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बिखरने की कगार पर आम आदमी पार्टी

अरविन्द केजरीवाल ने सोचा तक नहीं होगा कि उन पर भी भ्रष्टचार का बम फूट सकता है। अब तक तो वे दूसरों के सिर पर भ्रष्टचार का बम फोड़ते थे और कहते थे कि पूरी दुनिया भ्रष्ट है, एक हम ही हैं जो ईमानदार हैं। भ्रष्टचार हम ही मिटा सकते हैं। भ्रष्टचार का बम अरविन्द केजरीवाल के सिर पर भाजपा या कांग्रेस वाले फोड़ते तो कहा जा सकता था कि यह एक साजिश है और आरोपों में कोई दम नहीं है।

भ्रष्टचार का आरोप तो उनकी पार्टी के ही बडे नाम वाले नेता कपिल मिश्रा ने लगाया है, जो एक दिन पूर्व तक अरविन्द केजरीवाल के मंत्रिमंडल में शामिल थे। प्रतिक्रिया जैसी हुई है, उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अरविन्द केजरीवाल की कथित तौर पर ईमानदार छवि पर दाग लग ही गया है। अब अरविन्द केजरीवाल दूसरों को भ्रष्ट कैसे कह सकते हैं?

कभी उनकी पार्टी में रहे योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोग कथित तानाशाही और सत्ता के लालच के खिलाफ पहले से ही गर्म थे और ये अरविन्द केजरीवाल के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे थे। अब अन्ना हजारे अपनी चिंता जता रहे हैं। अन्ना हजारे का कहना है कि भ्रष्टचार की बात सुनकर उन्हें दु:ख हुआ है और अरविन्द केजरीवाल ने तानाशाही और सत्ता से जुडेÞ रहने के लालच में एक महान् आंदोलन को तहस-नहस कर दिया। शायद अरविन्द केजरीवाल को उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों का भान नहीं होगा,

पर सच्चाई यह है कि अरविन्द केजरीवाल लगातार उन लोगों से ही घिरते जा रहे हैं, जिन्होंने अन्ना और लोकपाल आंदोलन में साथ दिया था और जिनकी बदौलत अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे।

आम आदमी पार्टी अब बिखरने की कगार पर खड़ी है। अरविन्द केजरीवाल ने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि मात्र आरोप लगा देने मात्र से ही कोई व्यक्ति या राजनीतिज्ञ भ्रष्ट साबित नहीं हो जाता है। किसी को भ्रष्ट साबित करने के लिए सबूत चाहिए और सबूत भी चाकचौबंद होने चाहिए।

सतही और अप्रमाणित आरोपों की हवा निकलते देर नहीं लगती। अरविन्द केजरीवाल के सतही और अप्रमाणित आरोपों की हवा कोई एक बार नहीं, बल्कि बार-बार निकली है। उन्होंने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोप लगाये थे और बड़ा नाम कमाया था। मीडिया ने इन्हें भ्रष्टचार विरोधी नायक करार दे डाला। अरविन्द केजरीवाल के आरोपों के खिलाफ नितिन गडकरी कोर्ट चले गये, मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। केजरीवाल ने जमानत न लेने का जमकर नाटक किया।

बाद में केजरीवाल ने माफी मांग ली। अरूण जेटली का प्रकरण भी आपको याद है। अरूण जेटली के खिलाफ अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी ने खूब धमा-चौकड़ी मचायी थी। अरूण जेटली से मंत्री पद छोड़ने के लिए भी मांग की थी। अरूण जेटली ने भी अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा ठोक दिया। जब मुकदमा शुरू हुआ, तब केजरीवाल की पार्टी स्वयं फंसती हुई नजर आयी। राम जेठमलानी जैसे वकील रखने के बावजूद कोर्ट में अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी के अन्य लोगों को सबूत पेश करना मुश्किल हो रहा है।

अब अरविन्द केजरीवाल ने कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने अरूण जेटली पर वही आरोप लगाये थे, जो मीडिया में बहुत पहले से चल रहे थे। इससे साफ होता है कि अरूण जेटली के खिलाफ अरविन्द केजरीवाल या उनकी पार्टी के पास कोई ठोस सबूत नहीं थे, फिर भी इन्होंने अरूण जेटली के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोप लगाये थे। अरविन्द केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ भी कई आरोप लगाये थे। जिनमें टेंकर घोटाला कुख्यात था। पर केजरीवाल ने अभी तक शीला दीक्षित के भ्रष्टचार के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की।

सत्ता में आने के बाद भी केजरीवाल झूठे भ्रष्टचार के आरोपों और सनसनी फैलाने की कहानी गढ़ते रहे। इनकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर चली गयी। लगे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ ताल ठोकने। चले गये मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाराणसी। वाराणसी की जनता ने इन्हें खारिज कर दिया। लौटकर फिर ये दिल्ली आ गये। दिल्ली की जनता ने दोबारा इन्हे सत्ता सौंपी। सत्ता इसलिए सौंपी थी कि केजरीवाल किये गये वायदों को पूरा करेंगे, दिल्ली का विकास करेंगे। लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला।

बल्कि यह जानते हुए कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है, पूर्ण राज्य नहीं होने के कारण दिल्ली के मुख्यमंत्री को वैसे अधिकार नहीं है, जो पूर्ण राज्य के होते हैं। दिल्ली में उप राज्यपाल के अधिकार अधिक होते हैं। इस संवैधानिक सच्चाई को ये स्वीकार ही नहीं कर पाये। कभी नरेन्द्र मोदी तो कभी उपराज्यपाल को गाली देने का काम इनका छूटा ही नहीं। सारी शक्ति इन्होंने मोदी और उपराज्यपाल को गाली देने में लगा दी तो फिर काम करने की शक्ति और समय इनके पास ही नहीं था।

दिल्ली को छोड़कर केजरीवाल पंजाब और गोवा फतह करने चले गये। खासकर पंजाब में इन्होंने खूब नाटक किया। खूब राजनीतिक पैंतरेबाजी दिखायी। पंजाब की शांति को भी भंग करने की कोशिश की थी। पंजाब और गोवा की जनता ने अरविन्द केजरीवाल की इच्छाओं पर तुषराघात कर दिया। पंजाब में कुछ हासिल तो हुआ, पर गोवा की सभी सीटों पर आप के प्रत्याशियों के जमानत जब्त हो गयी थी।

दिल्ली एकसीडी के चुनाव में भी केजरीवाल ने बड़ी जोर मारी थी। भाजपा यहां दस साल से सत्ता में थी, इसलिए भाजपा के खिलाफ हवा भी थी। लेकिन दिल्ली की जनता केजरीवाल के नाटकों से परेशान हो चुकी थी। चुनाव में हार को भी स्वीकार करने की परमपरा है। पर केजरीवाल ईवीएम पर ठिकरा फोड़ कर अपनी कूनीति से बाज नहीं आये।

यह भी सही है कि केजरीवाल के साथ जुडेÞ लोग कोई प्रतिबद्ध विचारधारा के लोग नहीं रहे हैं। दो तरह के लोग इनके साथ रहे हैं। एक तो राजनीतिक अनाड़ी और दूसरी तरह के लोगों में वैसे लोग शामिल थे, जिन्हें किसी भी पार्टी में कोई मजबूत जगह नहीं मिली थी और वे राजनीतिक तौर पर हाशिये पर ही खडेÞ थे। अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और गोपाल राय जैसे लोग खुद एनजीओवाद से प्रेरित थे, जो देश की गरीबी और देश की विंसगतियां बेचकर विदेशों से पैसा लाकर ऐश-मौज करते रहे हैं।

निष्कर्ष यह है कि अब अरविन्द केजरीवाल को अपनी पार्टी को एक रखना कठिन होगा। आप पार्टी में भगदड़ मच सकती है। अगर आप पार्टी में भगदड़ मचती है और विधायक आप पार्टी से भागते हैं, तो फिर आम आदमी पार्टी की सरकार गिर भी सकती है। एक आंदोलन से निकले सपने का सर्वानाश होते हम सब देख रहे हैं और शायद आगे भी देखेंगे।

– विष्णु गुप्त 

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