सम्पादकीय

आम आदमी पार्टी का गिरता जनाधार

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#AAP दिल्ली विधान सभा की राजौरी गार्डन सीट के उप-चुनाव में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत जब्त होना पार्टी के खिलाफ जनता का कड़ा संदेश है। दो साल पहले 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में आई पार्टी को वोटरों ने बुरी तरह नकार दिया है। राजनीति में ऐसे कुछ ही उदाहरण मिलते हैं, जब कोई सत्ताधारी पार्टी उपचुनाव में हार गई हो। दिल्ली के अलावा पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व कर्नाटक में भी उप-चुनाव हुए, जहां सत्ताधारी पार्टियों ने ही परचम लहराया।

केवल दिल्ली में ही वोटरों ने सत्ताधारी पार्टी से मुंह मोड़ लिया। दरअसल आम आदमी पार्टी बयानबाजी कर विवादों में उलझती रही है। विशेष रूप से आप संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केंद्र सरकार, दिल्ली के उप-राज्यपाल सहित अन्य पार्टियों के खिलाफ नकारात्मक प्रचार की सुर छेड़ी, जिसने केजरीवाल छवि को ही धूमिल कर दिया, जिसका परिणाम आज सबके सामने है।

#AAP केंद्र के हर निर्णय का विरोध करने से आम आदमी पार्टी की प्रतिष्ठा को भारी नुक्सान पहुंचा। केजरीवाल दिल्ली में विकास कार्यों की तरफ ध्यान देने की बजाए पंजाब व गोवा विधानसभा चुनावों में ज्यादा व्यस्त रहे। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के नेताओं के आचरण पर भी निरंतर विवाद होते रहे, जिससे पार्टी को काफी नुक्सान पहुंचा।

आम आदमी पार्टी ही देश की एक ऐसी पार्टी है जिसमें दो सालों के अंतराज में 12 विधायक गैर-कानूनी कार्यों में गिरफ्तार हुए और तीन अन्य के खिलाफ मामले दर्ज हुए। चाहे उप-चुनाव विधानसभा चुनावों के भविष्य का फैसला नहीं करती लेकिन सत्ताधारी पार्टी की हार पार्टी के गिरते जनाधार की तरफ इशारा करती है। आम आदमी पार्टी में अरविन्द केजरीवाल को उपचुनाव के परिणामों की समीक्षा कर खुद व पार्टी की छवि को सुधारने की आवश्यकता है।

#AAP केजरीवाल व उनकी पार्टी के विधायकों पर तानाशाही के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे आरोप ही पंजाब विधानसभा चुनावों के दौरान भी उन पर लगे हैं। बेहतर हो यदि आम आदमी पार्टी केंद्र, उप-राज्यपाल व अन्य पार्टियों से टकराव की बजाय सद्भावना बनाए और सार्थक आलोचना का रास्ता अपनाए। जागरूक वोटर को खोखली बयानबाजी से नहीं भरमाया जा सकता। वोटर नेताओं का शिष्टाचार व कार्यों को देखता है।

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