ट्रॉन्ग होने का यह कतई अर्थ नहीं कि सामने वाले को कभी कोई तकलीफ होती ही नहीं। पुरुष भी इंसान हैं और उनमें भी इंसानी भावनाएं हैं, दर्द हैं, दु:ख हैं, खुशियां हैं। हमें इस सोच से उबरना होगा कि पुरुषों को दर्द नहीं होता।
रोना तो लड़कियों का काम है

हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा है कि हम पुरुषों को इस रूप में स्वीकार ही नहीं कर पाते। बचपन से ही उन्हें यह सिखाया जाता है कि रोना-धोना लड़कियों व कमजोरों का काम है, तुम लड़के हो, मजबूत बनो। ऐसे में बचपन से ही लड़कों की मानसिकता यही बनती जाती है कि अगर मैं किसी के सामने रोया, तो मुझे कमजोर समझा जाएगा। मेरा मजाक बनाया जाएगा। यही वजह है कि अधिकतर पुरुष अपने दु:ख, अपनी तकलीफें शेयर नहीं करते। वो अपने दर्द मन में ही दबाकर रखते हैं, जिस वजह से उन्हें हृदय संबंधी बीमारियों का भी खतरा अधिक होता है। भावुक होना कमजोर पुरुषत्व को दर्शाता है

भावुकता या अधिक संवेदनशीलता स्त्रियों के गुण हैं, पुरुषों में यदि ये बातें आ जाएं, तो इन्हें अवगुण माना जाता है। चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां हों, पुरुष न तो भावनाओं में बहने का हक रखते हैं और न ही अधिक संवेदनशीलता उनके लिए है। यदि हम खुद भी इस तरह के संवेदनशील पुरुषों के संपर्क में आते हैं, तो हमें यही लगता है कि कैसा लड़का है, जो इतना इमोशनल या सेंसिटिव है।

जबकि सच तो यह है कि पुरुष भी बेहद भावुक व संवेदनशील होते हैं, लेकिन वो अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमारा समाज, हमारी पारिवारिक परवरिश उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। ये तमाम दबी भावनाएं उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से भीतर ही भीतर कमजोर बनाने लगती हैं और हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या फिर हार्ट डिसीज की गिरफ़्त में आने की आशंकाओं को बढ़ाती हैं।

एक-दूसरे की रक्षा की जिम्मेवारी समझें

हर स्त्री व पुरुष की शारीरिक क्षमता अलग होती है, यह जरूरी नहीं कि हर पुरुष किसी फिल्मी हीरो की तरह मजबूत कद-काठी का हो। पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती है कि वो जल्दी नहीं थक सकते, उन्हें अपने परिवार का रक्षा कवच बनना होता है, तो जाहिर है उनमें लड़ने की क्षमता होनी चाहिए। एक ओर तो हम स्त्री-पुरुष की बराबरी की बात करते हैं और दूसरी तरफ उन्हें अपना व अपने परिवार का रक्षा कवच बना देते हैं। परिवार में सभी सदस्यों की जिम्मेदारी बनती है कि वो एक-दूसरे की रक्षा भी करें और मुसीबत के व़क्त एक-दूसरे का संबल व सहारा भी बनें। इसमें स्त्री-पुरुष की बात ही नहीं आती।

पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती है कि वो जल्दी नहीं थक सकते, उन्हें अपने परिवार का रक्षा कवच बनना होता है, तो जाहिर है उनमें लड़ने की क्षमता होनी चाहिए।
पुरुष भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, उनसे जुड़े भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर हमें चर्चा भी करनी चाहिए और अपनी विचारधारा को बदलना भी चाहिए। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर किस तरह से पुरुषों को अपने पुरुष होने की कीमत अदा करनी पड़ती है।
हमारे जेहन में एक पुरुष की तस्वीर यही होती है कि वो सुपरमैन टाईप का स्ट्रॉन्ग होता है। उसे न तो शारीरिक चोट लगने पर और न ही भावनात्मक रूप से आहत होने पर दर्द का एहसास होता है जबकि सच्चाई तो यही है कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, दर्द सभी को होता है।

रिश्तों में दरार आए तो दोषारोपण पुरुषों पर

अगर कहीं कोई रिश्ता टूटता है, तो हम आंख बंद करके पुरुषों पर दोषारोपण कर देते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि महिलाएं तो रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाती हैं और पुरुष अक्सर बेईमानी करते हैं। लेकिन हर मामले में परिस्थितियां अलग होती हैं। कई बार स्त्रियां भी जिम्मेदार होती हैं और उनकी गलतियों की वजह से भी रिश्ते व परिवार टूटते हैं। लेकिन अगर कोई स्त्री रो-धोकर अपने ससुराल व पति पर आरोप लगा दे,

तो उसे समाज के साथ-साथ प्रशासन की भी हमदर्दी मिल जाती है और हम सब आंख मूंदकर पुरुष को ही दोषी करार देते हैं। बेहतर होगा कि हम निष्पक्ष होकर हर मुद्दे को देखें और समझें। पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर अपनी राय कायम न करें। सभी पक्षों को देख व परखकर ही अपनी कोई राय बनाएं। ‘पुरुष ही दोषी होगा’ इस मानसिकता के साथ किसी भी मुद्दे को समझने का प्रयास न करें।

घर से बाहर के काम

बाहर का काम (फायनेंस, जमीन-जायदाद संबंधी) तो सिर्फ पुरुष ही करते हैं। कामकाजी महिलाएं भी अक्सर फायनेंस व जमीन-जायदाद से जुड़े काम के लिए पुरुषों पर ही निर्भर होती हैं। जिस तरह यह मान लिया जाता है कि घर के काम की जिम्मेदारी तो सिर्फ महिलाओं की ही होती है, उसी तरह यह भी मान लिया जाता है कि बाहर के काम पुरुषों को ही करने चाहिए। चाहे बैंक का काम हो या फिर इंश्योरेंस संबंधी कार्य, पुरुषों ने यदि नहीं किए, तो वो गैरजिम्मेदार माने जाएंगे।

जबकि होना यही चाहिए कि सारे काम आपस में मिल-बांटकर करने चाहिए। चाहे घर के काम हों या बाहर के सबकी जिम्मेदारियां बिना लिंग भेद के तय करनी जरूरी है। कई बार स्त्रियां भी जिम्मेदार होती हैं और उनकी गलतियों की वजह से भी रिश्ते व परिवार टूटते हैं। लेकिन अगर कोई स्त्री रो-धोकर अपने ससुराल व पति पर आरोप लगा दे, तो उसे समाज के साथ-साथ प्रशासन की भी हमदर्दी मिल जाती है ।

पुरुष यदि घर का काम करे तो

यदि पुरुष घर के कामों में मदद करते हैं, तो उन्हें पत्नी का गुुलाम या फिर पत्नी से दबकर-डरकर रहनेवाला माना जाता है। उन्हें इस बात के लिए बार-बार टोका जाता है, यह आभास दिलाया जाता है कि ये काम तुम्हारे हैं ही नहीं। तुम तो मर्द हो, पत्नी को तुमसे दबकर रहना चाहिए, तुम घर के काम में उसकी मदद करते हो, तो जरूर तुम में कोई कमी होगी या फिर तुम्हारी कोई कमजोरी तुम्हारी पत्नी के हाथ लग गई होगी, जिसका वो फायदा उठा रही है।

भले ही कोई पुरुष अपने घर के काम में अपनी मम्मी-बहन या पत्नी की मदद दिल से करना चाहता हो, लेकिन उसे यह महसूस करवाया जाता है कि वो स्त्रियोंवाले काम कर रहा है, जो उसके पुरुषत्व के खिलाफ है। बेहतर होगा कि हम अपनी मानसिकता बदलें। लिंग भेद से ऊपर उठकर हर काम को देखें, ताकि किसी को भी मात्र स्त्री या पुरुष होने का फायदा या नुकसान न हो।

-गीता शर्मा

 

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