सम्पादकीय

27 साल बाद ही सही, मुंबई बम हमलों का हुआ हिसाब

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1993 के मुंबई बम विस्फोट मामलों में आखिर कोर्ट ने फैसला सुना आतंकियों के आतंक का हिसाब चुकता कर दिया। देश की आर्थिक राजधानी में यह पहला बड़ा आतंकी हमला था, जिसमें यहां मरने वाले एवं घायल होने वाले सैकड़ों नागरिक थे, वहीं इन हमलों को अंजाम देने वाले भी सैकड़ों अपराधी मिले। पुलिस व जांच एजेंसियों ने अपनी लंबी व गहन छानबीन में पाया कि करीब 189 लोग थे, जिन्होंने यह हमला किया। मामला हालांकि 123 के विरूद्ध ही चल पाया, बाकी या तो भाग गए या मर गए।

अभी भी 27 ऐसे अपराधी हैं, जो कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। इनमें कुख्यात अपराधी दाऊद इब्राहिम भी मुख्य है। मुंबई बम विस्फोट के अधिकतर दोषियों को सजा सुना दी गई है, इनमें से एक याकूब मेनन को फांसी दी गई है। 27 वर्ष तक चलने वाले इस न्यायिक संघर्ष में जीत कानून की ही हुई है, भले ही इस पूरे प्रकरण में अभियुक्तों एवं सुबूतों को अदालत तक लाते-लाते जो वक्त लगा, वह बहुत ही ज्यादा व संघर्षपूर्ण रहा।

न्यायिक कार्रवाही में लंबा वक्त लगने की वजहें अनेका-नेक हैं, जिनकी कि भारत में रक्षा, कानून एवं समाज विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ लोग विगत वर्षों में अनेकों बार गिन भी चुके हैं। मुंबई बम विस्फोट के अभियुक्तों 189 में से 23 लोगों को न्यायलय ने बरी भी किया है, जो भारतीय न्यायपालिका की विश्वसनीयता को विश्व स्तर पर स्थापित करता है।

मुंबई बम विस्फोट कई कारणों से ज्यादा जटिल मामला इसलिए भी रहा कि इसमें सीधे-सीधे कुछ पाकिस्तानी भी शामिल रहे, भारत के लोग जिनका पहले ही पेशा अपराध करना था, ने और ज्यादा धन व दहशत बढ़ाने के लिए आतंकवाद की राह पकड़ ली। संजय दत्त जैसे फिल्मी व राजनीतिक परिवार के लोग, जिनके पिता कांग्रेस से सांसद भी थे, फिर मुंबई बम विस्फोट को 1992 में बाबरी-मस्जिद विध्वंस के लिए एक समुदाय की दूसरे समुदाय के विरूद्ध जवाबी कार्रवाई की तरह भी कुछ लोगों ने स्थापित करने की कोशिश की।

अत: ये मामला विदेश प्रयोजित आतंकवाद, स्थानीय अपराधी गिरोहों, फिल्मी दुनिया, राजनेताओं व अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक लोगों के घालमेल जैसा था। ऐसे में जांच अधिकारियों, वकीलों एवं न्यायालय की एक-एक मिनट की कार्रवाई को पूरा देश व विश्व देख रहा था कि आखिर भारतीय जनमानस एवं कानून किस तरह से इन सब बाधाओं को पार कर विशुद्ध रूप से न्याय हासिल करता है।

यही वजह रही कि इस पूरे मामले को निपटाने में 27 वर्ष लग गए। अभी भी न्याय का चक्र पूरा नहीं हुआ है। क्योंकि जो 27 लोग फरार हैं, उनका भी दंड सुनिश्चित करना है। अब यह देश की सुरक्षा एजेंसियों का दायित्व है कि वह कब बाकी भगौड़ों को पकड़ कर न्यायलय के समक्ष खड़ा कर पाते हैं। आतंकियों, अपराधियों को इससे जरूर सबक मिलेगा कि भले ही वह भागकर सात समुद्र पार ही क्यों न चले जाएं, लेकिन उनके कुकर्म व न्याय के हाथ उनका पीछा नहीं छोड़ेंगे।

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