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सम्पादकीय

सहजता से स्वीकारें हर बदलाव को

जड़ता, जीवन्तता को खा जाती है और जो इसके सम्पर्क में आता है, जो अंगीकार करता है उसका खात्मा कर दिया करती है। इसलिए जीवन का हर क्षण और प्रत्येक व्यवहार जीवन्त होना चाहिए, तभी यह शाश्वत आनंद और चरम सुख प्रदान कर सकता है। परिवर्तन को सहज भाव से सहर्ष स्वीकार करने की आदत डाल ली जाए, तो फिर हर बदलाव अपने आप में नवीन अनुभवों के साथ सुन्दर और सकारात्मक हो सकता है। हमेशा हर बदलाव अपने पूर्ण अनुकूल हो यह संभव नहीं है, लेकिन यदि परिवर्तन को जीवन की रोजमर्रा की सामान्य क्रियाओं की तरह मान लिया जाए तो यह उतना अनमना भी नहीं लगता जैसा कि औसत इंसान सोचता है।
जो एक जगह बैठने और स्थिर रहकर कुछ फीट की परिधि को ही संसार मान लिया करता है, वह जिन्दगी भर बिना किसी रस्सी से खूंटे की तरह बंधा होकर रह जाता है। जीवन में आज हम जो कुछ हैं, उससे अधिक पा सकते हैं यदि हर परिवर्तन को अंगीकार कर लें।
परिवर्तन के संदर्भ में यह स्पष्ट मान्यता है कि या तो खुद अपने आपको बदलें और सम सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने भीतर अनुकूलताएं पैदा करें। और यह नहीं कर पाएं तो हर प्रकार के परिवर्तन को सहजता एवं आनंदपूर्वक स्वीकार करने का माद्दा विकसित कर लें।
सबसे सुन्दर और जीवट वाला इंसान वह है जो हर प्रकार के प्रवाह के अनुकूल होकर बहना सीख जाता है। उसे किसी से कोई शिकायत नहीं होती। किसी वस्तु या व्यक्ति से मोह नहीं होता। जो हो रहा है वह ठीक हो रहा है, यह मानकर ईश्वर की हर इच्छा को सहजतापूर्वक स्वीकार कर लिया करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए चाहे कैसी भी परिस्थितियां सामने क्यों न आ जाएं, वह हमेशा मस्त रहता है और उसका जीवन आनंद से भरपूर रहता है।
जो लोग परिवर्तन को सहजतापूर्वक स्वीकार करने के आदी नहीं होते, झिझकते रहते हैं, जब भी बदलाव की बयार आती है, अन्यमनस्क बने रहते हैं उन लोगों को भले ही कुछ समय के लिए परिवर्तन से राहत मिल जाए, लेकिन अन्ततोगत्वा अनचाहे परिवर्तन को भी विवश होकर स्वीकार करना ही पड़ता है। विवशता से स्वीकारा गया हर प्रकार का परिवर्तन दु:खद और अवसादी चरित्र वाला होता है और इससे आनंद पाने की कल्पना नहीं की जा सकती।
कुछ लोग जिन्दगी भर यह चाहते हैं कि हम उन्हीं के होकर बने रहें, उन्हीं की गुलामी करते हुए नौकर-चाकरों और दास की तरह काम करते रहें, इसके सिवाय हमारी कोई जिन्दगी हो ही नहीं। बहुत बड़ी संख्या में हुनरमंद और बौद्धिक सम्पदा के धनी हुए हैं जो इन्हीं चन्द लोगों के मोहपाशों में जकड़े रहकर अपना सब कुछ गँवा बैठे और कइयों के लिए बुढ़ापा अभिशाप हो गया।
बहुत सारे लोग प्रेम और मोह में फंस कर एक-दूजे के लिए जिन्दगी भर जीने के वायदों और दावों की बलि चढ़ गए और खूब सारे एक-दूसरे से किसी न किसी जमीन-जायदाद या तरह-तरह के संबंधों की वजह से जिन्दगी को रसहीन, गंधहीन और तत्वहीन कर बैठे।
व्यक्तियों के घेरे में पड़कर मोहग्रस्त रहने वाले लोगों के सामने भी वर्तमान से अच्छे और श्रेष्ठ लोगों का आवागमन बना रहता है, किन्तु ये लोग पुरानों के मोह में इतने अधिक जकड़े हुए होते हैं कि कुछ नहीं कर पाते। कोई बंधक बना फिरता है और कोई नजरबंद होकर पड़ा रहता है।
दुनिया हमारे देखने और जानने के लिए है और अरबों लोगों में हमारे लायक तथा हमारी मानसिकता वालों की भी कोई कमी नहीं है। एक बार परिवर्तन को स्वीकारने का मानस तो बनाएं। परिवर्तन खुश होकर स्वीकार कर लें तो अच्छी बात है अन्यथा मर-मर के भी इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा, और यही हमारे लिए दु:ख का महान कारण बन सकता है।
डॉ. दीपक आचार्य

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