सम्पादकीय

सेवा से बड़ी हुई पद की लालसा

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कभी समय था जब पार्टी की ओर से गुरमुख सिंह मुसाफिर को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया लेकिन मुसाफिर यह पद लेने से पीछे हट गए। बड़ी मुश्किल से उनके साथी नेताओं ने उन्हें मनाया। अब हालात यह हैं कि पद के लिए पार्टी ही तोड़ दी जाती है। पद व राजनीति एक दूसरे में इतने घुलमिल गए हैं कि पद शब्द एक तरफ कर दें तो राजनीति शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ताजा मिसाल आम आदमी पार्टी के विधायक सुखपाल सिंह खैहरा की है। खैहरा ने बठिंडा के अपने 7 विधायकों के सहयोग से कनवैंशन कर ली हालांकि उनके साथ दो अन्य विधायक तो इस कनवैंशन में नहीं आए। लोगों को एकत्रित करने के लिए जोर लगाया गया जैसे वह किसी लोक मामले में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हों। कनवैंशन का बड़ा मुद्दा यह था कि खैहरा को उनसे छीना गया विपक्ष के नेता का पद वापिस किया जाए। कनवैंशन में पहुंचे विधायकों ने भी मांग पर जोर दिया। इस घटना से शुरु से ही विवादों में उलझी आम आदमी पार्टी और भी घिर गई है। पार्टी के अंदर लोकतंत्र नहीं है क्योंकि नेता विपक्ष को बदलने के लिए विधायकों की बैंठकें नहीं हुई, फिर नेताओं को अनुशासन पसंद नहीं क्यों वह मीडिया में जाने की बजाए पार्टी मंच पर अपनी बात नहीं रख सके। खास पदों की दौड़ में आदर्श भटकते नजर आ रहे हैं। जनता के हितों की बात करने की बजाए सभी राज्यों की लीडरशिप को पद की लालसा ने अपनी चपेट में ले लिया है। कांग्रेस व अकाली-भाजपा दलों को ‘आप’ की दुर्दशा फायदेमंद साबित होगी। इस पार्टी के राष्टÑीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने पहली बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनते समय लोगों के सामने आदर्श रखा था कि वह सरकारी बंगला नहीं लेंगे। खैहरा की ओर से सरकारी कोेठी खाली करवाने के लिए कु छ दिनों की मोहलत मांगी गई थी। पंंजाब को इस समय जरूरत है सार्वजनिक मुद्दों की आवाज उठाने वाले नेताओं व पार्टियों की। दूसरी तरफ कांग्रेस में नवजोत सिंह सिद्धू हैं जो भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई के लिए अपनी ही पार्टी के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। इस तरह भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सिद्धू की लड़ाई सरकार के साथ हो रही है। नवजोत सिद्धू के परिवार ने विरोध होने के कारण सरकार में दो अहम पद भी ठुÞकरा दिए। पदों के त्याग के लिए सिद्धू पूरे पंजाब के लिए मिसाल बन चुके हैं। राजनीति को सेवा मानना बड़ी बात है जो कहीं-कहीं पूरी होती भी दिख रही है। सिद्धू व खैहरा की मिसाल राजनीति के दो पहलुओं को प्रदर्शित करती है।

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