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सस्ती जेनेरिक दवाइयां: रोगों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक

Generic Medicines, Hindi Article

सरकार ने हाल ही में एक साहसिक निर्णय लिया है, जिसके अंतर्गत डाक्टरों को दवाइयों के जेनेरिक नाम लिखने होंगे तथा भारतीय चिकित्सा परिषद् ने सभी मेडिकल कालेजों के प्रिंसिपलों, अस्पताल के निदेशकों, राज्य चिकित्सा परिषदों और स्वास्थ्य सचिवों को इस बारे में परिपत्र जारी किया है कि यदि कोई डॉक्टर इस प्रावधान का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध समुचित अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट किया है कि जेनेरिक दवाइयों का लिखना अनिवार्य किए जाने के लिए कानूनी व्यवस्था की जाएगी। हालांकि ऐसा करना अनिवार्य है किंतु डॉक्टर इसका पालन नहीं कर रहे हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद् की आचार समिति ने भी इसे पिछले अक्तूबर में डाक्टरों के लिए अनिवार्य बना दिया था, किंतु फार्मा कंपनियां डाक्टरों को रिश्वत दे रही हैं और वे उन्हें अपनी महंगी दवाइयां लिखने के लिए कह रही हैं, क्योंंकि यूनिफार्म कोड आॅफ फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेस दो साल से लंबित पड़ा है।

जेनेरिक दवाइयों की कीमतों में भी कमी किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इंडियन जर्नल आॅफ फार्माकोलोजी के अध्ययन में पाया गया है कि हालांकि जेनेरिक दवाइयां ब्रांडिड दवाओं से कम महंगी हैं क्योकि इनका खुदरा मार्जिन बहुत अधिक है और कई बार यह हजार गुणा तक है। इस कदम से गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अब अपेक्षाकृत कम दाम पर जेनेरिक दवाइयां मिलेंगी। साथ ही सरकार औषधि नीति में सुधार की योजना बना रही है और नियामक ढांचे को मजबूत करना चाहती है। विद्यमान मूल्य नियंत्रण प्रणाली में फार्मा उद्योग के दबाव के कारण ढील दी गयी है। कुल मिलाकर गरीब लोगों को आवश्यक दवाइयां सस्ते दामों पर मिलनी चाहिए।

लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मूल्य नियंत्रण प्रणाली में ढील देने का तात्पर्य है कि दवाओं पर अधिक खर्च करना पड़ेगा और इससे आम आदमी प्रभावित होगा। आवश्यक दवाओं को मूल्य विनियमन से अलग करने से आम दवाओं की कीमतों में वृद्धि होगी। ग्रामीण भारत में 70 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 60 प्रतिशत लोग दवाओं पर अपनी जेब से खर्च करते हैं इसलिए आवश्यक औषद्यियों के संबंध में मूल्य नियंत्रण को समाप्त करना और राष्टÑीय भेषज मूल्य नियतन प्राधिकरण का विस्तार फार्मा उद्योग के दबाव में किया जा रहा है और ऐसा भारत में व्यवसाय करने में सरलता के नाम पर किया जा रहा है।

वर्तमान में 400 से अधिक आवश्यक दवाओं के मूल्य सरकार द्वारा नियंत्रित हैं जबकि अन्य सभी दवाओं की कीमतों में कंपनियां प्रति वर्ष 10 प्रतिशत की वृद्धि कर सकती हैं। इस नियंत्रण के बावजूद बहुराष्टÑीय कंपनियों सहित फार्मा कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं।

प्रत्येक वर्ष फार्मा कंपनी का लाभ बढ़ता जा रहा है। यह क्षेत्र लाभदायक माना जाता है। भारत जैसे बड़े देश में जहां जनसंख्या विस्फोट है और जीवन दशाएं असंतोषजनक हैं वहां पर आने वाले वर्षों में दवाओं की मांग बढ़ने की संभावना है हालांकि एक वर्ग का मानना है कि इस संबंध में कठोर विनियमनों से फार्मा उद्योग प्रभावित होगा जो वर्तमान में सबसे बड़ा निर्यात राजस्व उत्पन्न करने वाला क्षेत्र है।

किंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। कुछ दवाओं को छोड़कर मूल्य नियंत्रण अन्य दवाओं पर लागू नहीं है और फार्मा उद्योग के लिए कठोर विनियमन नहीं हैं जिसके चलते देश में वर्तमान में यह क्षेत्र एक लाख करोड़ रूपए से अधिक का है।
सरकार ने हाल ही में 65 आवश्यक दवाओं के दामों में 35 प्रतिशत तक की कमी करने की घोषणा की है जिससे अनेक गंभीर बीमारियों के रोगी लाभान्व्ति होंगे। राष्टÑीय भेषज मूल्य नियतन प्राधिकरण ने मधुमेह, कैंसर, अस्थमा, हदय रोग, मानसिक विकार, किडनी रोग आदि की दवाओ के मूल्यों में कमी की है।

किंतु ऐसी ब्रांडों की दवाइयां जिनका अधिकतम खुदरा मूल्य अधिकतम सीमा से कम है वे अपनी कीमतों में वृद्धि नहीं कर सकते हैं। मार्च के महीने से राष्टÑीय भेषजा मूल्य नियतन प्राधिकरण ने 540 आवश्यक दवाइयों के मूल्य निधारित किए हैं जिससे लगभग 3400 करोड़ रूपए की बचत हुई है। देश में दवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि फार्मा कंपिनयों का लाभ प्रभावित न हो मूल्य नियंत्रण विनियमित किया जाना चाहिए और यह इसलिए जरूरी है कि गरीब लोग अपने इलाज के लिए दवाइयां खरीद सकें।

बू्रकिंंग्स इंडिया द्वारा हाल में कराए गए अध्ययन के अनुसार भारत में 2004-14 के दौरान स्वास्थ्य पर व्यय करने के कारण जिन परिवारो की हालत में सुधार नही हुआ है उनकी संख्या में बदलाव नही आया है और वह 7 प्रतिशत बनी हुई है। देश में ऐसे लगभग 8.8 करोड़ लोग हैं जो जर्मनी की जनसंख्या से भी अधिक हैं और इतनी अधिक संख्या में लोग स्वास्थ्य पर व्यय के कारण गरीबी में धकेले गए हैं।

स्वास्थ्य मंत्री नड्डा ने हाल ही में संसद को बताया कि राष्टÑीय नमूना सर्वेक्षण के 2014 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रो में 23.66 प्रतिशत परिवारों को स्वास्थ्य व्यय के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सरकार ने चिकित्सा अनुसंधान के लिए एकल खिडकÞी प्रणाली शुरू की है। इससे पहले चार विभिन्न समितियां इसके लिए स्वीकृति देती थी जिसमें तीन-चार वर्ष लग जाते थे। नीति आयोग ने स्वास्थ्य मंत्रालय को पहले ही लिख दिया है कि वह चिकित्सा अनुसंधान में नए प्रयोगों को मंजूरी देने के ढ़ांचे में बदलाव लाए ताकि देश दवा विनिर्माण का केन्द्र बन सके।

सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य देखरेख सुविधाएं उपलब्ध कराना है जिसमें गरीब वर्गो के लिए सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराना भी शामिल है। दवा विनिर्माण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है किंतु इसका मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए कि लोगों को आवश्यक स्वास्थ्य देखरेख सुविधाएं मिलें और वे दवाइयां खरीद सकें। जब तक देश की जनता दवाइयां खरीदने में सक्षम न हो और महंगी दवाइयों के कारण उनके परिवार के लोगों की मौत न हो तब तक सरकार की इस कवायद का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

चिकित्सा अनुसंधान का लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए। साथ ही एक ऐसी कार्य योजना बनायी जानी चाहिए जो दवाओं के मूल्य नियतन के प्रश्न पर विचार करे और यह बताए वास्तव में इस क्षेत्र में विनियमन की आवश्यकता है या नहीं और इसमें उद्योग, डॉक्टर, अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि शामिल किए जाने चाहिए।

इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सस्ती दवाइयां न केवल गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों अपितु अन्य कमजोर वर्गों को भी उपलब्ध करायी जाएं। सरकार ने सबके लिए स्वास्थ्य की दिशा में एक साहसिक कदम उठाया है। किंतु उसे फार्मा कंपनियों की लाभ अर्जित करने की प्रवृति और अनैतिक व्यापार प्रथाओं पर रोक लगानाी होगी और यह इसलिए भी आवश्यक है कि फार्मा कंपनियों को भी विभिन्न तरह की सब्सिडी मिल रही है।

कुल मिलाकर स्वास्थ्य सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2012-30 के बीच गैर-संचारी रोगों के कारण आर्थिक बोझ लगभग 6.2 ट्रिलियन डॉलर का रहेगा। इस समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य देखरेख पर व्यय वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद के 1.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 2015 तक 2.5-3 प्रतिशत किए जाने की आवश्यकता है और सस्ती दरों पर दवाइयां उपलब्ध कराई जाए।

डॉ. ओइशी मुखर्जी

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